• Sanskriti IAS - अखिल मूर्ति के निर्देशन में

चीन द्वारा मिसाइल साइलो का निर्माण: कारण एवं निहितार्थ 

  • 13th September, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा-  राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव)

संदर्भ 

हालिया उपग्रह छवियों से (Satellite Images) से पता चला है कि चीन गांसु प्रांत के युमेन में, झिंजियांग प्रांत में हामी के पास और इनर मंगोलिया प्रांत के ऑर्डोस सिटी के हैंगगिन बैनर में कम से कम तीन मिसाइल साइलो फील्ड (भण्डार क्षेत्र) का निर्माण कर रहा है।

मिसाइल साइलो की जानकारी का स्रोत 

  • युमेन क्षेत्र की खोज जेम्स मार्टिन अप्रसार अध्ययन केंद्र, कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं द्वारा प्राप्त वाणिज्यिक उपग्रह छवियों द्वारा की गई, जबकि हामी क्षेत्र की पहचान अमेरिकी वैज्ञानिक संघ के परमाणु विशेषज्ञों द्वारा प्लैनेट लैब्स उपग्रह छवियों का उपयोग करके की गई। हैंगगिन बैनर क्षेत्र की खोज चीन एयरोस्पेस अध्ययन संस्थान, वाशिंगटन डी.सी. के शोधकर्ताओं ने की।
  • ऐसा प्रतीत होता है कि चीन युमेन में लगभग 120 मिसाइल साइलो, हामी में लगभग 110 साइलो और हैंगगिन बैनर क्षेत्र में 29 साइलो का निर्माण कर रहा है। इस वर्ष की शुरुआत में, इनर मंगोलिया में ही पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स, जिलांताई प्रशिक्षण क्षेत्र में 16 मिसाइल साइलो का पता चला था।
  • युमेन और हामी क्षेत्र एकसमान हैं तथा साइलो एक आदर्श ग्रिड पैटर्न में स्थित है, जो लगभग 3 किमी. दूर है। कुछ साइलो का ऊपरी हिस्सा गुंबदनुमा है। इन क्षेत्रों को पास में स्थित पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स केंद्रों द्वारा समर्थन प्राप्त है।
  • इससे पहले कई दशकों तक चीन ने डी.एफ.-5 तरल-ईंधन अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (DF-5 ICBM) के लिये केवल 20 मिसाइल साइलो का संचालन किया है। 

चीन द्वारा मिसाइल साइलो बनाने का कारण

  • इसके तीन कारण हो सकते हैं। सर्वप्रथम कुछ चीनी राजनीतिक वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि यह चीन का ‘लॉन्च-ऑन-वार्निंग’ (Launch-on-Warning: LOW) परमाणु स्थिति की ओर बढ़ने का प्रयास हो सकता है। ‘लो’ (LOW) का तात्पर्य किसी विरोधी मिसाइल द्वारा अपने लक्ष्य को भेदने से पूर्व ही उस विरोधी मिसाइल पर प्रक्षेपण से है।
  • वर्ष 1964 में चीन द्वारा पहली बार परमाणु उपकरण विस्फोट के बाद से ही चीन की परमाणु रणनीति काफी हद तक अपरिवर्तित बनी हुई है। यह सुनिश्चित व स्थिर प्रतिशोध के माध्यम से निरोध/निवारक क्षमता (Deterrence) प्राप्त करने पर आधारित है। इसके लिये किसी विरोधी द्वारा किये गए प्रथम हमले (पारंपरिक या परमाणु) के बाद चीन के परमाणु शस्त्रागार की प्रतिक्रिया महत्त्वपूर्ण है। ‘लो’ स्थिति के लिये चीन को मिसाइलों में कुछ युद्धशीर्षों को जोड़ना होगा और त्वरित प्रतिक्रिया के लिये उन्हें चौकन्नी स्थिति (Alert Status) में रहना होगा। वर्तमान में चीन अपने वॉरहेड्स और मिसाइलों को विभिन्न कमांड के तहत अलग-अलग डी-अलर्ट स्थिति में रखता है।
  • वर्ष 2015 में चीन द्वारा प्रकाशित रक्षा श्वेत पत्र में ‘तीव्र प्रतिक्रिया’ का उल्लेख किया गया है। यू.एस. स्ट्रैटेजिक कमांड ने अप्रैल 2021 में सीनेट में माना कि चीन की सेना का एक हिस्सा पहले ही ‘लो स्थिति’ में है।
  • इसका दूसरा कारण है कि यह चीन को परमाणु हथियार भंडार बढ़ाने में सक्षम बनाता है। चीन के पास इस समय करीब 350 परमाणु हथियार हैं। चीन के पास लगभग 150 भूमि-आधारित मिसाइलें हैं, जो अमेरिका के कुछ हिस्सों में 180 से 190 परमाणु हथियार पहुंचा सकती हैं।
  • तीसरा अनुमान है कि चीन इन सिलोस को प्रलोभन या झांसे के रूप में प्रयोग कर सकता है। चीन अमेरिकी मिसाइल रक्षा प्रणालियों और पारंपरिक सटीक हमलावर हथियारों के उन्नयन के बारे में चिंतित है, जो चीन के परमाणु प्रतिरोध को कमजोर कर सकता है। मार्च 2021 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सेना को ‘उन्नत रणनीतिक निवारक क्षमताओं के निर्माण में तेज़ी लाने’ का निर्देश दिया था।
  • हाल ही में खोजे गए साइलो प्रतिरोध में वृद्धि की एक पहल हो सकती है। यह चीन की चाल भी हो सकती है, जिसमें एक या कुछ या सभी साइलो में मिसाइलें हो सकती हैं, जिससे हमलावर को कुछ मिसाइलों या खाली साइलो को नष्ट करने के लिये अधिक वारहेड या निर्देशित हथियारों को बर्बाद करना होगा। यह चीन के लिये एक लागत प्रभावी रणनीति हो सकती है और एक बड़ी परमाणु शक्ति व अमेरिका की तरह उसकी छवि को भी मज़बूत कर सकती है।

क्या भारत को चिंतित होना चाहिये?

  • तटस्थ दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाए तो ये साइलो विशेष रूप से अमेरिका के खिलाफ प्रतिरोध बढ़ाने के लिये बनाए गए प्रतीत होते हैं। हालाँकि, भारत को चीन की परमाणु अस्पष्टता और उसकी नवीनतम DF-26 मध्यवर्ती-श्रेणी की सड़क-चालित दोहरे उपयोग वाली मिसाइलों के बारे में सतर्क रहना चाहिये। इन मिसाइलों के हमलों की रेंज और तैनाती के समय को देखते हुए भारत एक संभावित लक्ष्य हो सकता है।
  • यद्यपि चीन और भारत दोनों ने परमाणु हथियार के 'पहले उपयोग नहीं' (No First Use) सिद्धांत का वादा किया है किंतु भारत की मामूली बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा क्षमता और चीन की परमाणु अस्पष्टता भारत के लिये चिंता का विषय है।

प्रतिक्रिया 

  • अमेरिका मानता है कि इन साइलो की गोपनीयता दुनिया के सामने बढ़ते खतरे का संकेत है। संभावना है कि चीन बड़े पैमाने पर आई.सी.बी.एम. साइलो तैनात कर रहा है। अमेरिका के अनुसार, चीन का परमाणु शस्त्रागार पहले की अपेक्षा उच्च स्तर तक एवं अधिक तेज़ी से बढ़ेगा, जो चिंताजनक है। 
  • हालाँकि, कुछ चीनी मीडिया इसे पवन फार्म बता रहे हैं और अमेरिका पर ‘चीन से खतरे के सिद्धांत’ (China Threat Theory) के प्रसार का आरोप लगाया है।
  • अमेरिका या किसी और के लिये कोई स्पष्ट विकल्प नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका और रूस के पास चीन की तुलना में लगभग 20 गुना अधिक परमाणु हथियार हैं, ऐसे में चीन ‘न्यू स्टार्ट’ (NEW START : स्ट्रेटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी) में शामिल नहीं होगा।
  • कई अमेरिकी हथियार नियंत्रकों ने अमेरिकी सरकार द्वारा वित्त पोषित ‘यू.एस.-चीन ट्रैक 1.5 परमाणु संवाद’ के पुन: प्रारंभ करने का तर्क दिया है, जिसे 15 वर्षों के बाद वर्ष 2019 में दोनों देशों के बीच बढ़ते संघर्ष और ट्रैक 1 संवाद के विफलता के कारण निलंबित कर दिया गया था। कुछ अन्य का तर्क है कि अमेरिका की नई मिसाइल रक्षा क्षमताएँ रणनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करती हैं और हथियार नियंत्रण को जटिल बना देती हैं।
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