संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि कोविड-19 टीकाकरण के बाद गंभीर दुष्प्रभाव झेलने वाले या मृत्यु का सामना करने वाले लोगों के लिए ‘नो-फॉल्ट’ (No-Fault) मुआवजा व्यवस्था तैयार की जाए।
- न्यायालय ने कहा कि पीड़ित परिवारों को अदालतों में जाकर लापरवाही साबित करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। व्यापक टीकाकरण अभियान के दौरान नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य जिम्मेदारी है, इसलिए सरकार को एक स्पष्ट एवं सुसंगठित मुआवजा तंत्र विकसित करना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष वैक्सीन से जुड़ी याचिकाएँ
- सर्वोच्च न्यायालय ने उन परिवारों की याचिकाओं पर विचार किया, जिनके बच्चों या जीवनसाथियों की मृत्यु कोविड-19 टीकाकरण के बाद हुई थी। इन मृतकों की आयु लगभग 18 से 40 वर्ष के बीच बताई गई।
- वर्ष 2021 में कोविशील्ड और कोवैक्सिन वैक्सीन लेने के बाद कुछ दुर्लभ जटिलताएँ (जैसे- रक्त के थक्के बनने की समस्या) सामने आईं जिन्हें याचिकाकर्ताओं ने मृत्यु का कारण बताया।
याचिकाकर्ताओं के प्रमुख तर्क
- सूचित सहमति का अभाव: याचिकाकर्ताओं का कहना था कि टीकाकरण से पहले संभावित जोखिमों की जानकारी लोगों को पर्याप्त रूप से नहीं दी गई। उनके अनुसार सरकार ने प्रभावी रूप से ‘इनफॉर्म्ड कंसेंट’ सुनिश्चित नहीं किया।
- टीकाकरण का अप्रत्यक्ष अनिवार्य होना: याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि यद्यपि सरकार ने टीकाकरण को औपचारिक रूप से स्वैच्छिक बताया था किंतु टीका रहित लोगों पर आरोपित प्रशासनिक प्रतिबंधों ने इसे व्यावहारिक रूप से अनिवार्य बना दिया, जिससे नागरिकों के मौलिक अधिकार प्रभावित हुए।
केंद्र सरकार का पक्ष
- सुरक्षा एवं नियामकीय स्वीकृति: केंद्र सरकार ने कहा कि कोविड वैक्सीन को आवश्यक वैज्ञानिक परीक्षणों और नियामकीय प्रक्रियाओं के बाद मंजूरी दी गई थी। साथ ही, टीकाकरण के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी के लिए भारत की ‘टीकाकरण पश्चात् प्रतिकूल घटना’ (Adverse Events Following Immunisation: AEFI) प्रणाली मजबूत है।
- वैक्सीन से जुड़ी मौतें अत्यंत दुर्लभ : सरकार के अनुसार टीकाकरण से संबंधित मृत्यु के मामले अत्यंत कम हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ रक्त-थक्का विकारों के लिए रिपोर्टिंग दर प्रति एक लाख डोज़ पर केवल 0.001 बताई गई।
- मौजूदा कानूनी विकल्प : सरकार ने यह भी कहा कि प्रभावित परिवार सिविल या उपभोक्ता अदालतों में जाकर वैक्सीन निर्माताओं के विरुद्ध लापरवाही सिद्ध कर मुआवजा प्राप्त कर सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
- न्यायालय ने यह सुझाव अस्वीकार कर दिया कि पीड़ित परिवारों को अलग-अलग मामलों में निचली अदालतों का सहारा लेना चाहिए।
- न्यायालय ने कहा कि वैक्सीन से जुड़ी समस्याओं में लापरवाही सिद्ध करना जटिल वैज्ञानिक तथ्यों पर निर्भर करता है जो सामान्य परिवारों के लिए अत्यधिक कठिन और बोझिल हो सकता है।
- इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि हर परिवार को अलग-अलग मुकदमा लड़ना पड़ेगा तो इससे अलग-अलग परिणाम सामने आ सकते हैं और राहत प्राप्त करने में असमानता पैदा हो सकती है जो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के सिद्धांत के विपरीत होगा।
नो-फॉल्ट देयता का सिद्धांत
- इन परिस्थितियों को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने नो-फॉल्ट लायबिलिटी के सिद्धांत का उल्लेख किया। इस सिद्धांत के अंतर्गत पीड़ितों को मुआवजा पाने के लिए किसी की गलती या लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं होती है।
- न्यायालय ने कहा कि ऐसा सिद्धांत भारतीय कानून में पहले से मौजूद है, जैसे- मोटर वाहन दुर्घटनाओं से संबंधित मुआवजा व्यवस्था में। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन एवं जापान जैसे देशों में भी वैक्सीन से होने वाली समस्याओं के मामलों में इसी प्रकार की मुआवजा योजनाएँ लागू हैं।
अनुच्छेद 21 और स्वास्थ्य का अधिकार
- इस निर्णय में संविधान के अनुच्छेद 21 का भी उल्लेख किया गया है जो जीवन एवं स्वास्थ्य के अधिकार को सुनिश्चित करता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य नागरिकों की पीड़ा के प्रति उदासीन नहीं रह सकता है। उसे लोगों के कल्याण एवं गरिमा की सुरक्षा करने वाले संरक्षक के रूप में कार्य करना चाहिए।
- चूँकि कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम सरकार द्वारा संचालित एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल थी, इसलिए दुर्लभ परिस्थितियों में गंभीर दुष्प्रभाव झेलने वाले नागरिकों की सहायता करना सरकार की जिम्मेदारी बनती है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए पूर्ण निर्णय का संदर्भ
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वह वैक्सीन की वैज्ञानिक वैधता पर पुनर्विचार नहीं कर रही है। इस संदर्भ में उसने वर्ष 2022 के ‘जैकब पुलियेल बनाम भारत संघ’ मामले का उल्लेख किया, जिसमें वैक्सीन स्वीकृति प्रक्रिया तथा AEFI निगरानी व्यवस्था को वैध माना गया था।
- हालाँकि, उस निर्णय में यह भी कहा गया था कि शारीरिक स्वायत्तता के सिद्धांत के अनुसार किसी व्यक्ति को जबरन टीका नहीं लगाया जा सकता है।
AEFI तंत्र की पर्याप्तता
पूर्व निर्णय के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने वैक्सीन से संबंधित मौतों की जांच के लिए एक नया विशेषज्ञ चिकित्सा बोर्ड गठित करने की मांग को भी खारिज कर दिया। अदालत के अनुसार, मौजूदा AEFI समितियाँ निगरानी और जांच के लिए पर्याप्त हैं।
मुआवजा नीति बनाने का निर्देश
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह कोविड-19 टीकाकरण से जुड़े गंभीर प्रतिकूल प्रभावों के मामलों के लिए शीघ्र एक नो-फॉल्ट मुआवजा ढाँचा तैयार करे और उसे सार्वजनिक रूप से जारी करे।
- साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी मुआवजा नीति को केंद्र सरकार द्वारा किसी प्रकार की गलती या कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कोविड-19 मृत्यु मुआवजा मामले से संबंध
- वैक्सीन से जुड़े मुआवजे पर सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला महामारी के दौरान दिए गए उसके एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय से भी जुड़ा हुआ है। वर्ष 2021 में ‘गौरव कुमार बंसल बनाम भारत संघ’ मामले में अदालत ने कोविड-19 से मरने वाले लोगों के परिवारों को आर्थिक सहायता देने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने का आदेश दिया था।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशानिर्देश
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने सितंबर 2021 में मुआवजा संबंधी दिशानिर्देश जारी किए।
- इनके अनुसार कोविड-19 से मृत्यु होने पर प्रत्येक मामले में ₹50,000 की अनुग्रह राशि प्रदान करने का प्रावधान किया गया, जिसका भुगतान राज्यों द्वारा राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से किया जाना था।
- प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए कुछ नियम भी निर्धारित किए गए। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु कोविड-19 परीक्षण में पॉजिटिव आने के 30 दिनों के भीतर होती है तो उसे कोविड-मृत्यु माना जाएगा। इसके अतिरिक्त मृत्यु प्रमाणपत्र से संबंधित विवादों के समाधान के लिए जिला स्तर पर शिकायत निवारण समितियाँ गठित की गईं।