समान नागरिक संहिता: भारत में व्यक्तिगत कानून, पक्ष-विपक्ष और आगे की राह
संदर्भ
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संकेत दिया है कि समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को 2029 तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए द्वारा शासित सभी 21 राज्यों में लागू किया जाएगा। उत्तराखंड में जनवरी 2025 से यूसीसी लागू है, जबकि असम, गुजरात और मध्य प्रदेश की विधानसभाओं द्वारा पारित यूसीसी से संबंधित विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी की प्रतीक्षा में हैं।
यूसीसी भारत में लंबे समय से संवैधानिक, सामाजिक और कानूनी बहस का विषय रहा है। इसका संबंध विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे व्यक्तिगत मामलों से है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि वर्तमान में भारत में इन मामलों को किस तरह नियंत्रित किया जाता है, यूसीसी के पक्ष और विरोध में क्या तर्क हैं और आगे की राह क्या हो सकती है।
आज व्यक्तिगत मामलों के कानून कैसे लागू होते हैं?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
यूसीसी का उद्देश्य धर्म, जाति या जनजाति से अलग सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत मामलों में समान और धर्मनिरपेक्ष कानून लागू करना है।
भारत में पहले से ही आपराधिक कानूनों के साथ-साथ कराधान, अनुबंध और परक्राम्य लिखत जैसे कई नागरिक मामलों में समान कानून लागू होते हैं। लेकिन विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे व्यक्तिगत मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ यानी व्यक्तिगत कानून मौजूद हैं।
हिंदू समुदाय के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 जैसे कानून लागू होते हैं। हालांकि, संविधान में उपलब्ध कुछ अपवादों के कारण कई जनजातीय समुदाय अपने पारंपरिक पारिवारिक कानूनों और रीति-रिवाजों का पालन करते हैं।
जैन, बौद्ध और सिख समुदाय भी हिंदू व्यक्तिगत कानूनों के दायरे में आते हैं। सिख विवाहों का पंजीकरण आनंद विवाह अधिनियम के तहत भी किया जा सकता है।
ईसाइयों और पारसियों के लिए अलग व्यक्तिगत कानून हैं, जबकि मुसलमानों के व्यक्तिगत मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ यानी शरीयत एप्लीकेशन एक्ट, 1937 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यूसीसी के पक्ष में क्या तर्क दिए जाते हैं?
समान नागरिक संहिता को लेकर संविधान सभा में भी मतभेद थे। कुछ सदस्य चाहते थे कि इसे मौलिक अधिकार बनाया जाए, ताकि नागरिक कानूनों में एकरूपता लाई जा सके और महिलाओं को समान अधिकार सुनिश्चित किए जा सकें। यूसीसी के समर्थन में मुख्य रूप से दो तर्क दिए जाते हैं।
पहला, यह माना जाता है कि सभी नागरिकों पर समान व्यक्तिगत कानून लागू होने से धर्मनिरपेक्षता और कानूनी समानता मजबूत हो सकती है।
दूसरा और महत्वपूर्ण तर्क लैंगिक समानता का है। यूसीसी के समर्थकों का मानना है कि विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे मामलों में अलग-अलग धार्मिक कानूनों के कारण महिलाओं के अधिकारों में अंतर हो सकता है। समान कानून महिलाओं के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने का माध्यम बन सकता है।
यूसीसी के विरोध में क्या तर्क हैं?
यूसीसी के विरोध में सबसे महत्वपूर्ण चिंता यह है कि व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव का संबंध नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों से भी है।
संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद के धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। वहीं अनुच्छेद 29 नागरिकों के किसी वर्ग को अपनी विशिष्ट संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार देता है।
आलोचकों का तर्क है कि व्यक्तिगत मामलों से जुड़े यूसीसी के कुछ प्रावधान धार्मिक ग्रंथों, परंपराओं या सांस्कृतिक मान्यताओं से टकरा सकते हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल जनजातीय समुदायों को लेकर है। यूसीसी लागू करने वाले चार राज्यों ने अपनी व्यवस्था में जनजातीय आबादी को इसके दायरे से बाहर रखा है। इसके पीछे जनजातीय संस्कृति और परंपराओं की संवैधानिक सुरक्षा के साथ यह तर्क भी दिया जाता है कि कई जनजातीय रीति-रिवाज इन मामलों में महिलाओं को पर्याप्त अधिकार प्रदान करते हैं।
ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि यदि एक समुदाय को उसके पारंपरिक कानूनों के लिए अपवाद दिया जाता है, तो धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए अलग व्यक्तिगत कानूनों की मांग को किस आधार पर देखा जाए।
महिलाओं के अधिकार और व्यक्तिगत कानूनों में सुधार
यूसीसी की बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं के समान अधिकार हैं। विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे मामलों में महिलाओं को समान अधिकार देना व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का प्रमुख उद्देश्य हो सकता है।
अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। यह संवैधानिक नैतिकता और अन्य मौलिक अधिकारों, जिसमें समानता का अधिकार भी शामिल है, के अधीन है।
सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6ए से जुड़े 2024 के मामले में भी कहा कि जातिवाद और लैंगिक भेदभाव जैसी ऐसी प्रथाएं, जो संविधान की भावना के विपरीत हैं, अनुच्छेद 29 के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकतीं।
इस दृष्टिकोण से व्यक्तिगत कानूनों में ऐसे सुधार, जिनका उद्देश्य महिलाओं के साथ भेदभाव समाप्त करना और समानता सुनिश्चित करना है, उन्हें केवल धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
क्या यूसीसी ही एकमात्र रास्ता है?
संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था, लेकिन उन्होंने यह सुझाव भी दिया था कि शुरुआत में इसे स्वैच्छिक बनाया जा सकता है। उनके अनुसार संसद ऐसा प्रावधान कर सकती थी जिसके तहत जो नागरिक यूसीसी से बंधने की इच्छा व्यक्त करें, वे इसके दायरे में आ सकें।
दूसरी ओर, विधि आयोग ने 2018 में जारी पारिवारिक कानून में सुधार पर परामर्श पत्र में कहा था कि उस समय यूसीसी न तो आवश्यक था और न ही वांछनीय। आयोग ने इसके बजाय अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों में सुधार पर जोर दिया।
आयोग ने ‘समुदायों के बीच समानता’ की बजाय ‘समुदायों के भीतर समानता’, यानी पुरुषों और महिलाओं के बीच समान अधिकारों को प्राथमिकता देने की बात कही थी। रिपोर्ट में विवाह, तलाक, बच्चों की अभिरक्षा, गोद लेने, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे क्षेत्रों में व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की सिफारिशें की गई थीं।
आगे की राह
यूसीसी पर बहस केवल एक समान कानून बनाने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में समानता, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकार और लैंगिक न्याय जैसे संवैधानिक सिद्धांत हैं।
आगे किसी भी सुधार में यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे मामलों में महिलाओं के अधिकार मजबूत हों, साथ ही संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर भी विचार किया जाए।
व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का उद्देश्य यदि लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना और समान नागरिक अधिकार सुनिश्चित करना है, तो कानून बनाने की प्रक्रिया में विभिन्न समुदायों की सामाजिक परिस्थितियों, संवैधानिक प्रावधानों और विधि आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा।
अंततः यूसीसी पर बहस का मूल प्रश्न यह है कि भारत किस तरह व्यक्तिगत कानूनों में समानता और लैंगिक न्याय सुनिश्चित कर सकता है, जबकि संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता के बीच संतुलन भी बनाए रखा जाए।