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अंतरिक्ष क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा का प्रयोग 

संदर्भ

‘रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर’ (Radioisotope Thermoelectric Generators : RTGs) नामक परमाणु बैटरी विगत छह दशकों से अधिक समय से अंतरिक्ष यान को ऊर्जा प्रदान कर रही हैं। ये मुख्य कार्य ऑन-बोर्ड उपकरणों को सक्रिय रखने के लिये ऊर्जा प्रदान करना और अंतरिक्ष यान में लगे उपकरणों को अंतरिक्ष के ठंडे वातावरण से बचाने के लिये गर्मी प्रदान करना है। इसका जीवनकाल अपेक्षाकृत लंबा होता है। हालाँकि, अब वैश्विक समाज आर.टी.जी. से आगे बढ़ने पर विचार कर रहा है। अमेरिका और चीन चंद्रमा पर एक परमाणु ऊर्जा रिएक्टर स्थापित करने की योजना बना रहे हैं ताकि चंद्रमा पर स्थित अंतरिक्ष यात्रियों को विद्युत् उपलब्ध कराई जा सके। 

अंतर्राष्ट्रीय स्थिति 

  • नासा वर्ष 2030 तक चंद्रमा पर एक संयंत्र स्थापित करने की योजना बना रहा है जो निरंतर 10 किलोवाट (पृथ्वी पर किसी घर की औसत वार्षिक बिजली की खपत के बराबर) तक ऊर्जा प्रदान करेगा, जबकि चीन की योजना एक ऐसा रिएक्टर बनाने की है जो 1 मेगावाट बिजली उत्पन्न कर सके।
  • अभी तक बाह्य अंतरिक्ष मिशनों के लिये केवल सौर ऊर्जा पर निर्भर रहने वाला भारत भी इस दौड़ में शामिल होना चाहता है। वर्ष 2021 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 100-वाट आर.टी.जी. विकसित करने के लिये कंपनियों को आमंत्रित किया।
  • इसरो ने मंगलयान, चंद्रयान-1 एवं चंद्रयान-2 मिशनों के लिये सौर पैनलों और लिथियम-आयन बैटरी का प्रयोग किया है। हालाँकि, जैसे-जैसे अंतरिक्ष यान सूर्य से दूर जाता है, उस पर लगे सौर पैनलों की कुशलता कम होती जाती है। 

आर.टी.जी. संबंधी चिंताएँ

  • वर्तमान में अंतरिक्ष एजेंसियाँ आठवीं पीढ़ी की परमाणु बैटरियों का उपयोग कर रही हैं जिन्हें ‘मल्टी-मिशन रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर’ (MMRTGs) कहा जाता है। यह 110 वाट विद्युत् शक्ति प्रदान करता है, जो सभी ऑन-बोर्ड उपकरणों को ऊर्जा प्रदान करने के लिये पर्याप्त है। 
  • हालाँकि, आर.टी.जी. के साथ कुछ सुरक्षा संबंधी चिंताएँ भी है। उदाहरण के लिये, 21 अप्रैल, 1964 को यूएस ट्रांजिट-5बीएन-3 (US Transit-5BN-3) नेविगेशन उपग्रह लॉन्चिंग में विफल रहा और मेडागास्कर के उत्तर में जल कर नष्ट हो गया। इस प्रक्रिया में वातावरण में प्लूटोनियम ईंधन निष्कासित हुआ। कथित तौर पर कुछ समय बाद उक्त क्षेत्र में प्लूटोनियम-238 के साक्ष्य पाए गए। उपग्रह से रेडियोधर्मी विकिरण के उत्सर्जन को रोकने के लिये वर्तमान में आर.टी.जी. को एक दृढ़ एवं विकिरण प्रूफ शेल में सील कर दिया जाता है।
  • संयुक्त राष्ट्र ने बाह्य अंतरिक्ष में परमाणु ऊर्जा स्रोतों को स्थापित करने के लिये आवश्यक सिद्धांतों को प्रस्तुत किया है। हालाँकि, अभी भी परमाणु ऊर्जा के सुरक्षित उपयोग के लिये दिशानिर्देश जारी किये जाने की ज़रूरत है।

प्रोपेलिंग रॉकेट

  • विश्व के कई देश ऐसे अंतरिक्ष यान विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं जो ईंधन के रूप में परमाणु ऊर्जा का उपयोग करेंगे। 1960 के दशक में नासा ने परमाणु ईंधन से चलने वाले रॉकेट का डिज़ाइन पर कार्य किया था। कालांतर में मिट्टी का तेल (Kerosene), एल्कोहल, हाइड्राज़िन (Hydrazine) एवं इसके डेरिवेटिव तथा तरल हाइड्रोजन, रॉकेट ईंधन या प्रणोदक के रूप में लोकप्रिय हो गए।
  • अमेरिका और चीन परमाणु ईंधन से चलने वाले रॉकेट पर पुनः ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इस संदर्भ में अमेरिका की रूचि को दो कारकों से समझा जा सकता हैं : राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतर्ग्रहीय मिशन। 
  • अमेरिकी उपग्रहों को निशाना बनाने वाले हथियारों से निपटने के लिये अमेरिकी सेना परमाणु ईंधन से चलने वाले अंतरिक्ष यानों का इस्तेमाल करना चाहती है। उनका विचार है कि आवश्यकता पड़ने पर परमाणु अंतरिक्ष यान शीघ्रता से युद्ध का हिस्सा बन सकते हैं और अंतरिक्ष संपत्तियों को हमलों से बचा सकते हैं।

लाभ

  • रासायनिक प्रणोदकों की तुलना में परमाणु प्रणोदक दोगुने कुशल होते हैं। उनका ऊर्जा घनत्व (जितनी ऊर्जा वे उत्पन्न कर सकते हैं) हाइड्राज़िन से 4 मिलियन गुना अधिक है, जो बाह्य अंतरिक्ष मिशनों के लिये सर्वाधिक प्रयोग किया जाने वाला रासायनिक ईंधन है। 
  • साथ ही, परमाणु प्रणोदक वाले यानों की गति अत्यधिक तीव्र होती हैं, जिससे अंतरिक्ष यात्री हानिकारक ‘अंतरिक्ष विकिरण’ (Space Radiation) के संपर्क में कम आएंगे।
  • इसके अलावा कई देश बाह्य सौर मंडल में गहन अंतरिक्ष मिशनों के लिये सौर पाल (Solar Sails) और बीम-संचालित प्रणोदन जैसे परमाणु विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं। सौर पाल अंतरिक्ष यान को आगे बढ़ाने के लिये फोटॉन से बने प्रकाश का उपयोग करते हैं। यह विचार काफी हद तक किसी नौका यात्रा (Boat Sail) के समान है। 
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