• Sanskriti IAS - अखिल मूर्ति के निर्देशन में

प्लास्टिक उत्पादन की सामाजिक लागत

  • 11th September, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा- पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे)
(मुख्य परीक्षा, समान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3 : संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ  

हाल ही में, विश्व वन्यजीव कोष (WWF) ने प्लास्टिक उत्पादन की सामाजिक लागत से संबंधित एक रिपोर्ट जारी की है।

प्लास्टिक उत्पादन की सामाजिक एवं पर्यावरणीय लागत

  • वर्ष 2019 में उत्पादित किये गए प्लास्टिक की सामाजिक और पर्यावरणीय लागत लगभग 271 लाख करोड़ रुपए (3.7 लाख करोड़ डॉलर) अनुमानित की गई है। यह लागत भारत की जी.डी.पी. से भी अधिक है।
  • यह लागत प्लास्टिक के अनुमानित जीवनकाल पर आधारित है, जिसमें इसका उत्पादन, उपभोग और निपटान शामिल है। 
  • रिपोर्ट के अनुसार, यदि अभी कोई कदम नहीं उठाया गया तो वर्ष 2040 तक यह लागत बढ़कर लगभग 520.2 लाख करोड़ रुपए (7.1 लाख  करोड़ डॉलर) तक पहुँच जाएगी, जो वर्ष 2018 में वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य पर किये गए कुल खर्च का लगभग 85% है। साथ ही, यह अनुमानित लागत वर्ष 2019 में जर्मनी, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की कुल जी.डी.पी. से भी ज़्यादा है। 

प्लास्टिक उत्पादन में वृद्धि और सटीक आंकलन का आभाव

  • हाल के दशकों में प्लास्टिक उत्पादन में तेज़ी आई है।  एक शोध के अनुसार, वर्ष 1950 से लेकर अब तक 830 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन किया जा चुका है। इस उत्पादन के वर्ष 2025 तक दोगुना हो जाने का अनुमान है। पूरे विश्व में प्रति मिनट 10 लाख पानी की बोतलें खरीदी जाती हैं जो प्लास्टिक से बनी होती हैं।
  • रिपोर्ट के अनुसार, प्लास्टिक से पर्यावरण और समाज को होने वाले नुकसान का सही तरह से आंकलन करने में सरकारें विफल रही हैं। इसी कारण से इसका प्रबंधन सही तरीके से नहीं हो पा रहा है और इसके बढ़ते पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक लागत का बोझ विभिन्न देशों को उठाना पड़ रहा है।
  • वर्तमान में भी कई देशों में इनसे जुड़े नियमों का अभाव है। साथ ही, कई स्थानों पर आज भी अप्रत्यक्ष रूप से इन्हें सब्सिडी दी जा रही है। पर्यावरण और समाज द्वारा प्लास्टिक की चुकाई जाने वाली कीमत इसके प्राथमिक उत्पादकों द्वारा भुगतान किये गए बाज़ार मूल्य से कम से कम 10 गुना अधिक है।

प्लास्टिक प्रदूषण का अनुमान 

  • अनुमानों के अनुसार, यदि इसी गति से उत्पादन होता रहा तो वर्ष 2040 तक प्लास्टिक का उत्पादन दोगुना हो जाएगा। इसी तरह समुद्र में पहुँचने वाला प्लास्टिक प्रदूषण भी तीन गुना बढ़कर लगभग 2.9 करोड़ टन पर पहुँच जाएगा। इससे समुद्रों में मौजूद कुल प्लास्टिक की मात्रा 60 करोड़ टन पर पहुंच जाएगी।
  • इसी तरह यदि प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र की बात करें तो उससे जितनी ग्रीनहाउस गैसों (जी.एच.जी.) का उत्सर्जन हो रहा है वो वैश्विक कार्बन बजट का लगभग 20 प्रतिशत तक होगा, जिससे जलवायु संकट और बढ़ सकता है।

प्लास्टिक और जलवायु

  • वर्ष 2019 में एक टन प्लास्टिक की उत्पादन लागत लगभग 1,000 डॉलर थी। हालाँकि, इसके पूरे जीवनचक्र में चुकाई जाने वाली कीमत इससे कहीं ज़्यादा थी। उदाहरणस्वरुप इसके जीवनचक्र में जितनी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होगा, उसकी कीमत अनुमानत: 12.5 लाख करोड़ रुपए (17,100 करोड़ डॉलर) होगी। 
  • साथ ही, वर्ष 2019 में जितना प्लास्टिक निर्मित किया गया है, उससे उत्पन्न होने वाले कचरे के प्रबंधन पर करीब 2.3 लाख करोड़ रुपए (3,200 करोड़ डॉलर) का खर्च आने का अनुमान है।   
  • प्लास्टिक को पूरी तरह नष्ट होने में सैकड़ों से हजारों वर्ष लग जाते हैं। जैसे-जैसे यह छोटे-छोटे कणों में टूटता है, इसे इकट्ठा करना मुश्किल हो जाता है। इस कारण यह पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुँचाता है। 
  • अनुमान है कि वर्ष 2019 में जितना प्लास्टिक उत्पादन किया गया है, उतना यदि प्रदूषण के रूप में समुद्रों तक पहुँच जाता है तो उससे पर्यावरण को करीब 226.8 लाख करोड़ रुपए (3.1 लाख करोड़ डॉलर) का नुकसान होगा।
  • हालाँकि, रिपोर्ट के अनुसार, प्लास्टिक लागत का यह अनुमान इससे कहीं अधिक हो सकता है, क्योंकि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर इसके पड़ने वाले प्रभावों का पूरी तरह से अनुमान लगा पाना आसान नहीं है। 

समाधान

  • प्लास्टिक एक सस्ता विकल्प है, इसी कारण से बड़े पैमाने पर इसका प्रयोग किया जाता है किंतु इसके साथ समस्याएँ भी कम नहीं हैं। प्लास्टिक के कारण उत्पन्न होने वाले कचरे ने पृथ्वी के साथ-साथ समुद्रों को भी बुरी तरह से प्रभावित किया है।
  • कई प्रमुख संगठनों ने इस समस्या से निपटने के लिये सर्कुलर इकोनॉमी को अपनाने का प्रस्ताव दिया है, जिसका उद्देश्य प्लास्टिक को पर्यावरण में पहुँचने से रोकना है। अनुमान है कि इसकी मदद से महासागरों में प्रवेश करने वाले प्लास्टिक की मात्रा को 80 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। साथ ही, इससे होने वाले जी.एच.जी. उत्सर्जन को भी 25% तक कम किया जा सकता है। 
  • डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. ने भी संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों से एक वैश्विक संधि पर बातचीत शुरू करने का आग्रह किया है, जो प्लास्टिक के जीवनचक्र के सभी चरणों से निपटने के लिये आवश्यक है, जिससे वर्ष 2030 तक महासागरों में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण को रोका जा सके।
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