संदर्भ
- भारत 16 से 20 फरवरी, 2026 के बीच एआई इम्पैक्ट समिट 2026 की मेज़बानी करेगा। यह आयोजन इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि पहली बार वैश्विक एआई गवर्नेंस से संबंधित महत्वपूर्ण मंच ग्लोबल साउथ में आयोजित किया जा रहा है।
- इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य तात्कालिक और बाध्यकारी विनियमन लागू करना नहीं है बल्कि एआई के लिए व्यावहारिक, संतुलित एवं दीर्घकालिक नीति दिशा-निर्देश विकसित करना है। इस सम्मेलन में एआई शासन को समावेशी विकास, पर्यावरणीय सततता और व्यापक सामाजिक प्रभाव के साथ जोड़ने पर विशेष बल दिया जाएगा।
पृष्ठभूमि: वैश्विक एआई विमर्श का क्रमिक विकास
- एआई इम्पैक्ट समिट, एआई शासन पर केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय बैठकों की निरंतर विकसित होती श्रृंखला का अगला चरण है।
- वर्ष 2023 में आयोजित ब्लेचली पार्क एआई सेफ्टी समिट में एआई से उत्पन्न संभावित अस्तित्वगत और विनाशकारी जोखिमों की पहचान मुख्य विषय रही।
- इसके बाद सियोल समिट 2024 ने विमर्श का दायरा बढ़ाते हुए नवाचार, समावेशन एवं विकासशील देशों की भागीदारी को शामिल किया।
- पेरिस एआई एक्शन समिट 2025 में चर्चा का केंद्र क्रियान्वयन, आर्थिक अवसर एवं औद्योगिक अनुप्रयोग रहे।
- इन सम्मेलनों की श्रृंखला यह दर्शाती है कि वैश्विक एआई चर्चा धीरे-धीरे केवल सुरक्षा और जोखिम नियंत्रण से आगे बढ़कर विकासोन्मुख एवं व्यावहारिक चिंताओं की ओर अग्रसर हुई है।
भारत का दृष्टिकोण: पीपल, प्लेनेट और प्रोग्रेस
- विगत सम्मेलनों की तुलना में भारत का दृष्टिकोण अधिक मानवीय और विकास-केंद्रित है। जहाँ पहले एआई को मुख्यतः नियमन और जोखिम प्रबंधन के दृष्टिकोण से देखा गया, वहीं भारत चर्चा को ‘पीपल, प्लेनेट एंड प्रोग्रेस’ के सिद्धांत पर आधारित कर रहा है।
- इसका उद्देश्य ऐसे एआई समाधान विकसित करना है जो वास्तविक सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समाधान करें, विशेषकर विकासशील और अल्पविकसित देशों में।
- यह रुख भारत की दोहरी पहचान को रेखांकित करता है—एक ओर वह एक उभरती हुई एआई शक्ति है, तो दूसरी ओर ग्लोबल साउथ की सामूहिक चिंताओं एवं आकांक्षाओं की प्रतिनिधि आवाज भी है।
- इस सम्मेलन के माध्यम से भारत वैश्विक एआई गवर्नेंस में अपनी भूमिका को सुदृढ़ करने और एआई से उत्पन्न आर्थिक व विकासात्मक लाभों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
एआई इम्पैक्ट समिट 2026: अपेक्षित स्वरूप एवं महत्व
यह सम्मेलन अब तक आयोजित एआई से संबंधित सबसे बड़े वैश्विक आयोजनों में से एक होगा। इसमें विभिन्न क्षेत्रों और महाद्वीपों से व्यापक भागीदारी देखने को मिलेगी।
उच्चस्तरीय अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता
- सम्मेलन में 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों के भाग लेने की संभावना है। इनमें 15–20 राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख, 50 से अधिक मंत्री तथा वैश्विक व भारतीय कंपनियों के 40 से अधिक सीईओ शामिल होंगे।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे, औपचारिक रात्रिभोज की मेज़बानी करेंगे और सीईओ राउंडटेबल को संबोधित करेंगे।
बहु-हितधारक मॉडल
इस आयोजन में सरकारों के साथ-साथ उद्योग, अकादमिक जगत, शोध संस्थान, नागरिक समाज संगठन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भाग लेंगी। यह एआई गवर्नेंस के लिए समावेशी एवं बहु-हितधारक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
प्रमुख विषय और विमर्श
इस सम्मेलन के दौरान विभिन्न कार्य समूहों में रोजगार पर एआई के प्रभाव, एआई प्रणालियों के लिए भरोसेमंद और सुरक्षित ढांचे तथा स्वास्थ्य, उद्योग व सेवाओं जैसे प्रमुख क्षेत्रों में एआई के अनुप्रयोगों पर गहन चर्चा होगी।
भारत की एआई पहल और नवाचार पर फोकस
- ₹10,370 करोड़ के IndiaAI मिशन के अंतर्गत सम्मेलन के दौरान कई स्वदेशी एआई भाषा मॉडल लॉन्च किए जाएंगे, जिनमें फाउंडेशनल मॉडल और छोटे भाषा मॉडल शामिल होंगे।
- इसके अतिरिक्त, 500 से अधिक एआई स्टार्टअप्स को मंच प्रदान किया जाएगा और मुख्य कार्यक्रम के समानांतर लगभग 500 सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिससे यह सम्मेलन नवाचार और उद्यमिता का भी एक प्रमुख वैश्विक केंद्र बन जाएगा।
एआई इम्पैक्ट समिट और चीन: रणनीतिक संकेत
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चीन की संभावित भागीदारी : चीन के एक प्रतिनिधिमंडल के सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है। भारत ने औपचारिक रूप से चीन को आमंत्रित किया था क्योंकि दोनों देश अपनी घरेलू एआई क्षमताओं को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
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सम्मेलन का स्वरूप और कूटनीतिक लचीलापन : यह सम्मेलन किसी औपचारिक बहुपक्षीय संगठन के अंतर्गत नहीं आता है, बल्कि इसकी संरचना मेज़बान देश द्वारा निर्धारित की जाती है। इससे भारत को भू-राजनीतिक संवेदनशीलताओं के बावजूद चीन को आमंत्रित करने की स्वतंत्रता मिली है।
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द्विपक्षीय संबंधों में नरमी के संकेत : चीन को आमंत्रण देना भारत–चीन संबंधों में धीरे-धीरे आ रही नरमी को दर्शाता है। हाल ही में दोनों देशों के बीच पाँच वर्षों के अंतराल के बाद सीधी उड़ानों की बहाली और दुर्लभ खनिज आपूर्ति से जुड़े प्रतिबंधों में ढील इसके उदाहरण हैं।
हार्डवेयर और ऊर्जा: भारत के सामने संरचनात्मक चुनौतियाँ
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कंप्यूटिंग हार्डवेयर पर निर्भरता : एआई क्षेत्र में भारत की एक प्रमुख कमजोरी उन्नत कंप्यूटिंग हार्डवेयर का घरेलू उत्पादन न होना है। उच्च-स्तरीय जी.पी.यू., जो एआई प्रणालियों की रीढ़ हैं, मुख्यतः आयात पर निर्भर हैं जिससे आत्मनिर्भरता सीमित होती है।
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भारत–अमेरिका तकनीकी सहयोग की संभावनाएँ : प्रस्तावित अंतरिम भारत–अमेरिका व्यापार समझौते से तकनीकी उत्पादों, विशेषकर जी.पी.यू. और डेटा सेंटर उपकरणों के व्यापार में वृद्धि की उम्मीद है जिससे भारत की एआई क्षमता को कुछ हद तक बल मिल सकता है।
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डेटा सेंटर नीति और बजटीय संकेत : भारत सरकार ने विदेशी कंपनियों के लिए 2047 तक डेटा सेंटर स्थापना पर कर अवकाश की घोषणा की है ताकि घरेलू एआई अवसंरचना विकसित की जा सके। हालाँकि, केंद्रीय बजट 2026–27 में IndiaAI मिशन के तहत कंप्यूट सब्सिडी के लिए आवंटन में कटौती यह संकेत देती है कि नीति प्राथमिकताओं में पुनर्संतुलन हो रहा है।
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ऊर्जा आवश्यकताएँ और परमाणु विकल्प : एआई डेटा सेंटरों की बढ़ती ऊर्जा मांग एक नई चुनौती के रूप में उभर रही है। दीर्घकालिक समाधान के रूप में सरकार परमाणु ऊर्जा को एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में देखने लगी है।
निष्कर्ष
एआई इम्पैक्ट समिट 2026 भारत के लिए केवल एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन नहीं है बल्कि वैश्विक एआई गवर्नेंस में नेतृत्व स्थापित करने का रणनीतिक अवसर है। समावेशी विकास, व्यावहारिक नीतियों और ग्लोबल साउथ के हितों पर केंद्रित भारत का दृष्टिकोण वैश्विक एआई विमर्श को नई दिशा दे सकता है। हालाँकि, हार्डवेयर, ऊर्जा और निवेश से जुड़ी संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान किए बिना इस अवसर का पूर्ण लाभ उठाना कठिन होगा। फिर भी, यह सम्मेलन भारत की तकनीकी कूटनीति और वैश्विक भूमिका को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखता है।