संदर्भ
भारत ने मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण-रोधी अभिसमय (UNCCD) के 17वें कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (COP17) के दौरान एक आधिकारिक साइड इवेंट में भारत के घासस्थलों तथा अन्य खुले प्राकृतिक पारितंत्रों (Open Natural Ecosystems—ONEs) पर अपनी पहली व्यापक राष्ट्रीय मार्गदर्शिका जारी की।
यह मार्गदर्शिका क्या है?
यह भारत के वन-रहित खुले प्राकृतिक पारितंत्रों के लिए पहली व्यापक राष्ट्रीय ज्ञान एवं संरक्षण रूपरेखा है। इसमें देश के विभिन्न खुले पारितंत्रों की;
- भौगोलिक स्थिति एवं विविधता,
- पारिस्थितिक विशेषताएँ,
- पारितंत्र सेवाएँ,
- कार्बन अवशोषण एवं भंडारण क्षमता तथा
- सामाजिक-आर्थिक महत्ता का वैज्ञानिक तरीके से दस्तावेजीकरण किया गया है।
उद्देश्य:
- इसका उद्देश्य घासस्थलों और अन्य खुले पारितंत्रों को केवल ‘बंजर भूमि’ मानने के बजाय स्वतंत्र एवं मूल्यवान पारिस्थितिक तंत्र के रूप में समझने और संरक्षित करने की दिशा में वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराना है।
घासस्थल क्या हैं?
- घासस्थल (Grasslands) ऐसे स्थलीय पारितंत्र हैं जहाँ वनस्पति का मुख्य स्वरूप घास, सेज तथा अन्य शाकीय पौधों से बना होता है और वृक्षों का आवरण बहुत कम या लगभग अनुपस्थित रहता है।
- इन पारितंत्रों की संरचना मुख्यतः निम्न कारकों से प्रभावित होती है:
- स्थानीय जलवायु,
- जंगली एवं पालतू पशुओं की चराई,
- प्राकृतिक आग की आवृत्ति एवं चक्र तथा
- क्षेत्र की मिट्टी और जल संबंधी परिस्थितियाँ।
- इसलिए घासस्थलों को केवल ऐसे क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जहाँ पेड़ नहीं हैं। पेड़ों का कम होना कई खुले पारितंत्रों की प्राकृतिक पारिस्थितिक विशेषता है।
खुले प्राकृतिक पारितंत्र (ONEs) क्या हैं?
- ओपन नेचुरल इकोसिस्टम्स (ONEs) घासस्थलों से कहीं व्यापक अवधारणा है। इसमें ऐसे प्राकृतिक, गैर-वन क्षेत्र शामिल होते हैं जहाँ वृक्षों का घनत्व कम और खुला भू-दृश्य प्रमुख होता है।
- इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार के पारितंत्र आते हैं, जैसे;
- ठंडे और गर्म मरुस्थल — थार, स्पीति और लद्दाख;
- उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय सवाना तथा झाड़ीदार क्षेत्र;
- लवणीय आर्द्रभूमि एवं मरुस्थलीय समतल क्षेत्र — बन्नी और कच्छ का रण;
- बीहड़ एवं अपरदित भू-भाग — चंबल क्षेत्र;
- पथरीले एवं लेटराइट पठार;
- उच्च पर्वतीय अल्पाइन घासभूमियाँ — बुग्याल और मर्ग।
- इस प्रकार खुले प्राकृतिक पारितंत्र भारत की अत्यंत विविध भौगोलिक एवं पारिस्थितिक परिस्थितियों को समाहित करने वाली व्यापक श्रेणी है।
मार्गदर्शिका का प्रमुख उद्देश्य:
- इस पहल का मूल उद्देश्य घासस्थलों और अन्य खुले प्राकृतिक पारितंत्रों की पारिस्थितिक महत्ता को मान्यता देना तथा उन्हें देश की जैव-विविधता संरक्षण नीतियों में बेहतर ढंग से शामिल करना है।
- इसके साथ ही वैज्ञानिक आधार पर पुनर्स्थापन (Restoration) को बढ़ावा देकर भारत की भूमि क्षरण तटस्थता (Land Degradation Neutrality—LDN) संबंधी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में सहायता करना इसका महत्वपूर्ण लक्ष्य है।
मार्गदर्शिका की प्रमुख विशेषताएँ:
1. देशव्यापी भौगोलिक एवं पारिस्थितिक मानचित्रण
- मार्गदर्शिका भारत के विभिन्न खुले प्राकृतिक पारितंत्रों के स्थानिक वितरण और पारिस्थितिक विशेषताओं को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करती है।
- इसमें हिमालयी अल्पाइन घासभूमियों से लेकर तराई की बाढ़-प्रभावित घासभूमियों, दक्कन के सवाना क्षेत्रों, बन्नी के मैदानों और थार के मरुस्थलीय झाड़ीदार क्षेत्रों तक विभिन्न पारितंत्रों को शामिल किया गया है।
2. वैज्ञानिक एवं विषयगत अध्ययन
- मार्गदर्शिका में खुले पारितंत्रों से जुड़े कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन किया गया है, जैसे:
- चरवाहा समुदायों की मौसमी एवं पारंपरिक गतिशीलता,
- चरागाहों की स्थिति एवं परिवर्तन,
- आग की पारिस्थितिकी,
- मिट्टी में कार्बनिक कार्बन का भंडारण,
- जल विज्ञान एवं जल-चक्र तथा
- रेंजलैंड की पारिस्थितिक गतिशीलता।
- विशेष रूप से मिट्टी के भीतर मौजूद जैविक कार्बन (Soil Organic Carbon—SOC) को जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया है।
3. स्थानीय एवं पारंपरिक सामुदायिक प्रबंधन
- मार्गदर्शिका में स्थानीय समुदायों और आदिवासी तथा पशुपालक समूहों द्वारा लंबे समय से संरक्षित एवं प्रबंधित खुले क्षेत्रों के महत्व को भी रेखांकित किया गया है। इसके उदाहरण हैं -
- ओरण (Orans) — राजस्थान आदि क्षेत्रों में सामुदायिक/पवित्र संरक्षित भू-क्षेत्र;
- गोचर (Gauchars) — गाँवों के सामुदायिक चरागाह;
- घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू पशुपालक समुदायों की पारंपरिक चराई व्यवस्थाएँ।
- इससे संरक्षण में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक शासन की भूमिका स्पष्ट होती है।
4. हरित आवरण बढ़ाने की गलत धारणा पर पुनर्विचार
- मार्गदर्शिका का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हर खुले प्राकृतिक क्षेत्र में वृक्षारोपण करना आवश्यक रूप से पारिस्थितिक पुनर्स्थापन नहीं है।
- ऐसे प्राकृतिक रूप से वृक्ष-विहीन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण:
- स्थानीय एवं स्थानिक जैव-विविधता को प्रभावित कर सकता है,
- भूजल की स्थिति में बदलाव ला सकता है,
- घासभूमि की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुँचा सकता है तथा
- उन प्रजातियों के आवास को नष्ट कर सकता है जो खुले पारितंत्रों पर निर्भर हैं।
- इसलिए ‘पेड़ लगाना ही हर स्थिति में पर्यावरण संरक्षण है’ जैसी सामान्य धारणा के स्थान पर क्षेत्र-विशिष्ट पारिस्थितिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
5. भूमि क्षरण तटस्थता के लिए उपयोगी साधन
- यह मार्गदर्शिका यूएनसीसीडी के अंतर्गत भारत की भूमि क्षरण तटस्थता (LDN) प्रतिबद्धताओं तथा सतत विकास लक्ष्य (SDG) 15.3 के क्रियान्वयन में वैज्ञानिक आधार प्रदान कर सकती है।
- इसके माध्यम से नीति-निर्माताओं, वन विभागों और शोधकर्ताओं को खुले प्राकृतिक पारितंत्रों की स्थिति का आकलन करने तथा उनके वैज्ञानिक पुनर्स्थापन एवं संरक्षण के लिए मानकीकृत संकेतक और दिशानिर्देश उपलब्ध होंगे।
निष्कर्ष
- भारत के घासस्थल और अन्य खुले प्राकृतिक पारितंत्र जैव-विविधता, पशुपालन, स्थानीय आजीविका, मृदा संरक्षण, जल-चक्र और कार्बन भंडारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। फिर भी लंबे समय तक इन्हें वन क्षेत्रों की तुलना में कम पारिस्थितिक महत्व वाला माना जाता रहा।
- नई राष्ट्रीय मार्गदर्शिका इस दृष्टिकोण में बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसका मूल संदेश यह है कि हर भूमि को वन में बदलना संरक्षण नहीं है; संरक्षण का अर्थ प्रत्येक पारितंत्र की प्राकृतिक विशेषताओं को समझकर उसी के अनुरूप प्रबंधन करना है। वस्तुतः इस दृष्टिकोण से घासस्थलों और ओपन नेचुरल इकोसिस्टम्स (ONEs) का संरक्षण भारत के जैव-विविधता संरक्षण, जलवायु कार्रवाई, सतत आजीविका और भूमि क्षरण तटस्थता के लक्ष्यों को एक साथ आगे बढ़ा सकता है।