हाल ही में रक्षा उत्पादन विभाग ने छठी पीआईएल जारी की, जिसमें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 405 रक्षा वस्तुओं को शामिल किया गया है। इनसे लगभग 3,070 करोड़ रुपये की अनुमानित व्यावसायिक संभावनाएँ जुड़ी हैं।
भारत की रक्षा आवश्यकताओं में लंबे समय से आयात की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ने के साथ-साथ महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के लिए बाहरी निर्भरता भी बनी रहती है। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने हेतु सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation List—PIL) की व्यवस्था विकसित की है।
सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची क्या है?
पीआईएल रक्षा मंत्रालय द्वारा अधिसूचित ऐसी सूची है, जिसमें शामिल रक्षा वस्तुओं के लिए निर्धारित समय-सीमा के बाद विदेशी आयात पर प्रतिबंध लगाकर घरेलू स्रोतों से खरीद को बढ़ावा दिया जाता है।
इससे भारतीय सशस्त्र बलों की आवश्यकताओं को देश में निर्मित रक्षा उत्पादों से पूरा करने की दिशा में प्रोत्साहन मिलता है।
इसका व्यापक उद्देश्य विदेशी आयात पर निर्भरता कम करना तथा भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन एवं तकनीकी क्षमता को मजबूत करना है।
संस्थागत एवं नीतिगत ढाँचा
पीआईएल का संचालन मुख्यतः रक्षा उत्पादन विभाग (DDP), सैन्य कार्य विभाग (DMA) और रक्षा मंत्रालय (MoD) के माध्यम से किया जाता है।
इसका नीतिगत आधार रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) तथा आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत रक्षा क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ है।
इसके क्रियान्वयन में सृजन (SRIJAN) पोर्टल महत्वपूर्ण डिजिटल मंच है। अगस्त 2020 में शुरू किए गए इस पोर्टल पर आयातित रक्षा वस्तुओं से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई जाती है, ताकि भारतीय कंपनियाँ और स्टार्टअप उनके स्वदेशी विकास में रुचि दिखा सकें।
प्रमुख विशेषताएँ
चरणबद्ध आयात प्रतिबंध: प्रत्येक सूचीबद्ध वस्तु के लिए स्वदेशीकरण की समय-सीमा निर्धारित की जाती है। इससे भारतीय उद्योग को तकनीक विकसित करने, प्रोटोटाइप बनाने और उनका परीक्षण करने के लिए पर्याप्त समय मिलता है।
डीएमए और डीडीपी सूची: डीएमए सूची में प्रमुख रक्षा प्लेटफॉर्म एवं प्रणालियाँ, जैसे तोपें, कार्वेट, रडार और परिवहन विमान शामिल होते हैं। वहीं डीडीपी सूची में उप-असेंबली, लाइन रिप्लेसेबल यूनिट्स (LRUs), उच्च-सटीकता वाले सेंसर, गोला-बारूद तथा विशेष कच्चे माल जैसे महत्वपूर्ण घटक शामिल किए जाते हैं।
‘मेक’ श्रेणियों के माध्यम से विकास:स्वदेशीकरण के लिए मेक-I, मेक-II और मेक-III जैसी श्रेणियों का उपयोग किया जाता है। इनमें क्रमशः सरकारी वित्तपोषण, उद्योग द्वारा वित्तपोषित प्रोटोटाइप विकास तथा घरेलू विकल्पों के माध्यम से प्रतिस्थापन आधारित खरीद शामिल है।
गुणवत्ता एवं सुनिश्चित खरीद:घरेलू कंपनियों द्वारा सैन्य मानकों के अनुरूप उत्पाद विकसित और प्रमाणित किए जाने पर उन्हें सशस्त्र बलों तथा रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से खरीद के अवसर मिलते हैं। इससे उद्योग को निश्चित मांग और बाजार का भरोसा प्राप्त होता है।
महत्त्व
पीआईएल केवल आयात प्रतिबंध का साधन नहीं है, बल्कि यह रक्षा आत्मनिर्भरता की दीर्घकालीन रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे घरेलू रक्षा उद्योग को बाजार मिलता है, अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहन मिलता है तथा एमएसएमई और स्टार्टअप को रक्षा विनिर्माण से जुड़ने के अवसर प्राप्त होते हैं।
इसके अतिरिक्त, स्वदेशी उत्पादन से रोजगार, तकनीकी क्षमता और रक्षा आपूर्ति श्रृंखला मजबूत हो सकती है। दीर्घकाल में यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को भी सुदृढ़ करेगा।
निष्कर्ष
सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची भारत को आयात-निर्भर रक्षा व्यवस्था से आत्मनिर्भर एवं तकनीक-आधारित रक्षा उत्पादन प्रणाली की ओर ले जाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। हालांकि इसकी सफलता के लिए अनुसंधान एवं विकास, निजी क्षेत्र की भागीदारी, गुणवत्ता मानकों, समयबद्ध खरीद और तकनीकी नवाचार पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। वस्तुतः पीआईएल का मूल उद्देश्य केवल आयात को रोकना नहीं, बल्कि भारत में ऐसी प्रतिस्पर्धी रक्षा औद्योगिक क्षमता विकसित करना है जो घरेलू आवश्यकताओं के साथ-साथ वैश्विक बाजार की मांग भी पूरी कर सके।