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थर्मोबैरिक युद्ध सामग्री

संदर्भ

यूक्रेन सरकार और मानवाधिकार समूहों ने रूस पर यूक्रेन के विरुद्ध ‘क्लस्टर युद्ध सामग्री’ एवं ‘थर्मोबैरिक युद्ध सामग्री’ के उपयोग का आरोप लगाया है। 

थर्मोबैरिक युद्ध सामग्री

  • ‘थर्मोबैरिक युद्ध सामग्री’ को ‘एरोसोल बम’ या ‘वैक्यूम बम’ या ‘ईंधन-वायु विस्फोटक उपकरण’ भी कहते हैं। रूस थर्मोबैरिक युद्ध सामग्री को टी.ओ.एस.-1 (TOS-1) रॉकेट लॉन्चर से लॉन्च कर सकता है।
  • थर्मोबैरिक युद्ध सामग्री को प्राय: रॉकेट या बम के रूप में प्रयोग किया जाता है। ये ईंधन और विस्फोटक पदार्थों को उत्सर्जित करते हैं। इनमें जहरीली पाउडरनुमा धातुओं और ऑक्सीडेंट युक्त कार्बनिक पदार्थ सहित विभिन्न ईंधनों का उपयोग किया जा सकता है।
  • इसमें भरा विस्फोटक, ईंधन का एक बड़ा गोला छोड़ता है, जो वायु में उपलब्ध ऑक्सीजन के संपर्क में आकर उच्च तापमान वाला आग का गोला और एक शॉकवेव (सुपरसोनिक तरंग) उत्पन्न करता है। वस्तुतः यह आसपास मौजूद किसी भी जीवित प्राणी से वायु (ऑक्सीजन) को सोख लेता है।

प्रभाव

  • थर्मोबैरिक बम शहरी क्षेत्रों या खुली परिस्थितियों में अधिक विनाशकारी होते हैं। साथ ही, ये बंकरों और अन्य भूमिगत स्थानों में मौजूद लोगों को भी हानि पहुँचा सकते हैं।
  • इसकी चपेट में आने से कई आंतरिक एवं अदृश्य चोटों से पीड़ित होने की संभावना है। इससे फेफड़ों भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।

पूर्व में उपयोग एवं अंतर्राष्ट्रीय नियम 

  • जर्मनी की ओर से द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान थर्मोबैरिक युद्ध सामग्री के प्रारंभिक संस्करण विकसित किये गए थे। ऐसा माना जाता है कि सोवियत संघ ने वर्ष 1969 के चीन-सोवियत सीमा संघर्ष के दौरान और वर्ष 1979 में अफगानिस्तान में इसका प्रयोग किया था।
  • कथित तौर पर रूस ने चेचन्या और सीरिया हमलों में इसका प्रयोग किया था। अमेरिका ने वियतनाम युद्ध तथा अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा के विरुद्ध इसका उपयोग किया था।
  • क्लस्टर युद्ध सामग्री अंतरराष्ट्रीय संधि की ओर से प्रतिबंधित है। हालाँकि, थर्मोबैरिक युद्ध सामग्री का उपयोग स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित नहीं हैं।
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