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भारतीय रुपया: आर्थिक मजबूती के बावजूद मूल्य में गिरावट

(प्रारंभिक परीक्षा: आर्थिक और सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास व रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ 

हाल ही में, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने खुले बाजार में बड़ी मात्रा में अमेरिकी डॉलर की बिक्री की, जिससे डॉलर की आपूर्ति बढ़ी और रुपए में लगभग 1% की मजबूती देखने को मिली। इसके बावजूद व्यापक परिदृश्य में देखें तो पिछले कुछ महीनों से रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है और डॉलर के मुकाबले कमजोर होता गया है। 

एक वर्ष से जारी गिरावट की प्रवृत्ति 

  • आर.बी.आई. के सक्रिय हस्तक्षेपों के बावजूद हाल के महीनों में रुपए की दिशा स्पष्ट रूप से अवमूल्यन की रही है। 
  • बीते एक वर्ष में भारतीय मुद्रा का मूल्य अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 6% कम हो गया है। यह गिरावट इस ओर संकेत करती है कि रुपए पर दबाव केवल अस्थायी बाजार उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं है बल्कि इसके पीछे कुछ गहरे संरचनात्मक कारण भी मौजूद हैं। 

रूपये के मूल्य में गिरावट का असामान्य होना 

  • रुपए की यह गिरावट इसलिए चौंकाने वाली प्रतीत होती है क्योंकि घरेलू आर्थिक संकेतक अपेक्षाकृत मजबूत हैं। 
  • भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, महंगाई काफी हद तक नियंत्रण में है और व्यापार घाटा तथा बाह्य ऋण जैसे बाह्य क्षेत्र के संकेतक भी स्थिर दिखाई देते हैं। ऐसे में सैद्धांतिक रूप से रुपए को मजबूत होना चाहिए था। 
  • इसके अलावा, पहले रुपए की कमजोरी का कारण वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती को माना जाता था किंतु हाल के महीनों में डॉलर स्वयं कमजोर हुआ है, फिर भी रुपया गिरता रहा। 
  • यह स्थिति इस तर्क को कमजोर करती है कि केवल वैश्विक कारक ही इसके लिए जिम्मेदार हैं और यह संकेत देती है कि भारतीय मुद्रा पर कुछ विशिष्ट घरेलू दबाव काम कर रहे हैं। 

रुपए के मूल्य में कमी के प्रमुख कारण

रुपए की इस भिन्न चाल के पीछे कई संरचनात्मक एवं वित्तीय कारक जिम्मेदार हैं:

व्यापार घाटे का निरंतर बढ़ता दबाव

भारत की आयात निर्भरता इसके निर्यात की तुलना में कहीं अधिक है। मूल्य के आधार पर बढ़ते आयात के कारण बाजार में अमेरिकी डॉलर की मांग बहुत अधिक है। जब आयातक अपने बिलों का भुगतान करने के लिए डॉलर खरीदते हैं तो रुपए की आपूर्ति बढ़ जाती है और इसका मूल्य गिर जाता है।

वैश्विक व्यापार नीतियाँ और टैरिफ बाधाएँ 

अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए उच्च दंडात्मक टैरिफ के कारण विदेशी बाजारों में भारतीय वस्तुएँ महंगी हो गई हैं। निर्यात की मांग घटने से देश में आने वाले डॉलर का प्रवाह कम हो गया है जिससे रुपए को मिलने वाला प्राकृतिक सहारा कमजोर पड़ गया है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में अनिश्चितता

लंबे समय से लंबित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते ने निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल पैदा किया है। राजनयिक तनाव और शुल्क संबंधी विवादों के कारण वैश्विक निवेशक भारत में पूंजी लगाने से हिचकिचा रहे हैं और ‘सुरक्षित निवेश’ (Risk-off) की तलाश में अन्य बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं।

पूंजी प्रवाह में गिरावट और निवेशकों का मोहभंग

  • वैश्विक शेयर बाजारों की तुलना में भारतीय शेयर बाजार (सेंसेक्स) का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा। जहाँ अमेरिका, चीन, जापान और यहाँ तक कि कोरिया के सूचकांकों ने 16% से 72% तक की भारी बढ़त दर्ज की है, वहीं भारत का सेंसेक्स केवल 8% के आसपास ही बढ़ सका।
  • विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों को उनके वास्तविक मूल्य से अधिक (Overvalued) मान रहे हैं जिससे नए निवेश में कमी आई है और पोर्टफोलियो से पैसा बाहर जा रहा है। 

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सक्रिय भूमिका

  • रुपए की विनिमय दर केवल बाजार की शक्तियों से ही निर्धारित नहीं होती है बल्कि इसमें RBI का हस्तक्षेप भी निर्णायक होता है।
  • RBI डॉलर की खरीद और बिक्री के माध्यम से रुपए के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने का प्रयास करता है।
  • कई बार ये हस्तक्षेप अल्पकालिक स्थिरता तो प्रदान करते हैं किंतु बाजार की गहरी संरचनात्मक समस्याओं (जैसे- पूँजी का बाहर जाना) के कारण रुपए पर दबाव बना रहता है।

रुपए की चाल को तय करने वाले प्रमुख कारक

बैंक ऑफ बड़ौदा के एक अध्ययन के अनुसार, अक्तूबर 2020 से नवंबर 2025 के बीच रुपए की विनिमय दर में बदलाव के पीछे तीन प्रमुख कारक रहे हैं।

कारक

प्रभाव का स्तर

विवरण

FPI प्रवाह

सर्वाधिक

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा पूंजी का आना या जाना रुपए की अल्पकालिक चाल का सबसे बड़ा चालक है।

फॉरवर्ड मार्केट पोजीशन

उच्च

RBI की फॉरवर्ड डॉलर पोजीशन स्पॉट मार्केट हस्तक्षेप की तुलना में बाजार को अधिक शक्तिशाली संकेत देती है।

स्पॉट मार्केट हस्तक्षेप

मध्यम

RBI द्वारा सीधे डॉलर की खरीद-बिक्री अल्पकालिक राहत तो प्रदान करती है किंतु यह संरचनात्मक प्रवृत्ति को नहीं बदल पाती है।

व्यापार घाटा का अपेक्षाकृत कम प्रभावी होने का कारण 

  • अध्ययन में यह पाया गया कि व्यापार घाटे का रुपए के अल्पकालिक उतार-चढ़ाव पर सीधा प्रभाव अपेक्षा से कम है। 
  • इसका कारण है कि व्यापार आंकड़े वास्तविक डॉलर प्रवाह की बजाय लेखांकन प्रविष्टियों को दर्शाते हैं।
  • इसके अलावा निर्यातकों को अपनी डॉलर आय को कुछ समय तक विदेश में रखने की अनुमति होती है जिससे विनिमय दर पर तत्काल प्रभाव नहीं पड़ता है। 

निष्कर्ष

  • कुल मिलाकर, रुपए की चाल को किसी एक आर्थिक कारक से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है। अध्ययन के अनुसार, किसी भी एक कारक से कुल उतार-चढ़ाव का केवल 13-14% ही स्पष्ट किया जा सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बाजार मनोविज्ञान, भू-राजनीतिक घटनाएँ एवं नीतिगत संकेत जैसे गैर-आर्थिक तत्व भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • हालाँकि, आरबीआई के हस्तक्षेप व फॉरवर्ड पोजीशन महत्वपूर्ण हैं किंतु अल्पकालिक रूप से विदेशी पोर्टफोलियो प्रवाह रुपए की दिशा तय करने में सबसे प्रभावी कारक बने हुए हैं। यही कारण है कि विनिमय दरें प्राय: पारंपरिक आर्थिक मूलभूत सिद्धांतों से आगे जाकर व्यवहार करती दिखाई देती हैं।  
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