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तमिलनाडु में 4,200 वर्ष पूर्व लोहे के साक्ष्य

  • 19th May, 2022

चर्चा में क्यों

हाल ही में, तमिलनाडु में पुरातात्त्विक उत्खनन की रेडियोकार्बन डेटिंग के आधार पर भारत में लोहे के प्रयोग के 4,200 वर्ष पूर्व अर्थात् 2200 ईसा पूर्व के साक्ष्य पाए गए हैं।

प्रमुख बिंदु 

  • यह उत्खनन तमिलनाडु में कृष्णागिरी के पास मयिलाडुम्पराई से हुआ है। यह वर्तमान में भारत में पाया जाने वाला सबसे पुराना लौह युग स्थल है।
  • इस नवीनतम खोज से पहले, तमिलनाडु में लोहे के उपयोग का सबसे पहला साक्ष्य मेट्टूर के पास थेलुंगनूर और मंगडु से प्राप्त हुआ है, जो 1500 ईसा पूर्व का है।
  • विदित है कि इस खोज से पूर्व देश में लोहे के उपयोग का आरंभिक प्रमाण 1900-2000 ईसा पूर्व का माना जाता था।

मयिलाडुम्पराई

  • मयिलाडुम्पराई लघुपाषाण काल (30,000 ईसा पूर्व) और प्रारंभिक ऐतिहासिक (600 ईसा पूर्व) युग के मध्य का एक महत्त्वपूर्ण स्थल है। इस स्थल की खोज प्रोफेसर राजन ने 1990 के दशक में की थी।
  • इस स्थल के निकट कई पुरातात्त्विक स्थल जैसे- तोगरापल्ली, गंगावरम, संदूर, वेदारथट्टक्कल, गुट्टूर, गिदलुर, सप्पमुत्लु, कप्पलवाड़ी अवस्थित है। ये सभी पुरातात्विक स्थल 10 किमी. के भीतर स्थित हैं।

लौहयुगीन अन्य पुरातात्विक स्थल 

  • राजस्थान के आहड़ में लोहे का उपयोग 1300 ईसा पूर्व में किये जाने का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
  • कर्नाटक के बुक्कासागर में लोहे के उत्पादन का संकेत देने वाले नमूने 1530 ईसा पूर्व के हैं।
  • मध्य-गंगा घाटी में अवस्थित रायपुरा से लोहे के गलाने के प्रमाण 1700-1800 ईसा पूर्व के प्राप्त हुए हैं।
  • वाराणसी के पास मल्हार और उत्तरी कर्नाटक में ब्रह्मगिरी से लौह के प्रमाण 1900-2000 ईसा पूर्व के पाए गए हैं।

ऐतिहासिक महत्त्व

  • सैंधव सभ्यता में लौह उपयोग के साक्ष्य नहीं मिले हैं। इस सभ्यता से भारत में तांबे के प्रयोग (1500 ईसा पूर्व) के शुरूआती साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • लोहे की तकनीक का आविष्कार होने के पश्चात् कृषि उपकरणों एवं हथियारों को बनाया गया। लौह युगीन सभ्यता ने आर्थिक एवं सांस्कृतिक प्रगति को सुनिश्चित किया।
  • पुरातत्त्वविदों के अनुसार, तांबे से बने उपकरण भंगुर होते थे जो कि लोहे के औजारों की भांति मजबूत नहीं होते थे। घने जंगलों को साफ करने एवं भूमि को कृषि के अंतर्गत लाने के लिये तांबे के औजारों का उपयोग करना कठिन होता था। इसलिये मनुष्यों द्वारा लोहे का उपयोग शुरू करने के बाद ही वनों की कटाई हो सकी।
  • विद्वानों का मानना है कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन और लौह प्रौद्योगिकी से बड़े पैमाने पर उत्पादन के लाभ ने 600 ईसा पूर्व के आसपास नगरीय विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका को निभाया था।
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