संदर्भ
- हाल ही में पत्रिका Conservation Biology में प्रकाशित एक अध्ययन से यह संकेत मिला है कि असम में मानव–हाथी संघर्ष को नियंत्रित करने के उद्देश्य से गठित एंटी-डिप्रेडेशन स्क्वाड (Anti-Depredation Squads – ADS) के संचालन से अनपेक्षित रूप से हाथियों की आकस्मिक मौतों में लगभग 200–300 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। यह निष्कर्ष मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन की वर्तमान रणनीतियों पर पुनर्विचार की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
मानव–वन्यजीव संघर्ष (Human–Wildlife Conflict) के बारे में
अवधारणा
- मानव–वन्यजीव संघर्ष उस स्थिति को दर्शाता है जब मनुष्य और जंगली जीवों के बीच होने वाली पारस्परिक क्रियाएँ नकारात्मक परिणाम उत्पन्न करती हैं। ऐसी परिस्थितियों में दोनों पक्षों को नुकसान उठाना पड़ता है।
- एक ओर मनुष्यों को मानव मृत्यु, पशुधन पर हमले तथा कृषि फसलों के विनाश जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर वन्यजीवों को प्रतिशोधात्मक हत्या, आवास क्षति या दुर्घटनाजन्य मृत्यु का खतरा झेलना पड़ता है।
संघर्ष से संबंधित प्रमुख तथ्य
हाथियों की अस्वाभाविक मृत्यु
- भारत में प्रतिवर्ष लगभग 100 हाथियों की मृत्यु अप्राकृतिक कारणों से होती है। इनमें मुख्य रूप से—
- विद्युत करंट लगना
- रेलगाड़ियों से टकराव
- अवैध शिकार, जैसी घटनाएँ शामिल हैं।
मानव जीवन की हानि
- देश में हर वर्ष 500 से अधिक लोगों की मृत्यु हाथियों से जुड़े संघर्षों के कारण होती है। इस प्रकार की घटनाएँ विशेष रूप से ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम में अधिक देखी जाती हैं।
- आर्थिक प्रभाव
- मानव–वन्यजीव संघर्ष का आर्थिक पक्ष भी अत्यंत गंभीर है। हर वर्ष लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को नुकसान पहुँचता है, जिसके कारण सीमांत किसान अक्सर आर्थिक संकट और कर्ज के बोझ में फँस जाते हैं।
- हस्तक्षेप का प्रभाव
- असम के सोनितपुर जिले में किए गए अध्ययन के अनुसार जिन क्षेत्रों में ADS सक्रिय थे, वहाँ 14 वर्षों की अवधि में 14 अतिरिक्त हाथियों की मृत्यु दर्ज की गई, जबकि गैर-ADS क्षेत्रों में ऐसी घटनाएँ अपेक्षाकृत कम थीं।
- मानव–वन्यजीव संघर्ष में संतुलन की आवश्यकता
1. किसानों की आजीविका की सुरक्षा
- वन्यजीवों द्वारा फसलों के नष्ट होने से ग्रामीण परिवारों की पूरे वर्ष की आय प्रभावित हो सकती है। उदाहरण: सोनितपुर के चाय बागानों और कृषि क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही के कारण स्थानीय समुदायों को अपनी फसलों की रक्षा के लिए सामूहिक निगरानी व्यवस्था विकसित करनी पड़ती है।
2. प्रमुख प्रजातियों का संरक्षण
- हाथियों को पारिस्थितिकी तंत्र के अभियंता (Ecosystem Engineers) के रूप में माना जाता है क्योंकि वे वन पारिस्थितिकी के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण: ADS सक्रिय क्षेत्रों में हाथियों की दुर्घटनाजन्य मृत्यु में 2–3 गुना वृद्धि असम की लगभग 5000 हाथियों की आबादी के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए खतरा बन सकती है।
3. ग्रामीण समुदायों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य
- वन्यजीव हमलों के निरंतर भय से सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जीवन गुणवत्ता और मानसिक सुरक्षा प्रभावित होती है। उदाहरण: ADS का गठन मूल रूप से इस उद्देश्य से किया गया था कि ग्रामीण लोग सामूहिक रूप से हाथियों को दूर भगाकर स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सकें और प्रतिशोधात्मक हिंसा की घटनाएँ कम हों।
4. पारिस्थितिक गलियारों का संरक्षण
- मानव–वन्यजीव संघर्ष का प्रभाव हाथियों के प्राकृतिक प्रवासन मार्गों (migration corridors) पर भी पड़ता है। उदाहरण: ADS द्वारा प्रयोग किए जाने वाले सर्चलाइट और शोर से घबराकर हाथी सुरक्षित गलियारों से भटक जाते हैं और कभी-कभी रेलवे ट्रैक या अन्य खतरनाक अवसंरचनाओं की ओर चले जाते हैं।
5. राज्य और समुदाय के बीच सहयोग
- संघर्ष प्रबंधन के प्रभावी उपाय वन विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच विश्वास को मजबूत कर सकते हैं। उदाहरण: असम में ADS के माध्यम से समुदायों को वन विभाग के साथ सहयोग के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिससे जहर या अवैध जाल जैसे खतरनाक उपायों का उपयोग कम हुआ।
अब तक उठाए गए प्रमुख कदम
एंटी-डिप्रेडेशन स्क्वाड (ADS)
- यह स्थानीय स्वयंसेवकों से बने समूह होते हैं जो सर्चलाइट, पटाखों और अन्य साधनों की सहायता से हाथियों को मानव बस्तियों से दूर भगाने का प्रयास करते हैं।
प्रोजेक्ट एलीफेंट (1992)
- यह केंद्र सरकार की प्रमुख योजना है जिसका उद्देश्य हाथियों के संरक्षण, प्रबंधन और उनके गलियारों की सुरक्षा के लिए राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करना है।
रैखिक अवसंरचना से संबंधित दिशा-निर्देश
- राष्ट्रीय राजमार्गों और रेलमार्गों पर अंडरपास और ओवरपास जैसी संरचनाएँ विकसित की जा रही हैं ताकि वन्यजीव सुरक्षित रूप से पार कर सकें।
प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली
- SMS अलर्ट, थर्मल सेंसर और विशेष ‘एलीफेंट सेल’ के माध्यम से हाथियों की गतिविधियों की निगरानी कर ग्रामीणों को समय रहते सूचना दी जाती है।
प्रमुख चुनौतियाँ
भय का परिदृश्य (Landscape of Fear)
- आक्रामक तरीके से जानवरों को भगाने से कभी-कभी विपरीत परिणाम सामने आते हैं, क्योंकि इससे वे अधिक घबराए और असावधान हो जाते हैं। उदाहरण: अध्ययन के अनुसार असम में डराए गए हाथी अक्सर खाइयों में गिर जाते हैं या रेलगाड़ियों से टकरा जाते हैं, क्योंकि उनका ध्यान पीछा करने वालों पर केंद्रित रहता है।
आवास का विखंडन
- विकास परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्र छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित हो जाते हैं, जिससे वन्यजीवों को मानव बस्तियों के बीच से गुजरना पड़ता है। उदाहरण: सोनितपुर क्षेत्र में वर्षों से वन आवरण घटने के कारण हाथियों की आवाजाही चाय बागानों और ब्रह्मपुत्र नदी के तटों के आसपास बढ़ गई है।
अपर्याप्त प्रशिक्षण
- कई बार उचित प्रशिक्षण के अभाव में संगठित दल अनियंत्रित भीड़ का रूप ले लेते हैं। उदाहरण: वर्ष 2019 में पर्यावरण मंत्रालय की समीक्षा में पाया गया कि ADS द्वारा पटाखों का असंगठित उपयोग उनकी प्रभावशीलता को कम कर देता है।
डेटा की कमी और कम रिपोर्टिंग
- वन विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच विश्वास की कमी के कारण कई घटनाएँ आधिकारिक आँकड़ों में दर्ज नहीं हो पातीं।
संघर्ष की मौसमी प्रकृति
- समय के साथ वन्यजीव इन उपायों के आदी हो जाते हैं, जिससे रोकथाम के उपायों की प्रभावशीलता घटने लगती है।
आगे की राह
निष्क्रिय रोकथाम उपायों को बढ़ावा
- पटाखों जैसे आक्रामक साधनों की जगह मधुमक्खी बाड़ (Bee fencing) या मिर्च आधारित अवरोध जैसे शांतिपूर्ण उपाय अपनाए जाने चाहिए।
वैज्ञानिक मूल्यांकन
- ADS के विस्तार से पहले उनके प्रभाव का वैज्ञानिक और सांख्यिकीय विश्लेषण करना आवश्यक है।
सामुदायिक बीमा और मुआवजा
- किसानों के लिए त्वरित मुआवजा और फसल बीमा योजनाएँ लागू करने से उन्हें वन्यजीवों का पीछा करने की आवश्यकता कम होगी।
स्मार्ट अवसंरचना
- हाथी गलियारों में ट्रेनों के लिए सेंसर आधारित गति नियंत्रण प्रणाली लागू की जा सकती है।
आवास पुनर्स्थापन
- सोनितपुर जैसे क्षेत्रों में वन गलियारों के पुनर्वनीकरण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि हाथियों का मानव बस्तियों में प्रवेश कम हो।
निष्कर्ष
- असम से प्राप्त अध्ययन यह दर्शाता है कि संरक्षण के उद्देश्य से अपनाई गई कुछ रणनीतियाँ अनजाने में वन्यजीवों की मृत्यु दर बढ़ा सकती हैं, विशेषकर जब वे भय और आक्रामकता पर आधारित हों।
- इसलिए मानव–वन्यजीव संघर्ष के प्रबंधन में पीछा करने या डराने की रणनीतियों के स्थान पर वैज्ञानिक, शांतिपूर्ण और सह-अस्तित्व आधारित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। ग्रामीण समुदायों की सुरक्षा और भारत के राष्ट्रीय धरोहर पशु—हाथी के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए डेटा-आधारित नीति सुधार अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे।