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मैकमोहन रेखा और भारत-चीन LAC विवाद

चर्चा में क्यों ?

  • अमेरिकी सरकार की हालिया रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया कि चीन अरुणाचल प्रदेश को अपने “मुख्य हितों” में शामिल मानता है।  

प्रमुख बिन्दु:

  • अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा वस्तुतः भारत-चीन सीमा विवाद का ही एक हिस्सा है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल, तिब्बत की ऐतिहासिक स्थिति और बाद की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में निहित हैं। 
  • इस विवाद को समझने के लिए सबसे पहले मैकमोहन रेखा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।

मैकमोहन रेखा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • मैकमोहन रेखा का उद्भव वर्ष 1913–14 के शिमला सम्मेलन से जुड़ा है, जिसमें ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। 
  • यह सम्मेलन पूर्णाधिकार प्राप्त प्रतिनिधियों के स्तर पर आयोजित किया गया था। मार्च 1914 में भारतीय और तिब्बती प्रतिनिधियों के बीच पत्रों के आदान-प्रदान के माध्यम से भारत-तिब्बत सीमा को औपचारिक रूप दिया गया और इसे मानचित्रों पर अंकित किया गया। यही रेखा आगे चलकर मैकमोहन रेखा के नाम से जानी गई। 
  • 27 अप्रैल 1914 को तीनों पक्षों ने शिमला संधि के मसौदे पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, जब 3 जुलाई 1914 को अंतिम संधि पर हस्ताक्षर का समय आया, तो चीनी प्रतिनिधि ने इससे इंकार कर दिया, जबकि भारत और तिब्बत ने हस्ताक्षर कर दिए।
  • महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चीन की आपत्तियाँ भारत-तिब्बत सीमा को लेकर नहीं थीं, बल्कि “आंतरिक तिब्बत” और “बाह्य तिब्बत” की स्थिति को लेकर थीं। उस समय तिब्बत की स्थिति भी स्पष्ट थी। 
  • वर्ष 1911 में किंग राजवंश के पतन के बाद चीन का तिब्बत पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं रह गया था। 
  • तिब्बती सरकार ने स्वतंत्र रूप से अपने क्षेत्र का प्रशासन किया और बाहरी मामलों में भी भाग लिया।
  • चीन ने तिब्बत पर वास्तविक नियंत्रण वर्ष 1950 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के प्रवेश के बाद ही स्थापित किया। 
  • इस ऐतिहासिक तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि मैकमोहन रेखा उस समय के वैध तिब्बती प्राधिकरण और ब्रिटिश भारत के बीच तय की गई थी, न कि किसी एकतरफा औपनिवेशिक निर्णय के रूप में।

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की उत्पत्ति

  • भारत-चीन सीमा विवाद में “वास्तविक नियंत्रण रेखा” या LAC की अवधारणा अपेक्षाकृत बाद में सामने आई। 
  • इसका पहला उल्लेख 7 नवंबर 1959 को चीनी प्रधानमंत्री झोउ एनलाई द्वारा प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे गए पत्र में मिलता है। 
  • झोउ ने LAC को उस रेखा के रूप में परिभाषित किया जहाँ तक दोनों पक्षों का वास्तविक नियंत्रण था और प्रस्ताव रखा कि दोनों देशों की सेनाएँ पूर्व में मैकमोहन रेखा से और पश्चिम में वास्तविक नियंत्रण की रेखा से 20 किलोमीटर पीछे हट जाएँ। भारत ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
  • वर्ष 1962 के युद्ध के बाद, हालांकि भारत ने इस अवधारणा को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया था, लेकिन जमीनी वास्तविकताओं के चलते LAC एक व्यावहारिक तथ्य बनकर उभरी। 
  • उसी वर्ष नवंबर में झोउ एनलाई ने एशियाई और अफ्रीकी देशों के नेताओं को लिखे पत्र में 7 नवंबर 1959 की LAC का पालन करने का प्रस्ताव दोहराया और एक नक्शा भी संलग्न किया। भारत ने इसे इसलिए अस्वीकार किया क्योंकि इससे अक्साई चिन पर चीनी कब्ज़े को वैधता मिल जाती।

LAC की लचीली और विवादित प्रकृति

  • चीन की LAC की अवधारणा कभी स्थिर नहीं रही। पश्चिमी क्षेत्र, अर्थात लद्दाख में, एलएसी को चीनी दावा रेखा के अनुरूप बताया गया, जबकि यह दावा रेखा समय के साथ बदलती रही। 
  • वर्ष 1956 से 1960 के बीच जारी किए गए चीनी नक्शों में भारत के प्रति दावे लगातार बढ़ते गए और 1962 के संघर्ष के बाद जमीनी सैन्य कब्ज़ा इन दावों से भी आगे निकल गया।
  • पूर्वी क्षेत्र में चीन यह स्वीकार करता रहा कि LAC मैकमोहन रेखा के अनुरूप है, लेकिन उसकी व्याख्या भारत से अलग रही। 
  • चीन ने मूल मानचित्रों की शाब्दिक व्याख्या पर ज़ोर दिया, जबकि भारत का तर्क यह रहा कि सीमा की व्याख्या क्षेत्र के उच्चतम जलविभाजक सिद्धांत के आधार पर की जानी चाहिए। यही व्याख्यात्मक अंतर आज भी विवाद का प्रमुख कारण बना हुआ है।
  • सिक्किम और मध्य क्षेत्र में भी स्थिति स्पष्ट नहीं रही। सिक्किम में चीन ने 1890 के एंग्लो-चीनी समझौते के आधार पर जलविभाजक सीमा को स्वीकार किया, लेकिन उसके भारतीय हिस्से में कुछ क्षेत्रों पर दावा जताया।
  • उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे मध्य क्षेत्रों में भी जलविभाजक के दक्षिण में चीनी दावे सामने आए।

LAC पर भारत-चीन समझौते

  • 1980 के दशक के मध्य में वांगदुंग (सुम्दोरोंग चू) में चीनी अतिक्रमण और भारत की सख्त सैन्य प्रतिक्रिया के बाद सीमा तनाव चरम पर पहुँच गया। 
  • वर्ष 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा से संबंधों में स्थिरता तो आई, लेकिन सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए एक औपचारिक ढांचे की आवश्यकता स्पष्ट हो गई।
  • इसी पृष्ठभूमि में सितंबर 1993 में प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव की चीन यात्रा के दौरान सीमा शांति और स्थिरता समझौते पर हस्ताक्षर हुए। 
  • इस समझौते में पहली बार भारत ने औपचारिक रूप से LAC की अवधारणा को स्वीकार किया, लेकिन चीन की 7 नवंबर 1959 वाली LAC को नहीं। समझौते में यह स्पष्ट किया गया कि अंतिम सीमा निर्धारण होने तक दोनों पक्ष LAC का सम्मान करेंगे।
  • वर्ष 1996 में एक और सैन्य समझौता हुआ, जिसमें LAC के संरेखण पर “सामान्य समझ” विकसित करने और नक्शों के आदान-प्रदान की बात कही गई। हालांकि, यह प्रक्रिया कभी पूरी नहीं हो सकी। 
  • मध्य क्षेत्र के नक्शों का आदान-प्रदान तो हुआ, लेकिन पश्चिमी क्षेत्र में चीन ने नक्शे साझा करने से इंकार कर दिया। लगभग 2004 के बाद यह पूरी प्रक्रिया ठप पड़ गई, जिससे एलएसी की अस्पष्टता बनी रही।

अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावे  

  • अरुणाचल प्रदेश में भारत का प्रभावी नियंत्रण जलविभाजक सीमा तक है। केवल कुछ सीमित क्षेत्रों, जैसे नामका चू, सुम्दोरोंग चू और लोंगजू के कुछ हिस्सों में ही चीनी अतिक्रमण रहा है। इसके बावजूद चीन ने समय के साथ अपने दावों को और अधिक आक्रामक बना दिया है।
  • वर्ष 1960 और 1970 के दशकों में चीन “पैकेज प्रस्ताव” के तहत पूर्व में भारत की स्थिति और पश्चिम में चीन की स्थिति को स्वीकार करने को तैयार दिखता था। लेकिन 1985 के बाद चीन ने अपना रुख बदल लिया और यह कहना शुरू किया कि सबसे बड़ा विवाद पूर्वी क्षेत्र में है और भारत को वहाँ “ठोस रियायतें” देनी होंगी। 
  • वर्ष 2005 के राजनीतिक मापदंड समझौते के दौरान भी चीन ने इस रुख को दोहराया, जिसे भारत ने अस्वीकार कर दिया।
  • इसके बाद चीन ने “ज़ांगनान” या “दक्षिण तिब्बत” की अवधारणा को फिर से सक्रिय किया, अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदलने शुरू किए और भारतीय नागरिकों को परेशान करने जैसे कदम उठाए। 
  • ये सभी कार्रवाइयाँ संकेत देती हैं कि चीन अरुणाचल प्रदेश के प्रश्न को केवल कूटनीतिक दबाव के साधन के रूप में नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य के रूप में देख रहा है।

निष्कर्ष

आज LAC की अस्पष्टता चीन के लिए एक रणनीतिक लाभ का साधन बन चुकी है। समय के साथ चीन की नीति अधिक आक्रामक और “ग्रे ज़ोन ऑपरेशनों” पर आधारित होती जा रही है, जिसमें वह खुले युद्ध से बचते हुए जमीनी हकीकत को धीरे-धीरे बदलने की कोशिश करता है। अरुणाचल प्रदेश पर उसके दावे ऐतिहासिक रूप से कमजोर हैं, लेकिन व्यवहारिक रूप से गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं।

प्रश्न.  मैकमोहन रेखा का संबंध किस सम्मेलन से है ?

(a) लंदन सम्मेलन (1907)

(b) शिमला सम्मेलन (1913–14)

(c) पेरिस शांति सम्मेलन (1919)

(d) जिनेवा सम्मेलन (1925)

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