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भारत में वायु प्रदूषण : मौसमी संकट या राष्ट्रीय समस्या

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय घटनाक्रम, पर्यावरणीय पारिस्थितिकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ 

भारत में वायु प्रदूषण अब केवल उत्तरी मैदानी इलाकों तक सीमित एक मौसमी घटना नहीं रह गया है; बल्कि यह एक सतत और व्यापक राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है। इंडो-गंगा के मैदानी इलाकों से लेकर तेजी से बढ़ते शहरी केंद्रों तक हवा में खतरनाक कणों की सांद्रता (विशेष रूप से PM 2.5) हर जनसांख्यिकीय समूह को प्रभावित कर रही है, बाल विकास को प्रभावित कर रही है और अदृश्य रूप में देश में जीवन प्रत्याशा को कम कर रही है।

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संकट का पैमाना: त्रुटिपूर्ण सूचकांक और अवास्तविक सीमाएँ

  • वायु गुणवत्ता और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (CREA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में सर्वेक्षण किए गए 256 शहरों में से 150 में राष्ट्रीय PM 2.5 मानक (60 µg/m³) का उल्लंघन पाया गया। 
  • राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में PM 2.5 का स्तर 107-130 µg/m³ के बीच दर्ज किया गया जो भारत की सीमा से दोगुना और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशानिर्देश (15 µg/m³) से कई गुना अधिक है। 

आधिकारिक सूचकांक की विफलता:

  • भारत का आधिकारिक वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अभी भी 500 की सीमा पर ही बना हुआ है, जबकि वास्तविक प्रदूषण स्तर प्राय: इससे अधिक होता है। 
  • इसके परिणामस्वरूप, सरकारी प्लेटफॉर्म सभी अत्यधिक प्रदूषण को एक ही ‘गंभीर’ श्रेणी में रखते हैं, जबकि अंतर्राष्ट्रीय निगरानी तंत्र (जैसे- IQAir) नियमित रूप से 600 से ऊपर और कभी-कभी 1,000 से भी अधिक मान दर्शाते हैं। यद्यपि विशेषज्ञ इस पुराने और त्रुटिपूर्ण AQI पैमाने को तत्काल पुनः समायोजित करने तथा आधुनिक निगरानी प्रणाली लागू करने की मांग कर रहे हैं।

स्वास्थ्य पर विनाशकारी बोझ

जहरीली हवा का स्वास्थ्य पर पड़ने वाला भयावह प्रभाव सीधे जीवन प्रत्याशा को प्रभावित करता है।

  • जीवन प्रत्याशा की हानि
    • शिकागो विश्वविद्यालय के AQLI के अनुसार, लगभग 46% भारतीय ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ वायु प्रदूषण के कारण जीवन प्रत्याशा में काफी कमी आती है। 
    • WHO के मानकों के अनुसार, दिल्ली में PM 2.5 के वर्तमान स्तर के संपर्क में आने से आठ वर्ष से अधिक का जीवनकाल कम हो जाता है। 
  • मृत्यु दर 
    • स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, 2023 में देश भर में वायु प्रदूषण के कारण लगभग बीस लाख मौतें हुईं। 
    • प्रदूषण से जुड़ी मृत्यु दर 2000 से 43% बढ़ी है जो दीर्घकालिक एवं संचयी जोखिम को रेखांकित करती है।

PM 2.5 का शरीर पर प्रभाव

हृदय संबंधी समस्या 

  • PM 2.5 कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर रक्तप्रवाह में शामिल हो जाते हैं और पूरे शरीर में सूजन पैदा करते हैं।
  • अध्ययनों से पता चला है कि PM 2.5 के दीर्घकालिक संपर्क में आने से 10 µg/m³ की वृद्धि से वार्षिक मृत्यु दर में 8% की वृद्धि होती है।  
  • यह मानव शरीर में उच्च रक्तचाप, एथेरोस्क्लेरोसिस, मायोकार्डियल रोधगलन/दिल का दौरा (Myocardial Infarction) और स्ट्रोक कारण बनता है। 

श्वसन संबंधी बीमारियाँ

  • विषाक्त वायु का सबसे स्पष्ट परिणाम श्वसन संबंधी बीमारियाँ हैं। भारत में लगभग 6% बच्चे अस्थमा से पीड़ित हैं। 
  • AIIMS के नैदानिक आंकड़ों से पता चलता है कि PM 2.5 में मामूली 10 µg/m³ की वृद्धि से भी श्वसन संबंधी समस्या के लिए बाल चिकित्सा आपातकालीन विभाग में आने वाले बच्चों की संख्या में 20-40% की बढ़ोतरी हो सकती है। 

तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव

  • PM 2.5 कण रक्त-मस्तिष्क अवरोध को पार कर सकते हैं जिससे तंत्रिका सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव उत्पन्न होता है। 
  • यह बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन, स्मृति एवं संज्ञानात्मक विकास को भी प्रभावित कर सकता है। अंतर्राष्ट्रीय मेटा-विश्लेषण दर्शाते हैं कि PM 2.5 में प्रत्येक 10 µg/m³ की वृद्धि के साथ मनोभ्रंश का जोखिम 35-49% तक बढ़ जाता है।  

मातृ एवं नवजात शिशु स्वास्थ्य

उच्च PM 2.5 के संपर्क में आने से समय पूर्व जन्म, कम वजन वाले शिशुओं का जन्म और नवजात शिशु मृत्यु दर में वृद्धि होती है जिससे पीढ़ीगतस्वास्थ्य असमानताएँ गहरी होती हैं।

रणनीतिक समस्या 

  • वायु प्रदूषण भारत में मौजूदा सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं को भी दर्शाता है। वस्तुतः निम्न आय वर्ग के लोग प्राय: प्रदूषण के मुख्य स्रोतों, जैसे- सड़कों, औद्योगिक क्षेत्रों, निर्माण स्थलों व कचरा स्थलों के सबसे निकट रहते हैं जिससे वे सर्वाधिक संवेदनशील होते हैं। 
  • सार्वजनिक चर्चाओं में प्राय: पराली दहन या दिवाली पर आतिशबाजी पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया जाता है जबकि ये केवल मौसमी कारक हैं जो स्थिति में वृद्धि करते हैं। 
  • स्रोत-निर्धारण अध्ययनों से लगातार पता चलता है कि पूरे वर्ष के संरचनात्मक कारक, जैसे- वाहनों का उत्सर्जन, औद्योगिक प्रक्रियाएँ, निर्माण धूल एवं अनौपचारिक अपशिष्ट का दहन आधारभूत PM 2.5 स्तरों को गहरे स्तर पर प्रभावित करते हैं। 

आगे की राह: स्वास्थ्य-केंद्रित नीतिगत ढाँचे का निर्माण 

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के द्वारा सुधारों पर बल दिया जा रहा है किंतु इसके लक्ष्य प्रासंगिक नहीं हैं और साथ ही कार्यान्वयन भी कमजोर है। यद्यपि अब एक बहु-क्षेत्रीय, स्वास्थ्य-केंद्रित रणनीति की आवश्यकता है जो वायु प्रदूषण को जमीनी स्तर पर नियंत्रित कर सके। 

परिवहन में आमूलचूल परिवर्तन

बसों, टैक्सियों और दोपहिया वाहनों का बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण करना तथा माल ढुलाई को रेल और इलेक्ट्रिक बेड़े में स्थानांतरित करना 

कठोर औद्योगिक नियंत्रण

प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकियों का कड़ाई से प्रवर्तन और कोयला-आधारित प्रक्रियाओं में चरणबद्ध तरीके से परिवर्तन करना

निर्माण नियमन और अपशिष्ट प्रबंधन सुधार

धूल-नियंत्रण प्रोटोकॉल को अनिवार्य करना और खुले में अपशिष्ट जलाने को समाप्त करने के लिए विकेन्द्रीकृत उपचार प्रणालियों का कार्यान्वयन सुनिश्चत करना

स्वास्थ्य प्रणाली का एकीकरण 

स्वच्छ वायु मानकों को नियमित स्वास्थ्य देखभाल में एकीकृत किया जाना चाहिए। इसमें वास्तविक समय के AQI पर आधारित जिला स्तरीय स्वास्थ्य सलाह, विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अंतर्गत फेफड़ों की कार्यक्षमता का परीक्षण और सी.ओ.पी.डी. तथा संज्ञानात्मक कमी की सक्रिय जांच शामिल होनी चाहिए।

मौलिक अधिकार के रूप में स्वच्छ वायु को बढ़ावा 

भारत में मौलिक अधिकार के रूप में स्वच्छ वायु समावेशी विकास के लिए आवश्यक है। वैज्ञानिक प्रमाण और स्वास्थ्य पर इसके अपरिवर्तनीय प्रभाव यह मांग करते हैं कि स्वच्छ वायु का संरक्षण अब एक अप्रतिबंधित राष्ट्रीय प्राथमिकता बने, जो विज्ञान पर आधारित हो।

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