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भारत में बढ़ता व्यापार घाटा और विदेशी मुद्रा का संकट

संदर्भ 

  • हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से आर्थिक अनुशासन अपनाने की एक अनूठी अपील की है। उन्होंने नागरिकों से पेट्रोलियम उत्पादों, खाद्य तेल और अनावश्यक सोने की खरीद को एक साल के लिए टालने का आग्रह किया है। इसके अलावा, गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं से बचने, स्थानीय (मेड इन इंडिया) उत्पादों को प्राथमिकता देने, सार्वजनिक परिवहन व इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) का उपयोग बढ़ाने और पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने के लिए वर्क फ्रॉम होम जैसे कोविड-कालीन उपायों को फिर से अपनाने की सलाह दी है।  
  • इस गंभीर अपील का एकमात्र मुख्य उद्देश्य देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को कम करना है। यह कदम ऐतिहासिक रूप से असाधारण है; क्योंकि ऐसा संकटकाल 1991 के उस दौर में भी नहीं देखा गया था जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मात्र 1 अरब डॉलर से नीचे चला गया था और देश को अपने अंतरराष्ट्रीय भुगतानों के लिए सोना गिरवी रखना पड़ा था।  

व्यापार घाटे का रिकॉर्ड स्तर 

  • वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा 17% की भारी बढ़ोतरी के साथ 333 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है। इस घाटे की मुख्य वजह निर्यात का 442 अरब डॉलर पर स्थिर रहना और आयात का 7% बढ़कर 775 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच जाना है।   
  • सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति यह है कि पश्चिम एशिया (अमेरिका-इज़राइल और ईरान) के भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 53% तक बढ़ चुकी हैं, जिसका पूरा असर अभी भारतीय आयात आंकड़ों में दिखना बाकी है। जब ये आँकड़े सामने आएंगे, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो सकती है।  

आयात निर्भरता के चार मुख्य उत्पाद समूह 

वर्ष 2025-26 के दौरान भारत का बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार मुख्य रूप से चार क्षेत्रों में खर्च हुआ:

सोना और चांदी (कीमती धातुएं) 

  • देश के कुल आयात में कीमती धातुओं की हिस्सेदारी लगभग 12% (90 अरब डॉलर से अधिक) रही। अप्रैल 2026 में सोने का आयात सालाना आधार पर 82% बढ़ गया। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण निवेशक भौतिक सोने और गोल्ड ईटीएफ की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। सरकार ने आयात को हतोत्साहित करने के लिए सीमा शुल्क बढ़ाकर 15% कर दिया है, लेकिन मांग में कमी की संभावना फिलहाल कम दिखती है।  

खाद्य तेल 

  • कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का 56% से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है।
  • वित्तीय वर्ष 2025-26 में खाद्य तेल के आयात में 12% और अप्रैल 2026 में इसमें 40% की भारी वृद्धि दर्ज की गई। घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन बढ़ाने में असमर्थ रहने के कारण ही सरकार को अब जनता से खपत कम करने की अपील करनी पड़ रही है। 

उर्वरक संकट 

  • वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतें बढ़ने से देश पर दोहरा वित्तीय बोझ पड़ा है – 
    • एक तरफ विदेशी मुद्रा का नुकसान और 
    • दूसरी तरफ सब्सिडी का बढ़ता बोझ 
  • दिसंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच वैश्विक उर्वरक कीमतों में 46% का उछाल आया, जबकि यूरिया के दाम दोगुने हो गए। 
  • पश्चिम एशिया के संकट के कारण भारत का उर्वरक आयात बिल करीब 80% बढ़ गया है, जिससे यूरिया की आयात निर्भरता बढ़कर 50% से अधिक होने की आशंका है।  

इलेक्ट्रॉनिक्स और तकनीक 

  • आत्मनिर्भर भारत और पीएलआई (PLI) योजनाओं के छह साल बाद भी कई प्रमुख क्षेत्रों में उम्मीद के मुताबिक प्रगति नहीं हुई है। इलेक्ट्रॉनिक घटकों (Components) का आयात पिछले वर्ष 20% से अधिक बढ़ा है। 
  • वहीं, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के प्रयास में इस्तेमाल होने वाली बैटरियों और संचायकों (Accumulators) का आयात भी 2025-26 में 50% तक बढ़ गया है।  

भारतीय रुपये पर बढ़ता दबाव 

  • इस अत्यधिक व्यापार घाटे का सीधा और प्रतिकूल असर भारतीय रुपये पर पड़ रहा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये को तेजी से गिरने से बचाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। 
  • हालाँकि, केंद्रीय बैंक के लिए भी यह राह आसान नहीं है। फरवरी 2026 के अंत से अब तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 21 अरब डॉलर से अधिक घट चुका है। ऐसे में विदेशी मुद्रा भंडार में और अधिक गिरावट को रोकना देश की आर्थिक सेहत के लिए बेहद जरूरी हो गया है। 

आगे की राह 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील अल्पकालिक रूप से नागरिकों के व्यवहार में बदलाव लाकर मांग को कुछ कम जरूर कर सकती है, लेकिन यह इस गंभीर आपदा का स्थायी इलाज नहीं है। भारत को इस चक्रवात से बाहर निकलने के लिए तात्कालिक उपायों से आगे बढ़कर दीर्घकालिक ढाँचागत सुधारों (Structural Reforms) की आवश्यकता है:  

  • तिलहन और उर्वरक मिशन : खाद्य तेलों और यूरिया के मामले में मिशन मोड पर काम करते हुए घरेलू उत्पादन को युद्ध स्तर पर बढ़ाना होगा, ताकि कृषि क्षेत्र देश के लिए विदेशी मुद्रा बचाने का माध्यम बने, न कि उसे गँवाने का। 
  • पीएलआई योजना का पुनर्मूल्यांकन : पीएलआई योजनाओं को सिर्फ अंतिम उत्पाद (जैसे मोबाइल फोन असेंबल करना) तक सीमित रखने के बजाय, इलेक्ट्रॉनिक घटकों (चिप्स, कैपेसिटर, बैटरी सेल्स) के जमीनी स्तर पर निर्माण के लिए बाध्यकारी बनाना होगा।
  • ऊर्जा सुरक्षा : कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने के लिए केवल इलेक्ट्रिक वाहनों के आयातित मॉडलों पर निर्भर रहने के बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट, बायो-फ्यूल्स और ग्रीन-हाइड्रोजन जैसे स्वदेशी विकल्पों को तेजी से धरातल पर उतारना होगा। 

वस्तुतः भारत इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ आर्थिक राष्ट्रवाद और वास्तविक जमीनी आत्मनिर्भरता केवल नारे नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता और आर्थिक स्थिरता को अक्षुण्ण रखने की अनिवार्य शर्तें बन चुके हैं।

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