संदर्भ
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी) विनियम, 2026 के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायालय ने निर्देश दिया कि अगले आदेश तक वर्ष 2012 के पूर्ववर्ती दिशानिर्देश लागू रहेंगे। साथ ही, न्यायालय ने यह चिंता भी व्यक्त की कि नए नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इससे समाज में विभाजन की संभावना उत्पन्न हो सकती है।
यूजीसी इक्विटी विनियम, 2026 पर रोक की पृष्ठभूमि
विवाद का मूल कारण
यह मामला यूजीसी द्वारा 14 वर्ष पुराने समानता संबंधी ढांचे को अधिक कठोर और कानूनी रूप से बाध्यकारी नियमों से प्रतिस्थापित करने के प्रयास से जुड़ा है। इन नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा परिसरों में जाति आधारित भेदभाव पर रोक लगाना था। हालांकि, 2026 के विनियमों ने व्यापक असहमति और विरोध को जन्म दिया।
2026 के दिशा-निर्देशों की प्रमुख विशेषताएँ
- वर्गीकृत परिभाषाएँ: सामान्य भेदभाव और विशेष रूप से जाति आधारित भेदभाव के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग को विशेष रूप से चिह्नित किया गया है।
- अनिवार्य संस्थागत संरचना: प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में समान अवसर केंद्र (EOC) की स्थापना, इक्विटी एंबेसडर और इक्विटी स्क्वाड की नियुक्ति अनिवार्य की गई है।
- कड़ी समय-सीमाएँ: शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर प्रारंभिक प्रतिक्रिया और 15 दिनों में विस्तृत जांच पूरी करने का प्रावधान किया गया है।
- दंडात्मक प्रावधान: अनुपालन न करने वाले संस्थानों की मान्यता रद्द की जा सकती है, उन्हें अनुदान से वंचित किया जा सकता है और यूजीसी योजनाओं से बाहर किया जा सकता है।
- प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व: संस्थान प्रमुख को व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि परिसर भेदभाव-मुक्त रहे।
- चौबीसों घंटे सहायता तंत्र: शिकायत दर्ज कराने के लिए 24×7 इक्विटी हेल्पलाइन और एक ऑनलाइन पोर्टल का संचालन अनिवार्य किया गया है।
सख्त यूजीसी नियमों की आवश्यकता : तर्क
- जाति आधारित भेदभाव पर प्रभावी नियंत्रण: वर्ष 2012 के दिशानिर्देश केवल परामर्शात्मक थे और उनमें बाध्यकारी शक्ति का अभाव था, जिसके कारण परिसरों में जवाबदेही के बिना बहिष्करण की प्रथाएँ जारी रहीं।
- छात्र आत्महत्याओं की गंभीर समस्या से निपटना: संरचनात्मक भेदभाव प्राय: सामाजिक अलगाव और शैक्षणिक हाशियाकरण का रूप ले लेता है जिसके लिए त्वरित और समयबद्ध हस्तक्षेप आवश्यक है, न कि धीमी शिकायत प्रक्रिया। उदाहरण: 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने आईआईटी दिल्ली में दलित छात्रों की आत्महत्याओं के एक चिंताजनक पैटर्न को संस्थागत उदासीनता से जोड़ा था।
- वित्तीय न्याय और छात्रवृत्तियों की समय पर उपलब्धता: छात्रवृत्तियों में देरी से आर्थिक असुरक्षा बढ़ती है जिससे हाशिए पर रहने वाले छात्र ऋण, पढ़ाई छोड़ने या मानसिक तनाव की ओर धकेले जाते हैं। उदाहरण: 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने छात्रवृत्ति से जुड़े लंबित मामलों के निपटारे के लिए चार महीने की समय-सीमा तय की, यह मानते हुए कि वित्तीय तनाव आत्महत्या का एक प्रमुख कारण हो सकता है।
- औपचारिकता बन चुकी शिकायत निवारण प्रणाली में सुधार: स्वायत्तता के अभाव में एससी/एसटी प्रकोष्ठ प्राय: वरिष्ठ संकाय के विरुद्ध कार्रवाई करने से बचते हैं, जिससे पूरी प्रणाली की प्रभावशीलता कम हो सकती है। उदाहरण: प्रो. एन. सुकुमार (2026) के अनुसार, प्रशासन-नियुक्त प्रकोष्ठों में विश्वसनीयता की कमी के कारण छात्रों का भरोसा कमजोर पड़ता है।
- सूक्ष्म एवं अदृश्य पूर्वाग्रहों से मुकाबला: औपचारिक दुर्व्यवहार से परे मूल्यांकन, मौखिक परीक्षाओं और बौद्धिक बहिष्कार जैसी अकादमिक प्रक्रियाओं में पूर्वाग्रह की संभावना हो सकती हैं। उदाहरण: 2025 के कुछ अध्ययनों में यह सामने आया कि कुछ विशिष्ट वर्ग के छात्रों के विचारों को व्यवस्थित रूप से कमतर आँका गया, जिससे इक्विटी स्क्वाड जैसी संरचनाओं की आवश्यकता रेखांकित हुई।
नियमों से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ
- बहिष्करण की सीमित परिभाषा: जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में सामान्य श्रेणी के छात्रों को शामिल नहीं किया गया है जिससे समान कानूनी संरक्षण का प्रश्न उठता है। उदाहरण: वर्ष 2022 से कई बार में जे.एन.यू. (व अन्य विश्वविद्यालयों) में सामने आए ‘ब्राह्मण कैंपस छोड़ें’ जैसे भित्तिचित्रों का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 2026 के नियम ऐसे लक्षित उत्पीड़न से निपटने में अपर्याप्त हैं।
- दुरुपयोग की आशंका: झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के विरुद्ध सुरक्षा उपायों के अभाव से नियमों के प्रतिशोधात्मक उपयोग का खतरा बना रहता है।
- अस्पष्ट भाषा: सर्वोच्च न्यायालय ने इंगित किया कि छात्रावासों में अलगाव या मेंटरशिप समूह जैसे शब्दों की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है जिससे मनमाना कार्यान्वयन संभव है।
- रैगिंग का उल्लेख न होना: 2012 के दिशानिर्देशों के विपरीत वर्ष 2026 के नियमों में रैगिंग को भेदभाव के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है।
- सामाजिक ध्रुवीकरण का खतरा: आशंका जताई गई कि ये नियम जाति-निरपेक्ष शैक्षणिक वातावरण को बढ़ावा देने के बजाय जातिगत पहचान को संस्थागत बना सकते हैं। उदाहरण: मुख्य न्यायाधीश ने चेतावनी दी थी कि यदि छात्रावासों या वार्डों की अलग-अलग व्याख्या की गई, तो इससे सामाजिक एकीकरण में पिछले 75 वर्षों की प्रगति को क्षति पहुँच सकती है।
आगे की राह एवं सुधारात्मक सुझाव
- समावेशी पुनर्संरचना: भेदभाव की परिभाषा को सार्वभौमिक बनाया जाए, ताकि जाति या श्रेणी से परे हर छात्र को संरक्षण मिल सके।
- विशेषज्ञ समिति की समीक्षा: भाषा में स्पष्टता लाने के लिए प्रख्यात शिक्षाविदों और न्यायविदों की समिति गठित करने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव को लागू किया जाए।
- दुरुपयोग-रोधी प्रावधान: झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए दंडात्मक उपाय शामिल कर विश्वास बहाल किया जाए।
- समग्र संरक्षण: रैगिंग, क्षेत्रीय भेदभाव और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह (जैसे- उत्तर–दक्षिण विभाजन) को समानता के ढांचे में दोबारा सम्मिलित किया जाए।
- संवेदनशीलता-आधारित दृष्टिकोण: केवल दंडात्मक व्यवस्था के बजाय छात्रों और शिक्षकों के लिए अनिवार्य अभिविन्यास और सहानुभूति निर्माण कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाए।
निष्कर्ष
यूजीसी के 2026 के समानता विनियम भारतीय उच्च शिक्षा परिसरों में सामाजिक न्याय को कानूनी आधार देने का एक सदाशय प्रयास हैं किंतु उनकी कानूनी संरचना में स्पष्ट कमियाँ हैं। इन पर रोक लगाकर सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि कोई भी संरक्षणात्मक कानून तभी प्रभावी हो सकता है जब वह स्पष्ट, समावेशी और विभाजन रहित हो। भविष्य की दिशा ऐसे संतुलित ढांचे के निर्माण में निहित है जो सामान्य छात्र समुदाय को अलग-थलग किए बिना वंचित वर्गों को वास्तविक सुरक्षा प्रदान कर सके।