- भारत में घटते बाल लिंगानुपात और कन्या भ्रूण हत्या की समस्या पर चिंता व्यक्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में पूर्व-गर्भाधान एवं प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (PCPNDT Act) के सख्त क्रियान्वयन की आवश्यकता पर जोर दिया है।
- न्यायालय ने कहा कि समाज में पुत्र-प्राथमिकता की गहरी जड़ें और पितृसत्तात्मक सोच आज भी लिंग-चयन जैसी कुप्रथाओं को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे देश में लिंगानुपात गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।
- न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने एक चिकित्सक द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। यह अपील PCPNDT अधिनियम की धारा 23 के तहत कथित अपराधों के संज्ञान लिए जाने के आदेश के विरुद्ध दायर की गई थी।
लिंगानुपात की चुनौती और न्यायालय की चिंता
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा वर्षों से विभिन्न योजनाओं और अभियानों के माध्यम से कन्या भ्रूण हत्या एवं लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से कम बना हुआ है।
- न्यायालय ने जनगणना के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत का बाल लिंगानुपात (0-6 वर्ष आयु वर्ग) लगातार गिरा है—
- 1991 में : 945 लड़कियां प्रति 1000 लड़के
- 2001 में : 927 लड़कियां प्रति 1000 लड़के
- 2011 में : 919 लड़कियां प्रति 1000 लड़के
- ये आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि कन्या भ्रूण हत्या और लिंग-चयन की प्रवृत्ति ने समाज में गंभीर जनसांख्यिकीय असंतुलन उत्पन्न किया है। इसी कारण PCPNDT अधिनियम को कठोरता से लागू करना आवश्यक है।
PCPNDT अधिनियम, 1994 क्या है ?
पूर्व-गर्भाधान एवं प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 को देश में गिरते लिंगानुपात को रोकने और भ्रूण के लिंग निर्धारण पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से बनाया गया था।
प्रमुख विशेषताएं
- अधिनियम 1994 में पारित हुआ तथा 1996 से लागू हुआ।
- गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग बताना या जानना अवैध है।
- लिंग-चयन और कन्या भ्रूण हत्या पर प्रतिबंध लगाता है।
- अल्ट्रासाउंड केंद्रों, जेनेटिक काउंसलिंग केंद्रों और प्रयोगशालाओं का अनिवार्य पंजीकरण आवश्यक है।
- उल्लंघन करने पर चिकित्सकों का लाइसेंस निलंबित या रद्द किया जा सकता है।
- दोषी पाए जाने पर कारावास और आर्थिक दंड का प्रावधान है।
भारत में लिंगानुपात के असंतुलन के प्रमुख कारण
- पितृसत्तात्मक समाज और पुत्र-प्राथमिकता :-भारतीय समाज के अनेक हिस्सों में पुत्र को परिवार का वारिस, आर्थिक सहारा और वंश आगे बढ़ाने वाला माना जाता है। इसके विपरीत बेटियों को अक्सर आर्थिक बोझ के रूप में देखा जाता है।
- दहेज प्रथा और विवाह संबंधी परंपराएं :-दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियां बेटियों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देती हैं। विवाह के बाद बेटी का दूसरे परिवार में जाना (पितृस्थानीय व्यवस्था) भी पुत्र की प्राथमिकता को मजबूत करता है।
- लैंगिक असमानता:-शिक्षा, रोजगार, संपत्ति अधिकार और निर्णय-निर्माण में महिलाओं की सीमित भागीदारी लैंगिक भेदभाव को बनाए रखती है।
- आधुनिक तकनीक का दुरुपयोग :-अल्ट्रासाउंड और अन्य प्रसवपूर्व जांच तकनीकों का उपयोग चिकित्सा उद्देश्यों के बजाय भ्रूण का लिंग जानने और कन्या भ्रूण हत्या के लिए किया जाता रहा है।
- कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन :-यद्यपि PCPNDT अधिनियम तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) में कठोर प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में निगरानी और प्रवर्तन की कमी के कारण अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सके हैं।
- वैश्विक लैंगिक असमानता संकेतक :-भारत की रैंकिंग हालिया Global Gender Gap Report 2025 में 148 देशों में 131वें स्थान पर पहुंच गई, जो देश में लैंगिक समानता की चुनौतियों को दर्शाती है।
लिंगानुपात असंतुलन के दुष्परिणाम
- महिलाओं की संख्या में कमी
- मानव तस्करी और बाल विवाह जैसी समस्याओं में वृद्धि
- विवाह योग्य महिलाओं की कमी
- सामाजिक अस्थिरता और अपराधों में वृद्धि
- महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और शोषण का बढ़ना
- जनसांख्यिकीय संतुलन पर नकारात्मक प्रभाव
सरकार की प्रमुख पहलें
- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (BBBP) :-यह योजना कन्या भ्रूण हत्या रोकने, बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने तथा समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। वर्तमान में इसे मिशन शक्ति के अंतर्गत समाहित किया गया है।
- सुकन्या समृद्धि योजना :-बालिकाओं के भविष्य को सुरक्षित बनाने हेतु शुरू की गई बचत योजना, जो शिक्षा और विवाह के लिए वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती है।
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) :-गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करने वाली इस योजना में अब दूसरे बच्चे के रूप में बेटी के जन्म पर भी लाभ उपलब्ध कराया जाता है।
- लाड़ली लक्ष्मी योजना :-बालिकाओं के जन्म, शिक्षा और सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करने वाली महत्वपूर्ण राज्य स्तरीय योजना।
- जननी सुरक्षा योजना :-संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार लाने वाली प्रमुख योजना।
आगे की राह
लिंगानुपात की समस्या केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और मानसिकता से जुड़ी चुनौती है। PCPNDT अधिनियम का कठोर पालन आवश्यक है, किंतु इसके साथ-साथ समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण, महिलाओं की सुरक्षा और समान अवसरों के माध्यम से ही लैंगिक समानता का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।