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औद्योगिक ऊष्मा सुरक्षा और भारत की ऊर्जा रणनीति

संदर्भ 

  • हाल के समय में वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा आपूर्ति शृंखला में व्यवधान का सीधा प्रभाव औद्योगिक उत्पादन पर पड़ सकता है। गुजरात के मोरबी जैसे औद्योगिक शहर (बड़ी मात्रा में सिरेमिक टाइलों का उत्पादन) और पंजाब का लुधियाना (वस्त्र एवं होजरी उद्योग का प्रमुख केंद्र) इस स्थिति का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। गैस आपूर्ति में कमी के कारण इन क्षेत्रों में कई औद्योगिक इकाइयाँ अस्थायी रूप से बंद होने की स्थिति में पहुँच गई हैं।
  • इस संकट की पृष्ठभूमि में अमेरिका एवं ईरान के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के अस्थिर होते सामरिक महत्व को देखा जा सकता है। चूँकि भारत अपनी प्राकृतिक गैस का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा प्रभाव घरेलू उद्योगों पर पड़ता है। हाल ही में गैर-प्राथमिकता वाले औद्योगिक क्षेत्रों के लिए गैस आपूर्ति में कटौती से यह समस्या अधिक स्पष्ट हो गई है।
  • यह स्थिति इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि भारत को केवल ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने की ही आवश्यकता नहीं है, बल्कि औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक ऊष्मा के स्रोतों में भी आत्मनिर्भरता विकसित करनी होगी। इसे व्यापक रूप से तापीय स्वतंत्रता की अवधारणा के रूप में समझा जा सकता है। 

औद्योगिक उत्पादन में ऊष्मा की केंद्रीय भूमिका 

  • औद्योगिक उत्पादन की अनेक प्रक्रियाएँ उच्च तापमान पर आधारित होती हैं। उदाहरण के लिए वस्त्र उद्योग में रंगाई एवं फिनिशिंग के लिए भाप की आवश्यकता होती है जो प्राय: गैस आधारित बॉयलरों से प्राप्त की जाती है। इसी प्रकार सिरेमिक उद्योग में टाइलों को अत्यधिक तापमान पर पकाने के लिए गैस-चालित भट्टियों का उपयोग किया जाता है।
  • दशकों से इन प्रक्रियाओं में कोयला और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग होता रहा है किंतु यह प्रणाली ऊर्जा दक्षता की दृष्टि से भी सीमित है क्योंकि पारंपरिक बॉयलर और भट्टियाँ बड़ी मात्रा में ऊर्जा को व्यर्थ कर देती हैं। 

वैकल्पिक तकनीकों की संभावनाएँ 

  • नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते उपयोग के बावजूद उद्योगों के लिए आवश्यक प्रत्यक्ष ऊष्मा उत्पादन अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। सौर फोटोवोल्टिक प्रणाली बिजली उत्पादन के लिए उपयुक्त है किंतु औद्योगिक प्रक्रियाओं में आवश्यक उच्च तापमान उत्पन्न करने में इसकी भूमिका सीमित है।
  • ऐसी स्थिति में कंसन्ट्रेटेड सोलर थर्मल (CST) तकनीक एक संभावित समाधान के रूप में उभरती है। 
  • इसके अतिरिक्त, विद्युत आधारित हीटिंग तकनीकें भी औद्योगिक ऊष्मा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इंडक्शन हीटिंग में विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र के माध्यम से सीधे पदार्थ के भीतर ऊष्मा उत्पन्न की जाती है जिससे ऊर्जा दक्षता अधिक हो जाती है। 
  • इसी प्रकार, प्लाज़्मा आधारित तकनीकें अत्यधिक उच्च तापमान उत्पन्न करने में सक्षम हैं और सिरेमिक जैसे उद्योगों में उपयोगी हो सकती हैं।

कंसन्ट्रेटेड सोलर थर्मल (CST) तकनीक के बारे में

इस तकनीक में दर्पणों के माध्यम से सूर्य के प्रकाश को एक बिंदु पर केंद्रित किया जाता है जिससे किसी द्रव को उच्च तापमान तक गर्म किया जा सकता है और उससे भाप उत्पन्न की जा सकती है। वस्त्र उद्योग जैसी प्रक्रियाओं में, जहाँ 100 से 180 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान की आवश्यकता होती है, यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है।

सी.एस.टी. प्रौद्योगिकी के प्रकार 

  • निम्न तापमान वाले सौर तापीय तंत्र : फ्लैट प्लेट कलेक्टर (FPC), इवैक्यूएटेड ट्यूब कलेक्टर (ETC) और कंपाउंड पैराबोलिक कंसंट्रेटर (CPC) के साथ एकीकृत इवैक्यूएटेड ट्यूब
  • मध्यम तापमान वाले सौर तापीय तंत्र : परवलयिक डिश, परवलयिक गर्त सांद्रक, लीनियर फ्रेस्नेल रिफ्लेक्टर (Linear Fresnel Reflector)
  • उच्च तापमान सौर तापीय प्रणालियाँ (ऊष्मा व विद्युत उत्पादन) : दोहरी अक्षीय ट्रैक वाला फ्रेस्नेल रिफ्लेक्टर, परवलयिक-आधारित डिश, केंद्रीय टॉवर रिसीवर 

अवसंरचनात्मक चुनौतियाँ 

  • हालाँकि, इन तकनीकों के उपयोग में अनेक संभावनाएँ हैं किंतु इनके व्यापक कार्यान्वयन के लिए कुछ प्रमुख चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। 
  • यदि बड़े औद्योगिक क्षेत्र अचानक विद्युत आधारित ऊष्मा प्रणालियों की ओर बढ़ते हैं, तो इससे बिजली प्रणाली पर भारी दबाव पड़ सकता है। वर्तमान में औद्योगिक ऊष्मा देश की कुल ऊर्जा खपत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए इसका बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण ऊर्जा अवसंरचना के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
  • इसके अलावा, अधिकांश उद्योग चौबीसों घंटे संचालित होते हैं जबकि सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय स्रोतों की उपलब्धता निरंतर नहीं होती है। इस कारण ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (जैसे- बैटरी भंडारण और पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज) का विस्तार अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
  • स्थानीय वितरण अवसंरचना भी एक महत्वपूर्ण बाधा है। कई औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली वितरण नेटवर्क पहले से ही अपनी क्षमता की सीमा के करीब कार्य कर रहे हैं। उच्च क्षमता वाली विद्युत हीटिंग प्रणालियों के लिए अतिरिक्त सबस्टेशन और मजबूत वितरण तंत्र की आवश्यकता होगी। 

नीति-स्तरीय पहल की आवश्यकता 

  • भारत को औद्योगिक ऊष्मा के क्षेत्र में दीर्घकालिक समाधान विकसित करने के लिए एक समग्र नीति दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय तापीय नीति की परिकल्पना उपयोगी हो सकती है। 
  • वर्तमान में सरकार के प्रोत्साहन मुख्य रूप से बिजली उत्पादन, विशेषकर सौर ऊर्जा, पर केंद्रित हैं जबकि प्रत्यक्ष ऊष्मा उत्पादन तकनीकों को अपेक्षाकृत कम समर्थन प्राप्त है।
  • सरकार यदि CST जैसी तकनीकों के निर्माण और उपयोग को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करे, तो इस क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है। 
  • इसके साथ ही कार्बन बाजार तंत्र को मजबूत करके उद्योगों को उत्सर्जन में कमी से प्राप्त लाभ को आर्थिक रूप से उपयोग करने का अवसर भी दिया जा सकता है।

हाइब्रिड मॉडल और वैश्विक अनुभव 

  • औद्योगिक क्षेत्रों के लिए पूर्ण रूप से नई प्रणाली अपनाना हमेशा व्यावहारिक नहीं होता है। इसलिए हाइब्रिड मॉडल अधिक व्यवहारिक समाधान प्रदान कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, दिन के समय सौर तापीय ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है जबकि रात में गैस आधारित बैकअप प्रणाली काम कर सकती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहाँ सौर तापीय ऊर्जा को पारंपरिक औद्योगिक प्रणालियों के साथ जोड़ा गया है। इसी प्रकार यूरोप में कुछ देशों ने ऐसे मॉडल विकसित किए हैं जिनमें बाहरी कंपनियाँ उद्योगों के लिए ऊष्मा उत्पादन प्रणाली स्थापित करती हैं और उद्योग केवल उपयोग के अनुसार ऊष्मा खरीदते हैं। 

निष्कर्ष 

  • वर्तमान वैश्विक परिस्थितियाँ यह संकेत देती हैं कि औद्योगिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह केवल बिजली उत्पादन में ही नहीं बल्कि औद्योगिक ऊष्मा के क्षेत्र में भी स्वदेशी एवं टिकाऊ विकल्प विकसित करे। 
  • यदि तकनीकी नवाचार, अवसंरचना विकास और नीति समर्थन को एकीकृत किया जाए, तो भारत न केवल ऊर्जा आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है बल्कि औद्योगिक क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ भी बना सकता है।
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