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दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016: मुद्दे और सुझाव

(प्रारंभिक परीक्षा : राष्ट्रीय घटनाक्रम, आर्थिक एवं सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ 

हाल ही में जेट एयरवेज (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एवं अन्य बनाम श्री मुरारी लाल जालान और श्री फ्लोरियन फ्रिट्च एवं अन्य का संघ) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत की दिवालियापन व्यवस्था को प्रभावित करने वाली कई संरचनात्मक कमियों को उजागर किया है।

दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 के बारे में 

  • दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 (IBC) भारत में सभी संस्थाओं ‘कॉर्पोरेट’ एवं ‘व्यक्तियों’ दोनों के दिवालियेपन समाधान के लिए एक छत्रक कानून है।
  • कॉर्पोरेट व्यक्तियों के दिवालियेपन और परिसमापन से संबंधित प्रावधान 1 दिसंबर, 2016 को लागू हुए, जबकि कॉर्पोरेट देनदारों (CDs) के व्यक्तिगत गारंटरों से संबंधित प्रावधान 1 दिसंबर, 2019 को लागू हुए।
  • दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (IBC) का प्रभावी क्रियान्वयन राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) और उसके अपीलीय निकाय ‘राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT)’ के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।

IBC का उद्देश्य 

  • देनदार की परिसंपत्तियों का मूल्य अधिकतम करना 
  • उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करना
  • IBC मामलों का समय पर और प्रभावी समाधान सुनिश्चित करना 
  • लेनदारों, देनदारों एवं कर्मचारियों सहित सभी हितधारकों के हितों में संतुलन बनाना 
  • प्रतिस्पर्धी बाजार एवं अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में सहायता करना 
  • सीमा पार दिवालियापन मामलों से निपटने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करना

भारतीय दिवाला एवं दिवालियापन बोर्ड

  • स्थापना : 1 अक्तूबर, 2016
    • दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 के तहत 
  • मुख्यालय : नई दिल्ली
  • सदस्य :
    • एक अध्यक्ष 
    • केंद्र सरकार के अधिकारियों में से तीन सदस्य, जो संयुक्त सचिव या समकक्ष पद से निम्न न हों। 
      • इनमें से एक पदेन सदस्य वित्त मंत्रालय, कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय तथा कानून मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने के लिए होगा।
    • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा नामित एक पदेन सदस्य तथा
    • केंद्र सरकार द्वारा नामित पांच अन्य सदस्य, जिनमें से कम-से-कम तीन पूर्णकालिक सदस्य होते हैं।
  • सदस्यों का कार्यकाल : अध्यक्ष और सभी सदस्यों (पदेन सदस्यों को छोड़कर) का कार्यकाल पांच वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है। 
    • अध्यक्ष एवं सभी सदस्य पुनर्नियुक्ति के पात्र होते हैं।
  • कार्य : संहिता के विनियामक के रूप में कार्य करता है। 
    • यह पेशे के साथ-साथ प्रक्रियाओं को भी नियंत्रित करता है।

वर्तमान दिवाला एवं दिवालापन संहिता, 2016 (IBC) के ढांचे से संबंधित प्रमुख मुद्दे

संस्थागत क्षमता एवं संरचनात्मक कमियाँ

  • राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) कॉर्पोरेट दिवालियापन एवं कंपनी अधिनियम के मामलों को संभालते हैं, जिससे कार्य का बोझ बहुत बढ़ जाता है।
  • वर्ष 1999 में एराडी समिति की सिफारिशों के आधार पर NCLT की संरचना की परिकल्पना की गई थी और वर्ष 2016 में इसे क्रियान्वित किया गया, जो समकालीन जरूरतों के लिए अपर्याप्त है।
  • NCLT में केवल 63 सदस्य हैं जिनका समय कई पीठ (Bench) में विभाजित होता हैं जिससे देरी होती है।
    • कुछ पीठ पूरे कार्य दिवस के लिए कार्य नहीं करती हैं। 
  • दिवालियापन समाधान में देरी : दिवालियेपन समाधान के लिए औसत समय बढ़ हो गया है जो वित्त वर्ष 2022-23 में 654 दिन से बढ़कर 2023-24 में 716 दिन हो गया है। 

डोमेन विशेषज्ञता का अभाव 

  • दोनों न्यायाधिकरणों के सदस्यों के पास प्राय: दिवालियापन के जटिल मामलों के लिए आवश्यक विशेष ज्ञान का आभाव होता है।
    • जेट एयरवेज मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि विशेषज्ञता की कमी से उच्च-दावा वाले दिवालियापन मामलों में निर्णयन गुणवत्ता से समझौता होता है।

नौकरशाही अकुशलताएँ

  • तत्काल मामलों की लिस्टिंग के लिए कोई प्रभावी प्रणाली नहीं है, जिससे देरी होती है।
  • मामलों को सूचीबद्ध करने का व्यापक अधिकार रजिस्ट्री स्टॉफ के पास है जिससे असंगति एवं अक्षमताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • NCLT एवं NCLAT के कुछ सदस्यों द्वारा न्यायिक आदेशों की अवहेलना करने की बढ़ती प्रवृत्ति ने संस्थागत सत्यनिष्ठा के बारे में भी चिंताएँ उत्पन्न की हैं। 
  • इससे न्यायाधिकरणों की विश्वसनीयता को खतरा पैदा हो रहा है और न्यायिक प्रक्रिया कमजोर हो रही है।

वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) का कम उपयोग

  • मध्यस्थता जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तरीकों का सीमित उपयोग किया जाता है।
  • ADR तंत्र न्यायाधिकरणों पर बोझ को कम करने में मदद कर सकता है और औपचारिक सुनवाई की आवश्यकता के बिना त्वरित समाधान प्रदान कर सकता है।

सुधार के लिए सुझाव 

विशिष्ट बेंचों एवं डोमेन विशेषज्ञता का सृजन

  • दिवालियापन मामलों की विभिन्न श्रेणियों (जैसे- विलय, एकीकरण) के लिए विशेष बेंचों का निर्माण किया जा सकता है।
  • जटिल मामलों को प्रभावी ढंग से संभालने के लिए न्यायाधिकरण के सदस्यों के पास डोमेन-विशिष्ट ज्ञान (जैसे- वित्त, व्यवसाय एवं कानूनी ज्ञान) की अनिवार्यता सुनिश्चित की जानी चाहिए है।

उन्नत बुनियादी ढांचा 

अधिक न्यायालय कक्ष और योग्य व स्थायी कर्मचारियों के साथ बुनियादी ढांचे में सुधार किया जाना चाहिए। पर्याप्त सहायक बुनियादी ढांचा बेहतर कामकाज सुनिश्चित करेगा और मामलों की बढ़ती संख्या को संभालने में मदद करेगा।

प्रक्रियात्मक सुधार एवं नवाचार

देरी को कम करने के लिए प्रक्रियागत मामलों में नवाचार के लिए अतिरिक्त विकल्प तलाशें जाने चाहिए। त्वरित समाधानों के लिए दिवालियापन आवेदनों से पहले अनिवार्य मध्यस्थता सहित ADR तंत्र को एकीकृत किया जा सकता है।

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