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पैराक्वाट : एक घातक खरपतवारनाशक और तेलंगाना में प्रतिबंध

चर्चा में क्यों?

हाल ही में तेलंगाना सरकार ने पैराक्वाट पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। इसके साथ ही तेलंगाना भारत का तीसरा राज्य बन गया है जिसने इस अत्यधिक विषैले खरपतवारनाशक के उपयोग पर रोक लगाई है। इससे पहले केरल और ओडिशा भी इस दिशा में कदम उठा चुके हैं।

पैराक्वाट क्या है ?

  • पैराक्वाट एक अत्यधिक जहरीला रासायनिक खरपतवारनाशक (Herbicide) है, जिसका उपयोग खेतों में खरपतवार और अवांछित घास को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
  • यह एक कृत्रिम (Synthetic) रसायन है। इसकी खोज 1880 के दशक में एक रासायनिक रंग (Chemical Dye) के रूप में हुई थी। 1950 के दशक में इसके खरपतवारनाशक गुणों का पता चला। 1960 के दशक में इसे व्यावसायिक रूप से Gramoxone नाम से बेचा जाने लगा।
  • यह गैर-चयनात्मक संपर्क खरपतवारनाशक (Non-selective Contact Herbicide) है, अर्थात यह किसी भी पौधे को नष्ट कर सकता है। इसका उपयोग कटाई से पहले फसल को सुखाने (Desiccant) तथा पौध वृद्धि नियामक (Plant Growth Regulator) के रूप में भी किया जाता है।
  • मिट्टी में इसका कोई दीर्घकालिक अवशेष प्रभाव नहीं रहता।

तेलंगाना में प्रतिबंध क्यों लगाया गया ?

  • 31 मार्च 2026 को तेलंगाना सरकार ने पैराक्वाट के निर्माण, बिक्री, वितरण और उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • सरकार का तर्क था कि यह रसायन किसानों और आम नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है तथा आत्महत्या के मामलों में इसका व्यापक उपयोग हो रहा था।

पैराक्वाट इतना खतरनाक क्यों है?

  • पैराक्वाट को दुनिया के सबसे घातक खरपतवारनाशकों में गिना जाता है।
  • इसकी प्रमुख विशेषताएं
    • बहुत कम मात्रा भी जानलेवा हो सकती है।
    • इसका कोई प्रभावी प्रतिरोधक (Antidote) उपलब्ध नहीं है।
    • शरीर में प्रवेश करने के बाद तेजी से अंगों को नुकसान पहुंचाता है।
  • शरीर पर प्रभाव
    • मुंह, गले और आंतों की परत को जला देता है।
    • रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में फैल जाता है।
    • गुर्दों (Kidneys) को नुकसान पहुंचाता है।
    • यकृत (Liver) को प्रभावित करता है।
    • फेफड़ों में फाइब्रोसिस (Fibrosis) उत्पन्न करता है।
    • बहु-अंग विफलता (Multiple Organ Failure) का कारण बन सकता है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, पैराक्वाट विषाक्तता के 70% से अधिक मामलों में मृत्यु हो जाती है।

अस्पतालों की भयावह स्थिति

  • पैराक्वाट विषाक्तता की गंभीरता का अंदाजा हैदराबाद के गांधी अस्पताल में किए गए एक अध्ययन से लगाया जा सकता है। 
  • अध्ययन के अनुसार वर्ष 2024-25 के दौरान पैराक्वाट विषाक्तता के 217 मामले दर्ज किए गए। इनमें 54 प्रतिशत पीड़ित किसान थे, जबकि 16 प्रतिशत छात्र थे। 
  • अध्ययन किए गए 100 मामलों में से 94 प्रतिशत मामले आत्महत्या से जुड़े पाए गए, जबकि 5 प्रतिशत मामले दुर्घटनावश विषाक्तता के थे। 
  • डॉक्टरों के अनुसार पैराक्वाट के लिए कोई विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है और मरीजों को केवल सहायक चिकित्सा   ही दी जा सकती है।

डॉक्टरों का अभियान : "Doctors Against Paraquat"

  • पैराक्वाट पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर हैदराबाद के चिकित्सक डॉ. मार्री महेश रेड्डी ने "Doctors Against Paraquat" नामक अभियान की शुरुआत की। 
  • इस पहल से तेलंगाना के 202 डॉक्टर जुड़े और उन्होंने किसानों के बीच जागरूकता अभियान चलाया। साथ ही राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की, सोशल मीडिया के माध्यम से जनमत तैयार किया तथा मुख्यमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री कार्यालय तक अपनी चिंताओं को पहुंचाया। 
  • डॉ. रेड्डी का कहना था कि "सांप के जहर का इलाज उपलब्ध है, लेकिन पैराक्वाट का कोई इलाज नहीं है।"

किसान अभी भी इसका उपयोग क्यों करते हैं?

  • अत्यधिक विषैला होने के बावजूद पैराक्वाट का उपयोग लंबे समय से किसानों द्वारा किया जाता रहा है। 
  • इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं। कृषि क्षेत्र में मजदूरों की कमी और बढ़ती मजदूरी लागत के कारण किसान ऐसे रसायनों पर निर्भर होते हैं जो कम समय में खरपतवारों को नष्ट कर सकें। 
  • पैराक्वाट तेजी से प्रभाव दिखाता है और इसकी कीमत भी अपेक्षाकृत कम, लगभग 280 रुपये प्रति लीटर, होती है।
  • वर्तमान में भारत में लगभग 80 लाख एकड़ कृषि भूमि पर इसका उपयोग किया जाता है।

भारत में बढ़ता उपयोग

  • लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारत में पैराक्वाट का उपयोग तेजी से बढ़ा है। 
  • वर्ष 2019-20 में जहां इसका आयात 8,598 टन था, वहीं वर्ष 2022-23 में यह बढ़कर 20,786 टन हो गया। 
  • अर्थात कुछ ही वर्षों में इसका आयात दोगुने से भी अधिक हो गया।

भारत में नियामक स्थिति

  • भारत में कीटनाशकों का नियमन मुख्य रूप से कीटनाशक अधिनियम, 1968 के अंतर्गत किया जाता है। हालांकि अभी तक देशभर में पैराक्वाट पर पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं किया गया है। 
  • केरल ने वर्ष 2011 में इस पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य बनने का गौरव प्राप्त किया। इसके बाद ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ने भी इसके उपयोग पर रोक लगा दी।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य

  • विश्व स्तर पर पैराक्वाट को अत्यधिक खतरनाक रसायन माना जाता है। 
  • यही कारण है कि 74 से अधिक देशों ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। 
  • इसके बावजूद कई देशों में इसका उपयोग जारी है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2013 में भारत ने Rotterdam Convention के अंतर्गत पैराक्वाट को "Severely Hazardous Pesticide" की सूची में शामिल करने के प्रस्ताव का विरोध किया था।

ऑनलाइन बिक्री की चुनौती

  • विशेषज्ञों का मानना है कि केवल राज्य स्तर पर प्रतिबंध लगाने से समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। 
  • प्रतिबंध के बाद Amazon और Flipkart जैसे बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों ने तेलंगाना में इसकी बिक्री बंद कर दी, लेकिन कई छोटे कृषि ई-कॉमर्स पोर्टलों पर यह अभी भी उपलब्ध है। 
  • इससे प्रतिबंध के प्रभाव को पूरी तरह लागू करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

उद्योग का पक्ष

  • कृषि रसायन उद्योग का तर्क है कि पैराक्वाट किसानों के लिए कम लागत वाला और प्रभावी विकल्प है।
  • उद्योग के अनुसार छोटे किसानों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी है तथा अचानक प्रतिबंध लगाने से उत्पादन लागत बढ़ सकती है और खरपतवार नियंत्रण की समस्या उत्पन्न हो सकती है।

तेलंगाना में प्रतिबंध का प्रारंभिक प्रभाव

  • डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार तेलंगाना में प्रतिबंध लागू होने के बाद पैराक्वाट से संबंधित मौतों में उल्लेखनीय कमी देखने को मिली है। 
  • जहां पहले प्रति माह लगभग 30 से 50 मौतें दर्ज होती थीं, वहीं अब यह संख्या घटकर 3 से 5 प्रति माह रह गई है।
  • हालांकि इस दावे की पुष्टि के लिए अभी दीर्घकालिक आंकड़ों और विस्तृत अध्ययनों की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

पैराक्वाट दुनिया के सबसे घातक खरपतवारनाशकों में से एक है। इसकी कम कीमत, आसान उपलब्धता और अत्यधिक विषाक्तता इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनाती है। तेलंगाना द्वारा लगाया गया प्रतिबंध किसानों और आम नागरिकों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पूरे देश में प्रतिबंध, ऑनलाइन बिक्री पर नियंत्रण और किसानों को सुरक्षित विकल्प उपलब्ध नहीं कराए जाते, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।

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