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टाइप 1 मधुमेह 

प्रारंभिक परीक्षा : मधुमेह, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR)
मुख्य परीक्षा : सामान्य अध्ययन प्रश्नप्रत्र 2 : स्वास्थ्य

सन्दर्भ 

  • हाल ही में, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा बोर्डों से कहा है, कि यह सुनिश्चित करना स्कूलों का कर्तव्य है, कि टाइप 1 मधुमेह से प्रभावित बच्चों को उचित देखभाल और आवश्यक सुविधाएं प्रदान की जाएं।

टाइप 1 मधुमेह

  • टाइप 1 मधुमेह को ‘चाइल्डहुड डायबिटीज़’ भी कहते हैं।
  • टाइप 1 मधुमेह एक ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया के कारण होता है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली, इंसुलिन हार्मोन का स्राव करने वाली अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं को नष्ट कर देती है।
  • इंसुलिन हार्मोन रक्त में ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करने के लिये जिम्मेदार है। 
  • टाइप 1 मधुमेह से मुख्यत: बच्चे और किशोर प्रभावित होते हैं। यह टाइप 2 की तुलना में बहुत अधिक गंभीर होता है, क्योंकि पीड़ित के शरीर में इंसुलिन का निर्माण नहीं होता है और यदि वह इंसुलिन लेना बंद कर दे तो उसकी मृत्यु कुछ ही हफ़्तों में हो सकती है। 
  • टाइप 1 मधुमेह को रोका नहीं जा सकता, लेकिन इंसुलिन के स्तर को नियंत्रित करके शर्करा के स्तर को नियंत्रित करके इसका सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है।
  • इससे प्रभावित बच्चों में प्राय: बार-बार पेशाब आने और अत्यधिक प्यास लगने के गंभीर लक्षण प्रकट होते हैं और उनमें से लगभग एक-तिहाई को ‘डायबिटिक कीटोएसिडोसिस’ हो जाता है।
    • डायबिटिक कीटोएसिडोसिस, एक गंभीर स्थिति है, जिसमें शरीर में कीटोन्स की सांद्रता उच्च हो जाती है। 
    • कीटोन्स अणु का निर्माण तब होता है, जब शरीर ऊर्जा के लिये ग्लूकोज का अवशोषण करने में सक्षम नहीं होता है और इसके बजाए वसा को तोड़ना शुरू कर देता है।
  • टाइप 2 मधुमेह की तुलना में टाइप 1 मधुमेह दुर्लभ है। देश में मधुमेह के सभी चिकित्सालयी मामलों में से लगभग 5-10% टाइप 1 मधुमेह से प्रभावित होते हैं किंतु वर्तमान में इससे प्रभावित लोगों की संख्या में वृद्धि दर्ज की जा रही है।
  • दुनिया में टाइप 1 मधुमेह से पीड़ित सर्वाधिक बच्चों और किशोरों की संख्या भारत में सर्वाधिक है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग

  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत एक वैधानिक निकाय है। 
  • इसे वर्ष 2007 में बाल अधिकार संरक्षण आयोग (CPCR) अधिनियम, 2005 के तहत स्थापित किया गया था।
  • आयोग यह सुनिश्चित करता है कि सभी कानून, नीतियाँ, कार्यक्रम और प्रशासनिक तंत्र भारतीय संविधान और बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन में निहित बाल अधिकार दृष्टिकोण के अनुरूप हों। 
  • इसके तहत 18 वर्ष तक के आयु वर्ग के व्यक्ति को बच्चे के रूप में परिभाषित किया गया है।
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