अंडमान और निकोबार में जनजातीय स्वशासन और प्रस्तावित चुनाव सुधार
संदर्भ
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह प्रशासन निकोबारी जनजातीय समुदाय की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था में व्यापक बदलाव की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। प्रस्ताव के तहत ऐसी चुनावी व्यवस्था लागू करने की योजना है, जो भारत के अन्य हिस्सों में प्रचलित लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के समान होगी। इस पहल में निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन, मतदाता सूचियों का निर्माण तथा जनजातीय परिषदों में महिलाओं के लिए आरक्षण जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं।
हालाँकि, इस प्रस्ताव ने समुदाय के भीतर गहरी बहस और चिंता को जन्म दिया है। कई जनजातीय नेताओं का मानना है कि यह कदम उनकी सदियों पुरानी स्वशासन प्रणाली को अधिक औपचारिक और नौकरशाही ढाँचे में बदल सकता है।
प्रस्तावित बदलावों को लेकर उठते प्रश्न
इस पहल को लेकर एक प्रमुख चिंता यह भी है कि यह व्यवस्था केंद्र सरकार की बड़ी विकास परियोजनाओं के प्रति अधिक अनुकूल नेतृत्व संरचना तैयार कर सकती है।
विशेष रूप से ग्रेट निकोबार द्वीप में, जहाँ स्थानीय जनजातीय नेतृत्व ₹91,000 करोड़ की कंटेनर पोर्ट, हवाई अड्डा और पर्यटन परियोजना का विरोध कर रहा है, वहाँ यह आशंका और भी अधिक गहरी हो जाती है।
प्रस्तावित नियम क्या हैं ?
15 मई को जिला प्रशासन द्वारा अधिसूचित “अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जनजातीय परिषद (मतदाता सूची तैयारी और चुनाव संचालन) नियम, 2026” में ग्राम और जनजातीय परिषदों के लिए पाँच वर्ष में एक बार चुनाव कराने की विस्तृत प्रक्रिया प्रस्तावित की गई है।
इन नियमों में निम्नलिखित प्रमुख प्रावधान शामिल हैं -
निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और मतदाता सूची तैयार करना
उम्मीदवारों के नामांकन, नाम वापसी और चुनाव प्रक्रिया के नियम
चुनाव संचालन के लिए प्रशासनिक ढांचा और जिम्मेदारियाँ
ग्राम और द्वीप स्तर पर प्रतिनिधि प्रणाली की संरचना
प्रस्ताव के अनुसार, प्रत्येक गाँव में पाँच से नौ कैप्टन चुने जाएंगे। इसके बाद द्वीप स्तर पर चीफ कैप्टन का प्रत्यक्ष चुनाव होगा। गाँव के प्रथम कैप्टन मिलकर वाइस-चीफ कैप्टन का चुनाव करेंगे। इस प्रकार गठित द्वीप जनजातीय परिषद में चीफ कैप्टन, वाइस-चीफ कैप्टन और सभी प्रथम कैप्टन शामिल होंगे।
यह मसौदा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (जनजातीय परिषद) विनियमन, 2009 के अंतर्गत तैयार किया गया है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा स्वायत्त जनजातीय स्वशासन के उद्देश्य से लागू किया गया था। हालांकि, इस विनियमन में जिला प्रशासन को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह किसी भी ऐसे निर्णय को रोक सके जो जनहित के विरुद्ध हो, असुविधा उत्पन्न करता हो या शांति भंग का कारण बनता हो।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान संरचना
निकोबारी समुदाय लगभग 30,000 जनसंख्या वाला एक अनुसूचित जनजाति समूह है, जिसकी स्वशासन प्रणाली पिछले पाँच–छह दशकों में विकसित हुई है। प्रत्येक बसे हुए द्वीप समूह की अपनी जनजातीय परिषद होती है, जिसके अंतर्गत ग्राम स्तर पर नेतृत्व संरचना कार्य करती है।
ग्राम स्तर पर प्रत्येक गाँव में तीन कैप्टन होते हैं - प्रथम, द्वितीय और तृतीय कैप्टन, जिनमें प्रथम कैप्टन प्रमुख भूमिका निभाता है। वर्तमान में कुल सात जनजातीय परिषदें कार निकोबार, नानकौरी, कमोर्टा, टेरेसा, लिटिल निकोबार और ग्रेट निकोबार सहित विभिन्न द्वीपों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
इतिहासकारों के अनुसार, कैप्टन पद की परंपरा 16वीं शताब्दी से जुड़ी है, जब निकोबारी समुदाय के लोग विदेशी जहाजों से संपर्क के दौरान स्वयं को कैप्टन के रूप में पहचान देने लगे थे। बाद में 19वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश प्रशासन ने इस संरचना को औपचारिक मान्यता प्रदान की।
यह व्यवस्था पारंपरिक संयुक्त परिवार प्रणाली तुहेत के साथ विकसित हुई, जो समुदाय और प्रशासन के बीच संवाद का माध्यम बनी। 1990 के दशक में जनजातीय परिषदों की अवधारणा को विकास योजनाओं में समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के लिए औपचारिक रूप दिया गया।
नेतृत्व चयन की मौजूदा प्रक्रिया
यद्यपि प्रशासन का दावा है कि ग्राम कैप्टन हर चार वर्ष में चुने जाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रक्रिया का कोई स्पष्ट और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण उपलब्ध नहीं है।
ग्रेट निकोबार के जनजातीय नेताओं के अनुसार, नेतृत्व का चयन आमतौर पर सामुदायिक सहमति के आधार पर किया जाता है। गाँव की बैठक में सभी निवासी भाग लेते हैं, नाम प्रस्तावित किए जाते हैं और मतदान के माध्यम से चयन होता है। कई बार यह प्रक्रिया स्वयं समुदाय द्वारा बनाए गए मतपत्रों और नियुक्त मतदान अधिकारियों के माध्यम से संपन्न होती है।
परिषद अध्यक्ष का चयन भी प्रायः सहमति आधारित होता है, हालांकि कई मामलों में वर्षों तक औपचारिक चुनाव नहीं हुए हैं।
चयन मानदंड और निर्णय प्रक्रिया
शोधकर्ताओं के अनुसार, नेतृत्व चयन में शिक्षा, हिंदी भाषा पर पकड़, बाहरी दुनिया का अनुभव और प्रशासनिक कौशल जैसे कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, वास्तवित निर्णय प्रक्रिया सामूहिक परामर्श पर आधारित रहती है।
महत्वपूर्ण यह भी है कि भले ही कैप्टन और परिषदें चुनी जाती हैं, लेकिन अंतिम निर्णय सामुदायिक चर्चाओं के माध्यम से लिए जाते हैं और उन्हें एकतरफा अधिकार प्राप्त नहीं होता।
प्रस्तावित बदलावों पर समुदाय की चिंताएँ
जनजातीय नेताओं का मानना है कि प्रस्तावित चुनावी व्यवस्था उनकी पारंपरिक शासन प्रणाली को जटिल और औपचारिक बना सकती है। उनके अनुसार, यह बदलाव शासन को एक प्रशासनिक कार्य में बदल देगा, जो उनके जीवन के प्राकृतिक और सामुदायिक ढाँचे से मेल नहीं खाता।
ग्रेट निकोबार के एक नेता के अनुसार, उनकी शासन प्रणाली पीढ़ियों से चली आ रही सहमति और सामूहिक निर्णय पर आधारित है, जिसे नई व्यवस्था कमजोर कर सकती है।
विशेषज्ञों की राय और प्रशासनिक दृष्टिकोण
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा प्रणाली में पारदर्शिता की कमी और अस्पष्टता जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं। कई परिषदों में यह स्पष्ट नहीं है कि चुनाव कब हुए और नेतृत्व की वास्तविक शक्तियाँ क्या हैं।
हालांकि, यह भी चिंता जताई जा रही है कि प्रस्तावित नियमों को समुदाय तक पूरी तरह समझाने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
निष्कर्ष
अंडमान और निकोबार में प्रस्तावित जनजातीय चुनाव सुधार एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा है, जिसमें आधुनिक लोकतांत्रिक ढाँचे और पारंपरिक स्वशासन प्रणाली के बीच संतुलन साधने की चुनौती है।
एक ओर यह कदम पारदर्शिता और प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की दिशा में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह आशंका भी बनी हुई है कि इससे समुदाय की पारंपरिक शासन व्यवस्था और सामाजिक संरचना प्रभावित हो सकती है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर व्यापक संवाद और सहमति की आवश्यकता स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है।