(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना) |
संदर्भ
- भारत के पूंजी बाज़ारों में एक गहरा ढाँचागत बदलाव आ रहा है। घरेलू बचत अब विदेशी संस्थागत निवेश (FII) की जगह ले रही है जिससे भारतीय बाज़ार अस्थिर वैश्विक पूंजी पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं।
- हालांकि, यह बदलाव बाज़ार की स्थिरता को मज़बूत करता है और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को नीतिगत लचीलापन प्रदान करता है किंतु अनुभवहीन खुदरा निवेशकों की बढ़ती संख्या, असमान भागीदारी व अस्थिर मूल्यांकन दरें देश के ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य के लिए समावेशी एवं टिकाऊ आर्थिक विकास में बाधा डाल सकती हैं।
घरेलू निवेशक: बाज़ार के नए आधार स्तंभ
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बाज़ार हिस्सेदारी 15 महीनों के निचले स्तर पर पहुँच गई है जबकि घरेलू म्यूचुअल फंड (MF) और व्यक्तिगत निवेशक रिकॉर्ड स्तर पर भागीदारी दिखा रहे हैं।
- व्यक्तिगत हिस्सेदारी में वृद्धि: व्यक्तिगत निवेशकों के पास अब इक्विटी बाज़ार का लगभग 19% हिस्सा है जो 20 वर्षों से अधिक समय में सर्वाधिक है।
- SIP का महत्व: SIP (व्यवस्थित निवेश योजना) के माध्यम से निवेश में लगातार वृद्धि हो रही है जो खुदरा निवेशकों के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रमाण है।
- बाज़ार स्थिरता: घरेलू बाज़ार आधार में हुई यह वृद्धि बाज़ारों को स्थिर कर रही है और अस्थिरता को कम कर रही है, जैसा अक्तूबर में निफ्टी 50 के मजबूत प्रदर्शन में परिलक्षित होता है।
RBI के लिए नीतिगत स्वतंत्रता
- अस्थिर विदेशी पूंजी का स्थान घरेलू मुद्रा द्वारा लेने से भारतीय रिज़र्व बैंक को नीतिगत स्वतंत्रता अधिक प्राप्त हुई है। रिकॉर्ड स्तर पर निम्न मुद्रास्फीति और मज़बूत घरेलू आय का अर्थ है कि अब रुपए की रक्षा करने का दबाव कम है। इससे RBI को ऋण वृद्धि को प्रोत्साहित करने और विकास-मुद्रास्फीति उद्देश्यों को संतुलित करने के लिए अधिक गुंजाइश मिलती है।
- हालाँकि, यह नीतिगत स्थिरता एक खतरे को छिपाए हुए है: यदि घरेलू भावनाएँ कमज़ोर होती हैं या बाज़ार में मंदी आती है तो संवेदनशील निवेशक घबराकर बिकवाली कर सकते हैं, जिससे वर्तमान में बाज़ारों को स्थिर करने वाला यही बदलाव भविष्य में अस्थिरता का कारण बन सकता है।
प्राथमिक बाज़ारों में उछाल एवं जोखिम
- घरेलू पूंजी की मज़बूती के चलते प्राथमिक बाज़ारों (Primary Markets) में ज़बरदस्त तेज़ी आई है। इस वित्तीय वर्ष में 71 मेनबोर्ड IPO के माध्यम से ₹1 लाख करोड़ से अधिक की राशि जुटाई गई है।
- पूंजी निर्माण: देश में रिकॉर्ड पूंजी निर्माण हो रहा है जिसमें कंपनियों ने ₹32 लाख करोड़ से अधिक के निवेश की घोषणा की है जोकि पिछले वर्ष की तुलना में 39% की वृद्धि है।
- निजी क्षेत्र का नेतृत्व: इन प्रतिबद्धताओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी लगभग 70% है जो मज़बूत आर्थिक गति का संकेत है।
चिंताएँ: मूल्यांकन एवं जोखिम
- मज़बूत वृद्धि के बावजूद बढ़ती हुई मूल्यांकन दरें चिंता का विषय हैं। लेंसकार्ट, मामाअर्थ और नायका जैसे हालिया IPO में मूल्य-से-आय अनुपात (P/E Ratio) बहुत अधिक है जिससे यह आशंका पैदा हो रही है कि बाज़ार का उत्साह व्यावसायिक मूलभूत सिद्धांतों पर हावी हो रहा है। उत्साह में आकर, खुदरा निवेशक दीर्घकालिक परिणामों को पूरी तरह से समझे बिना अत्यधिक जोखिम उठा लेते हैं।
विषमता और जोखिम: प्रदर्शन की समस्या
खुदरा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी का जश्न प्राय: वित्तीय सलाह की असमान गुणवत्ता और धन के असमान परिणामों को नज़रअंदाज़ कर देता है।
- प्रदर्शन समस्या: वित्तीय अनुसंधान लगातार यह बताता है कि जोखिम एवं शुल्क को समायोजित करने के बाद अधिकांश सक्रिय फंड प्रबंधक लगातार बाज़ारों से बेहतर प्रदर्शन करने में विफल रहते हैं। इससे यह पता चलता है कि बढ़ी हुई भागीदारी स्वचालित रूप से बेहतर प्रतिफल (Returns) में तब्दील नहीं होती है, विशेषकर कम जानकारी रखने वाले निवेशकों के लिए।
- धन का असमान वितरण: भारत के इक्विटी बाज़ारों में संरचनात्मक अक्षमताएँ धन असमानता को गहरा कर रही हैं क्योंकि इक्विटी से होने वाला लाभ असमान रूप से उच्च आय वर्ग के उन लोगों को मिलता है जिनकी वित्तीय पहुंच बेहतर है।
- नए निवेशकों के लिए खतरा: खुदरा निवेशकों की भागीदारी को वित्तीय लोकतंत्रीकरण के रूप में देखा जाता है किंतु अपर्याप्त सुरक्षा उपाय और कमज़ोर वित्तीय साक्षरता अनुभवहीन निवेशकों को बढ़े हुए जोखिमों के सामने उजागर करती है। हाल ही में घरेलू इक्विटी संपत्ति में ₹2.6 लाख करोड़ की गिरावट चिंताजनक है, विशेषकर यदि पहली बार निवेश करने वालों को नुकसान उठाना पड़े, जिससे दीर्घकालिक बाज़ार विश्वास प्रभावित हो सकता है।
आगे की राह: संस्थागत समग्रता एवं समावेशन
भारत के बढ़ते निवेशक आधार को केवल अधिक बचत की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसे लगातार बनी हुई ‘पहुँच विषमता की समस्या’ के समाधान की आवश्यकता है।
- संरचनात्मक सुरक्षा उपाय: आम निवेशकों की सुरक्षा के लिए केवल डिस्क्लोजर से आगे बढ़कर कम शुल्क व पैसिव/लो-कॉस्ट इंडेक्स फंड्स (Passive/Low-cost Index Funds) को व्यापक रूप से अपनाना शामिल है।
- लागत कम करना: बाज़ार में सक्रिय फंडों की हिस्सेदारी 9% है जबकि निष्क्रिय फंडों की हिस्सेदारी केवल 1% है। व्यय अनुपात को कम करना और निवेशकों को इंडेक्सिंग के बारे में जागरूक करना आवश्यक है।
- शासन एवं पारदर्शिता: निफ्टी 50 में प्रमोटरों की हिस्सेदारी में गिरावट (23 साल के निचले स्तर 40% पर) स्वस्थ पूंजी जुटाने और अवसरवादी निकास के बीच के अंतर को सुनिश्चित करने के लिए कॉर्पोरेट गवर्नेंस व पारदर्शिता बढ़ाने पर ज़ोर देती है।
- लक्ष्य-आधारित समावेशन: वित्तीय मुख्यधारा में अधिक महिलाओं व अल्पप्रतिनिधित्व वाले समूहों को शामिल करने के लिए विस्तृत, लिंग-विशिष्ट एवं स्थान-विशिष्ट डेटा की आवश्यकता है।
- तेज़ी से घरेलू बचत पर आधारित भारत की नई बाज़ार नींव उम्मीद जगाती है किंतु अगले चरण में केवल पूंजी आकर्षित करने से हटकर संस्थागत समग्रता को मज़बूत करने, वित्तीय साक्षरता को गहरा करने एवं अंतर्निहित विषमताओं को दूर करने की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि विकास समावेशी एवं टिकाऊ हो।