- हाल ही में आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर के रामचंद्रपुरा अग्रहारम में स्थित ऐतिहासिक लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर के एक पत्थर के स्तंभ पर गजपति शासकों से संबंधित एक तेलुगु मध्ययुगीन शिलालेख खोजा गया है।
- इस खोज से यह संकेत मिलता है कि ओडिशा के गजपति शासकों का प्रभाव केवल ओडिशा तक सीमित नहीं था बल्कि दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों तक भी फैला हुआ था।

गजपति साम्राज्य
- गजपति साम्राज्य मध्यकालीन भारत का एक शक्तिशाली हिंदू राजवंश था, जो मुख्य रूप से कालिंग (आधुनिक ओडिशा) पर शासन करता था।
- इस साम्राज्य ने लगभग 1434 ई. से 1541 ई. तक शासन किया।
- “गजपति” शब्द का अर्थ होता है “हाथियों का स्वामी”, जो उस समय के शक्तिशाली सैन्य सामर्थ्य का प्रतीक था।
- गजपति शासकों ने ओडिशा को राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाया।
स्थापना और वंश
- गजपति साम्राज्य की स्थापना सूर्यवंशी वंश के शासक कपिलेंद्र देव (Kapilendra Deva) ने की।
- यह साम्राज्य पूर्वी गंगा वंश का उत्तराधिकारी माना जाता है।
- पूर्वी गंगा वंश के अंतिम शासक भानु देव चतुर्थ की मृत्यु के बाद कपिलेंद्र देव सत्ता में आए और गजपति साम्राज्य की नींव रखी।
- कपिलेंद्र देव ने सैन्य शक्ति और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से राज्य को तेजी से विस्तार दिया।
राजधानी और प्रशासन
- प्रारंभ में गजपति साम्राज्य की राजधानी कटक (Cuttack) में थी।बाद में भी कटक ही प्रशासनिक और राजनीतिक केंद्र बना रहा।
- गजपति शासकों ने एक मजबूत सैन्य व्यवस्था और क्षेत्रीय प्रशासन विकसित किया, जिसमें स्थानीय अधिकारियों और सामंतों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
साम्राज्य का विस्तार
15वीं शताब्दी में गजपति साम्राज्य अपने शक्ति के चरम पर था।
- साम्राज्य का विस्तार
- उत्तर में हुगली नदी (बंगाल) के क्षेत्र तक
- दक्षिण में कावेरी नदी (तमिलनाडु) तक
- पूर्वी तट के बड़े हिस्से पर उनका नियंत्रण था।
- गजपति शासकों ने
- आंध्र प्रदेश
- ओडिशा
- बंगाल के कुछ भाग
- तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
प्रमुख शासक
गजपति साम्राज्य के कुछ महत्वपूर्ण शासक निम्न थे –
- कपिलेंद्र देव (1434–1467)
- साम्राज्य के संस्थापक
- उन्होंने राज्य का सबसे बड़ा विस्तार किया।
- पुरुषोत्तम देव (1467–1497)
- सैन्य और प्रशासनिक सुधार किए।
- धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण दिया।
- प्रतापरुद्र देव (1497–1540)
- गजपति साम्राज्य के अंतिम शक्तिशाली शासक।
- उनके समय में भक्ति आंदोलन का प्रभाव बढ़ा और चैतन्य महाप्रभु का भी पुरी क्षेत्र में आगमन हुआ।
कला, संस्कृति और स्थापत्य
गजपति शासक कला और संस्कृति के महान संरक्षक थे।
- उन्होंने मंदिर स्थापत्य को विशेष संरक्षण दिया।
- ओडिशा की ओड़िया भाषा, साहित्य और नृत्य-संगीत को बढ़ावा मिला।
- प्रमुख स्थापत्य उदाहरण:
- कोणार्क सूर्य मंदिर संरक्षण (विश्व धरोहर स्थल)( ओडिशा के पुरी जिले में स्थित निर्माण 13वीं शताब्दी (लगभग 1250 ईस्वी) में पूर्वी गंग वंश के प्रतापी राजा नरसिंहदेव प्रथम (Narasimhadeva I) ने करवाया था। इसे 'ब्लैक पैगोडा' के नाम से भी जाना जाता है और यह भगवान सूर्य को समर्पित है।
- जगन्नाथ मंदिर, पुरी का विस्तार और संरक्षण(12वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा राजवंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंगा देव ने शुरू करवाया)
- गजपति काल में ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान मजबूत हुई, जिसे अक्सर ओडिशा का सांस्कृतिक पुनर्जागरण कहा जाता है।
विजयनगर से संघर्ष
- गजपति साम्राज्य की दक्षिण भारत में सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्विता विजयनगर साम्राज्य से थी।
- दोनों शक्तियाँ आंध्र प्रदेश और दक्षिणी तटीय क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं।
- कई युद्धों के कारण गजपति साम्राज्य की शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।
पतन के कारण
16वीं शताब्दी के प्रारंभ में गजपति साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। इसके मुख्य कारण थे –
- विजयनगर साम्राज्य के साथ लगातार युद्ध
- गोलकोंडा सल्तनत का बढ़ता प्रभाव
- आंतरिक राजनीतिक संघर्ष और कमजोर उत्तराधिकारी
- क्षेत्रीय शक्तियों का उदय
इन कारणों से गजपति साम्राज्य ने अपने दक्षिणी क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा खो दिया।
अंत और बाद का काल
- 16वीं शताब्दी के मध्य तक गजपति साम्राज्य का प्रभाव काफी कम हो गया।
- बाद में ओडिशा क्षेत्र पर अफगान और मुगल शक्तियों का नियंत्रण स्थापित हो गया।
- अंततः यह क्षेत्र 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुगल साम्राज्य के अधीन आ गया।