मेलेनोमा: भारत में शुरुआती पहचान क्यों है सबसे बड़ी चुनौती
संदर्भ
भारत में प्रत्येक वर्ष हजारों मरीजों में मेलेनोमा, त्वचा के कैंसर का एक प्रकार, का निदान होता है। पश्चिमी आबादी की तुलना में भारत में यह अपेक्षाकृत कम आम है, लेकिन इसे दुर्लभ समझना सही नहीं होगा। भारतीय मरीजों में मेलेनोमा अक्सर शरीर के ऐसे हिस्सों पर दिखाई देता है, जिनकी सामान्य तौर पर जांच नहीं की जाती। यही वजह है कि कई मरीज डॉक्टर के पास तब पहुंचते हैं, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है।
विडंबना यह है कि आज उन्नत मेलेनोमा के इलाज के लिए पहले से कहीं अधिक प्रभावी और व्यक्तिगत उपचार उपलब्ध हैं। इसलिए भारत में चुनौती केवल नए उपचारों की उपलब्धता नहीं, बल्कि बीमारी की समय पर पहचान भी है।
मेलेनोमा की पहचान क्यों छूट जाती है?
त्वचा के कैंसर के बारे में आम जागरूकता अक्सर उन संकेतों पर आधारित होती है जो गोरी त्वचा वाले लोगों में अधिक देखे जाते हैं। ऐसे मामलों में मेलेनोमा अक्सर धूप के संपर्क में आने वाले हिस्सों पर एक असामान्य, अनियमित या रंग बदलते तिल के रूप में दिखाई देता है।
भारत में तस्वीर अलग हो सकती है। यहां मेलेनोमा पैरों के तलवों और नाखूनों के नीचे भी दिखाई दे सकता है। इसे एक्रल लेंटिजिनस मेलेनोमा (Acral Lentiginous Melanoma) कहा जाता है। गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों में यह मेलेनोमा के महत्वपूर्ण हिस्से के लिए जिम्मेदार होता है।
समस्या यह है कि तलवे या नाखून के नीचे दिखाई देने वाले काले या भूरे निशान को कई बार चोट, फंगल संक्रमण या किसी सामान्य त्वचा समस्या के रूप में देखा जाता है। इससे सही जांच और निदान में देरी हो सकती है।
इसी तरह म्यूकोसल मेलेनोमा श्लेष्म झिल्लियों में विकसित होता है और शुरुआती चरण में इसके लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं हो सकते। कई मामलों में इसका पता बीमारी के आगे बढ़ने के बाद चलता है।
इसलिए शरीर पर कहीं भी मौजूद ऐसा रंजित घाव जो नया हो, लगातार बना रहे या उसके आकार, रंग या स्वरूप में बदलाव हो रहा हो, उसकी चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।
पिछले एक दशक में उपचार में बड़ा बदलाव
जब उन्नत मेलेनोमा के उपचार के विकल्प सीमित थे, तब बीमारी के लंबे समय तक नियंत्रण की संभावनाएं कम थीं। लेकिन पिछले एक दशक में इम्यूनोथेरेपी और प्रिसीजन मेडिसिन ने उपचार की दिशा बदल दी है।
इस बदलाव की नींव जेम्स एलिसन और तासुकु होंजो की CTLA-4 और PD-1 से संबंधित खोजों से पड़ी। इन खोजों ने यह समझने में मदद की कि कैंसर कोशिकाएं किस तरह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से बचती हैं। इम्यून-चेकपॉइंट इनहिबिटर ऐसी दवाएं हैं जो इस प्रतिरक्षा-रोक को हटाकर शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर के खिलाफ सक्रिय करने में मदद करती हैं। दोनों वैज्ञानिकों को 2018 में फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार दिया गया।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर का मामला भी आधुनिक उपचार की संभावनाओं का एक उदाहरण है। 91 वर्ष की उम्र में उनके मेलेनोमा के यकृत और मस्तिष्क तक फैलने का पता चला था। उनके उपचार में सर्जरी, स्टीरियोटैक्टिक रेडिएशन और पेम्ब्रोलिज़ुमैब जैसी इम्यूनोथेरेपी शामिल थी। बाद में उन्हें लंबे समय तक बीमारी से राहत मिली।
जब इलाज मरीज के ट्यूमर के अनुसार तय होता है
हर मेलेनोमा एक जैसा नहीं होता। कुछ ट्यूमर में BRAF जैसे विशिष्ट आनुवंशिक बदलाव पाए जाते हैं, जिन्हें लक्षित दवाओं से उपचारित किया जा सकता है।
यहीं नेक्स्ट-जनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS) की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह तकनीक ट्यूमर के आनुवंशिक बदलावों की पहचान करने में मदद करती है। सरल शब्दों में, यह ट्यूमर के आनुवंशिक “ब्लूप्रिंट” को पढ़ने जैसा है।
इस जानकारी के आधार पर चिकित्सक यह तय कर सकते हैं कि किसी मरीज के लिए लक्षित उपचार या अन्य व्यक्तिगत उपचार विकल्प उपयोगी हो सकते हैं या नहीं।
टीआईएल थेरेपी और व्यक्तिगत कैंसर वैक्सीन
मेलेनोमा के उपचार में TIL थेरेपी भी एक महत्वपूर्ण विकास है। इसमें ट्यूमर के भीतर मौजूद प्रतिरक्षा कोशिकाओं यानी ट्यूमर-इन्फिल्ट्रेटिंग लिम्फोसाइट्स को निकाला जाता है, प्रयोगशाला में उनकी संख्या बढ़ाई जाती है और फिर मरीज के शरीर में वापस डाला जाता है।
एक अन्य तेजी से विकसित होती दिशा व्यक्तिगत mRNA कैंसर वैक्सीन है। इसमें मरीज के अपने ट्यूमर की आनुवंशिक जानकारी का इस्तेमाल करके उपचार तैयार करने की कोशिश की जाती है।
अगस्त 2026 में उच्च जोखिम वाले मेलेनोमा मरीजों में व्यक्तिगत mRNA वैक्सीन इंटिस्मेरान को पेम्ब्रोलिज़ुमैब के साथ इस्तेमाल करने वाले एक देर-चरण के अध्ययन में बीमारी के दोबारा लौटने में कमी देखी गई। हालांकि, इसके लंबे समय तक जीवित रहने से जुड़े परिणामों के लिए अभी अधिक फॉलो-अप जरूरी है।
भारत में आगे की राह
भारत में मेलेनोमा से निपटने के लिए आधुनिक उपचारों के साथ-साथ शुरुआती पहचान पर भी जोर देना होगा। लोगों को यह समझना जरूरी है कि मेलेनोमा केवल धूप में दिखाई देने वाली त्वचा पर ही नहीं होता। तलवों, नाखूनों और अन्य कम दिखाई देने वाले हिस्सों में होने वाले बदलावों पर भी ध्यान देना चाहिए।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से विशेषज्ञों तक मरीजों को तेजी से रेफर करने की व्यवस्था, राष्ट्रीय मेलेनोमा रजिस्ट्री, बेहतर जीनोमिक और महामारी-विज्ञान संबंधी आंकड़े तथा भारतीय मरीजों पर अधिक क्लिनिकल रिसर्च इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
मेलेनोमा के उपचार में विज्ञान ने लंबी छलांग लगाई है। लेकिन इन उपलब्धियों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब बीमारी की पहचान इतनी जल्दी हो कि प्रभावी उपचार शुरू किया जा सके।