संदर्भ
सरकार ने थोक उपभोक्ताओं के लिए चीनी के मौजूदा 15 दिनों की स्टॉक रखने की सीमा में बदलाव किया है। अब थोक उपभोक्ता अधिकतम 30 दिनों तक का स्टॉक रख सकेंगे। हालांकि, 15 दिनों की निर्धारित सीमा से अधिक रखी जाने वाली चीनी की मात्रा की एक महत्वपूर्ण शर्त है। अतिरिक्त स्टॉक केवल अग्रिम प्राधिकरण योजना यानी एएएस के तहत आयात की गई चीनी से ही लिया जा सकेगा।
अग्रिम प्राधिकरण योजना के बारे में
- अग्रिम प्राधिकरण योजना एक ऐसी व्यापार सुविधा है जिसके तहत निर्यात किए जाने वाले उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कुछ कच्चे माल और अन्य इनपुट का शुल्क-मुक्त आयात किया जा सकता है।
- इस योजना के तहत आयात किए गए इनपुट का उपयोग ऐसे उत्पादों के निर्माण में होना चाहिए, जिन्हें बाद में निर्यात किया जाना है।
अन्य शामिल वस्तुएं:
- केवल कच्चे माल ही नहीं, बल्कि उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली कुछ अन्य वस्तुएं भी इस योजना के दायरे में आती हैं। इनमें पैकेजिंग सामग्री, ईंधन, तेल, उत्प्रेरक यानी कैटेलिस्ट जैसी वस्तुएं शामिल हो सकती हैं, बशर्ते उनका इस्तेमाल निर्यात उत्पाद के निर्माण की प्रक्रिया में होता हो।
- इस योजना की निगरानी विदेश व्यापार महानिदेशालय यानी डीजीएफटी करता है।
आयात पर विभिन्न शुल्कों से छूट:
एडवांस ऑथराइजेशन के तहत आयात किए जाने वाले पात्र इनपुट पर कई प्रकार के सीमा शुल्क और अन्य शुल्कों से छूट मिल सकती है। इनमें प्रमुख रूप से -
- मूल सीमा शुल्क यानी बेसिक कस्टम्स ड्यूटी
- अतिरिक्त सीमा शुल्क
- शिक्षा उपकर
- एंटी-डंपिंग शुल्क
- सेफगार्ड शुल्क
- ट्रांजिशन प्रोडक्ट-स्पेसिफिक सेफगार्ड शुल्क
- एकीकृत कर यानी इंटीग्रेटेड टैक्स
- क्षतिपूर्ति उपकर यानी कंपनसेशन सेस शामिल हैं।
हालांकि, ये छूट निर्धारित नियमों और शर्तों के अधीन होती है। हर प्रकार के आयात पर स्वतः सभी शुल्कों से छूट नहीं मिलती।
निर्यात की शर्त:
- एडवांस ऑथराइजेशन का मूल उद्देश्य ऐसे इनपुट को शुल्क-मुक्त उपलब्ध कराना है, जिनका इस्तेमाल निर्यात किए जाने वाले उत्पादों को तैयार करने में किया जाता है।
- इसीलिए आमतौर पर इस योजना के तहत मंजूरी देते समय निर्यात दायित्व यानी एक्सपोर्ट ऑब्लिगेशन तय किया जाता है।
- इसका अर्थ है कि योजना के तहत शुल्क-मुक्त आयात की सुविधा लेने वाली इकाई को निर्धारित शर्तों के अनुसार उत्पादों का निर्यात करना होता है।
- इस व्यवस्था का उद्देश्य निर्यातकों की उत्पादन लागत कम करना और भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है।
एडवांस ऑथराइजेशन के लाभार्थी
इस योजना का लाभ मुख्य रूप से दो प्रकार के निर्यातकों को मिल सकता है।
1. मैन्युफैक्चरर एक्सपोर्टर
- ऐसी कंपनियां या संस्थाएं जो स्वयं वस्तुओं का निर्माण करती हैं और उन्हें निर्यात करती हैं, मैन्युफैक्चरर एक्सपोर्टर कहलाती हैं।
- ये इकाइयां निर्यात उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पात्र इनपुट के लिए एडवांस ऑथराइजेशन का लाभ ले सकती हैं।
2. मर्चेंट एक्सपोर्टर
- ऐसे व्यापारी जो स्वयं उत्पादन नहीं करते, बल्कि किसी सपोर्टिंग मैन्युफैक्चरर से उत्पाद खरीदकर उनका निर्यात करते हैं, उन्हें मर्चेंट एक्सपोर्टर कहा जाता है। निर्धारित शर्तों के तहत ऐसे निर्यातक भी एडवांस ऑथराइजेशन के दायरे में आ सकते हैं।
एडवांस ऑथराइजेशन और आपूर्ति:
एडवांस ऑथराइजेशन कई प्रकार की निर्यात और आपूर्ति गतिविधियों के लिए जारी किया जा सकता है। इनमें -
- प्रत्यक्ष निर्यात यानी फिजिकल एक्सपोर्ट
- इंटरमीडिएट सप्लाई
- निर्धारित श्रेणियों के लिए की जाने वाली डीम्ड एक्सपोर्ट सप्लाई
- विदेशी गंतव्य वाले जहाज या विमान में ‘स्टोर्स’ की आपूर्ति शामिल हैं।
- जहाज या विमान को ‘स्टोर्स’ की आपूर्ति के मामले में संबंधित वस्तुओं के लिए स्टैंडर्ड इनपुट-आउटपुट नॉर्म्स यानी एसआईओएन निर्धारित होना आवश्यक है।
एडवांस ऑथराइजेशन की समयावधि:
- एडवांस ऑथराइजेशन आमतौर पर जारी होने की तारीख से 12 महीने तक वैध रहता है।
- इस अवधि के दौरान योजना के तहत निर्धारित नियमों और शर्तों का पालन करना जरूरी होता है।
चीनी के मौजूदा नियम से इसका क्या संबंध है?
- थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक रखने की सीमा को 15 दिनों से बढ़ाकर 30 दिन करने के साथ सरकार ने यह शर्त रखी है कि 15 दिनों से अधिक का अतिरिक्त स्टॉक केवल एडवांस ऑथराइजेशन स्कीम के तहत आयात की गई चीनी से ही लिया जा सकता है।
- इसका अर्थ है कि सामान्य आयातित या घरेलू स्रोत से प्राप्त चीनी के आधार पर अतिरिक्त स्टॉक रखने की अनुमति इस विशेष व्यवस्था के तहत नहीं होगी। अतिरिक्त मात्रा के लिए एएएस के तहत आयात की गई चीनी का इस्तेमाल करना होगा।