• Sanskriti IAS - अखिल मूर्ति के निर्देशन में

भूख की बढ़ती समस्या और सरकार का दृष्टिकोण 

  • 27th October, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: गरीबी एवं भूख से संबंधित विषय)

संदर्भ

हाल ही में, जारी ‘वैश्विक भूख सूचकांक’ (GHI) में भारत की रैंकिंग में गिरावट चिंता का विषय है। ऐसे में इसके कारणों के साथ-साथ डाटा एकत्र करने की विधियों का आकलन आवश्यक है ताकि भारत में भूख की प्रवृत्ति को समझा जा सके।  

वर्तमान में भारत की स्थिति 

  • वर्ष 2021 के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 116 देशों में 101वें स्थान पर है, जबकि वर्ष 2020 में 107 देशों में भारत 94वें स्थान पर था। भारत इस सूचकांक में अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसियों, जैसे- पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल से पीछे है।
  • वर्ष 2017 में भारत 119 देशों में 100वें स्थान पर था। भारत की रैंकिंग में गिरावट की प्रवृत्ति वर्ष 2015 से देखी जा सकती है। वर्ष 2014, 2015 और 2016 में भारत की रैंकिंग क्रमशः 55, 80 और 97 रही थी।
  • प्रति व्यक्ति आय के मामले में गरीब देशों की तुलना में भारत वर्ष प्रति वर्ष निचले पायदान पर रहा है, जो कि अधिक चिंता का विषय है। साथ ही, भारत को ‘खतरनाक’ श्रेणी में रखा जाना भी चिंतनीय है।
  • विदित है कि ‘वैश्विक भूख सूचकांक, 2021’ आयरलैंड स्थित एजेंसी ‘कंसर्न वर्ल्डवाइड’ और जर्मन गैर-लाभकारी संस्था ‘वेल्ट हंगर हिल्फ़’ ने प्रकाशित किया है।

        जी.एच.आई. में प्रयुक्त संकेतक 

        • ‘जी.एच.आई.’ चार संकेतकों पर आधारित है-
          • अल्प पोषण -  जनसंख्या के अनुपात में भोजन की अपर्याप्त उपलब्धता (Undernourished in the Population: PoU).
          • चाइल्ड स्टंटिंग (Stunting ) : 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में आयु के अनुपात में कम लंबाई। 
          • चाइल्ड वेस्टिंग- ( Child Wasting) : 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में लंबाई के अनुपात में कम वज़न।
          • बाल मृत्यु दर- 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर।
        • जी.एच.आई. में उपरोक्त में से पहले और अंतिम संकेतकों में से प्रत्येक का भारांक 1/3 होता है, जबकि अन्य दो संकेतकों का भारांक 1/6 होता है।  
        • इन संकेतकों के आकलन के आधार पर वर्ष 2012 की तुलना में पी.ओ.यू. और शैशवकालीन क्षयकारी संकेतक में भारत की स्थिति में गिरावट दिखाई पड़ती है।

            भारत का तर्क 

            • भारत सरकार ने जी.एच.आई. की कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताते हुए इसे 'वास्तविकता से रहित' और 'अवैज्ञानिक' बताया है। यह मूल्यांकन 'फोर क्वेश्चन' सर्वेक्षण के परिणामों पर आधारित है। यह सर्वेक्षण गैलप (Gallup) ने टेलीफोन के माध्यम से आयोजित किया था, जो वास्तविक तथ्यों पर आधारित नहीं है।
            • हालाँकि, प्रकाशन एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि यह रिपोर्ट गैलप पोल पर नहीं बल्कि पी.ओ.यू. डाटा पर आधारित है, जिसे संयुक्त राष्ट्र का खाद्य और कृषि संगठन नियमित रूप से प्रकाशित करता है।
            • पी.ओ.यू. का अनुमान कई कारकों, जैसे- ‘खाद्य उपलब्धता’, ‘खाद्य उपभोग पैटर्न’, ‘आय स्तर और वितरण’ एवं ‘जनसंख्या संरचना’ आदि पर आधारित होता है। प्रयुक्त किये गए सभी डाटा संबंधित देशों के आधिकारिक स्रोतों से लिये गए हैं। 
            • अधिकांश देशों में भोजन उपभोग संबंधी आँकड़ों के अभाव में यह संकेतक उपलब्ध आँकड़ों का उपयोग करते हुए मॉडलिंग पर आधारित अनुमान है, जिसके कारण त्रुटि की कुछ संभावना है।
            • आलोचना का एक बिंदु भूख की जगह अल्पपोषण को अधिक महत्त्व देना है, जो कि खाद्य आदतों, निजी पसंद और जीवन-शैली से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।
            • साथ ही, इस रिपोर्ट में कोविड के दौरान खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के सरकारी प्रयासों को भी नज़रअंदाज किया गया है।
            कोविड काल के दौरान भारत द्वारा किये गए प्रयास
            प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना आत्मनिर्भर भारत योजना श्रमिकों के पी.एफ. खातों में भुगतान प्रधानमंत्री जन धन योजना ओपन मार्केट सेल स्कीम (घरेलू)
            निश्चित अवधि के लिये नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण प्रवासियों के लिये राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को खाद्यान्न का आवंटन 100 से कम श्रमिकों वाले संगठित क्षेत्र के व्यवसायों में प्रतिमाह 15,000/-रु. से कम वेतन वालों के मासिक वेतन का 24% 204 मिलियन महिला खाताधारकों को तीन माह के लिये 500 रु. प्रतिमाह -

            प्रगति की धीमी दर

            • जी.एच.आर. रैंकिंग से यह स्पष्ट है कि भारत भूख के मुद्दे से निपटने में बहुत सफल नहीं रहा है। वर्ष 2006-12 के दौरान जी.एच.आई. मूल्य (अंक) में जहाँ 37.4 से 28.8 तक सुधार हुआ, वहीं 2012-21 के बीच 28.8 से केवल 27.5 तक सुधार हुआ है।
            • पी.ओ.यू. के आंकड़ों से ‘अल्पपोषित जनसंख्या’ के अनुपात में वर्ष 2016 से 18 तक गिरावट की प्रवृत्ति दिखाई देती है और यह 13.8% के निचले स्तर पर पहुँच गया, किंतु इसके बाद यह वर्ष 2017 से 19 में 14% और वर्ष 2018-20 में 15.3% पहुँच गया। अन्य डाटा भी मोटे तौर पर इन निष्कर्षों की पुष्टि करते हैं।
            • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-20) के आंशिक परिणामों के अनुसार भी अधिकांश राज्यों के लिये स्टंटिंग और वेस्टिंग संकेतक स्थिर रहे हैं या उनमें कमी आई है।

                प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना

                • वैश्विक महामारी के चलते केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ (NFSA) के दायरे में आने वाले लगभग 80 करोड़ लाभार्थियों को सामान्य रूप से वितरित किये जा रहे मासिक खाद्यान्न को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PM-GKAY) के जरिये करीब दोगुना कर दिया है।
                • इन लाभार्थियों को प्रति माह प्रति व्यक्ति 5 किग्रा. अतिरिक्त खाद्यान्न मुफ्त प्रदान किया गया जो अंत्योदय अन्न योजना (AAY) / प्राथमिक गृहस्थ (PHH) राशन कार्ड के तहत सामान्य एन.एफ.एस.ए. आवंटन (अर्थात प्रति ए.ए.वाई. परिवार 35 किग्रा. और प्रति पी.एच.एच. व्यक्ति 5 किग्रा. प्रति माह) के अतिरिक्‍त है।
                • विदित हो कि प्रारंभ में पी.एम.जी.के.ए.वाई. के तहत अतिरिक्त मुफ्त राशन का लाभ तीन माह (अप्रैल से जून 2020) के लिये प्रदान किया गया था, किंतु बाद में इसे अगले पांच माह (जुलाई से नवंबर 2020 तक) के लिये बढ़ा दिया गया था। 
                • दूसरी लहर के बाद पी.एम.जी.के.ए.वाई. को पुन: दो माह (मई और जून 2021) के बाद अतिरिक्त पांच माह (जुलाई से नवंबर 2021) के लिये बढ़ा दिया गया है।
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