(प्रारंभिक परीक्षा: अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2 व 3: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूह तथा भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार, भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन) |
संदर्भ
- अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) और 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संधियों व संगठनों से बाहर निकलने की घोषणा की है जिनके बारे में उसका कहना है कि वे अब अमेरिकी हितों की सेवा व सुरक्षा नहीं करते हैं।
- इस फैसले के तहत जलवायु से जुड़े प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय निकायों, जैसे- अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC), अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) से भी अमेरिका बाहर हो गया है।
- यह कदम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उस पहले के निर्णय के बाद आया है जिसमें उन्होंने पेरिस समझौते से हटने की घोषणा की थी। यह निर्णय अनिवार्य एक-वर्षीय नोटिस अवधि पूरी होने के बाद 20 जनवरी से प्रभावी होगा। इन सभी कदमों को मिलाकर देखा जाए तो यह वैश्विक जलवायु शासन प्रणाली से अमेरिका के लगभग पूर्ण अलगाव को दर्शाता है जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बहुपक्षीय प्रयासों की प्रभावशीलता और भविष्य दोनों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
अमेरिका का उत्सर्जन प्रोफाइल
- अमेरिका वार्षिक एवं प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन दोनों ही मामलों में शीर्ष देशों में शामिल है।
- ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में अमेरिका का क्षेत्रीय CO₂ उत्सर्जन लगभग 4.9 अरब टन था, जो वैश्विक उत्सर्जन का करीब 12.7% है।
- वर्ष 2024 में प्रति व्यक्ति CO₂ उत्सर्जन लगभग 14.6 टन रहा, जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है और देश की कार्बन-गहन उपभोग शैली को दर्शाता है।
- इसके अलावा जीवाश्म ईंधन और उद्योग से होने वाले कुल ऐतिहासिक CO₂ उत्सर्जन के मामले में अमेरिका सबसे बड़ा योगदानकर्ता है जिसकी वैश्विक हिस्सेदारी लगभग 24% है।
- अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) के अनुसार, वर्ष 2022 में अमेरिका का कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 6.3 अरब मीट्रिक टन CO₂-समतुल्य था। भूमि उपयोग और वन क्षेत्र लगभग 13% उत्सर्जन को अवशोषित कर एक शुद्ध कार्बन सिंक की भूमिका निभाते हैं।
जलवायु कार्रवाई के साथ अमेरिका का पुराना उतार–चढ़ाव भरा संबंध
अमेरिका ने UNFCCC के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और जलवायु परिवर्तन को मान्यता देने तथा वैश्विक सिद्धांत तय करने में अग्रणी रहा। हालाँकि, वह क्योटो प्रोटोकॉल में कभी शामिल नहीं हुआ क्योंकि उसमें बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारित किए गए थे।
पेरिस समझौते का सूत्रधार
अमेरिका ने क्योटो के विकल्प के रूप में पेरिस समझौते को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बावजूद पेरिस समझौते के तहत उसका प्रदर्शन कमजोर रहा और उत्सर्जन में सीमित कटौती तथा वित्त व प्रौद्योगिकी संबंधी वादों की अपर्याप्त पूर्ति देखने को मिली।
ट्रम्प से पहले का दौर
कमियों के बावजूद ट्रम्प से पहले अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन से इनकार नहीं किया। वह वैश्विक जलवायु वार्ताओं में सक्रिय रहा, जलवायु विज्ञान और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में भारी निवेश करता रहा और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हरित निवेश को बढ़ावा देता रहा।
ट्रम्प युग: संशय से एक्जिट तक
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका का रुख पूरी तरह बदल गया। वस्तुतः स्वयं को जलवायु संशयवादी बताने वाले ट्रम्प ने जलवायु कार्रवाई का मज़ाक उड़ाया, अंतर्राष्ट्रीय समझौतों से बाहर निकले और जलवायु अनुसंधान के लिए फंडिंग में कटौती की, जो अमेरिका की वैज्ञानिक नेतृत्व क्षमता को देखते हुए वैश्विक स्तर पर दीर्घकालिक नुकसान पहुँचा सकती है।
वैश्विक जलवायु संस्थानों से अमेरिका के बाहर निकलने के प्रभाव
- UNFCCC और उससे जुड़े निकायों से अमेरिका का हटना पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं था क्योंकि वह पहले ही पेरिस समझौते से बाहर निकल चुका था और जलवायु अनुसंधान के बजट में कटौती कर चुका था।
- चूँकि दुनिया पहले से ही वर्ष 2030 के लक्ष्यों को पाने की राह से भटकी हुई है और अमेरिका का योगदान भी सीमित रहा है, इसलिए अल्पकालिक वैश्विक प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
- हालाँकि, दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य की अमेरिकी सरकारें इस फैसले को पलटती हैं या नहीं। यदि अमेरिका लंबे समय तक अलग-थलग रहता है तो बहुपक्षीय जलवायु सहयोग कमजोर पड़ सकता है और सामूहिक कार्रवाई में देरी हो सकती है।
- इस अलगाव से अमेरिका, नेतृत्व की भूमिका चीन को सौंपने का जोखिम उठा रहा है, जो नवीकरणीय ऊर्जा के निर्माण, तैनाती एवं आपूर्ति शृंखलाओं में आक्रामक रूप से विस्तार कर रहा है।
नवीकरणीय ऊर्जा की अपरिवर्तनीय गति
- अधिकांश देश ऊर्जा सुरक्षा और लागत के कारण पहले ही नवीकरणीय ऊर्जा के प्रति प्रतिबद्ध हो चुके हैं। सौर एवं पवन ऊर्जा अब आर्थिक व रणनीतिक दोनों दृष्टियों से आकर्षक बन चुकी हैं जिससे ऊर्जा संक्रमण का पूर्ण पलटाव असंभव सा प्रतीत होता है।
- तेल उत्पादन बढ़ाने जैसे प्रयास इस संक्रमण को धीमा कर सकते हैं किंतु इसे रोक नहीं सकते हैं। स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र से हटकर अमेरिका अपने दीर्घकालिक आर्थिक हितों और भू-राजनीतिक प्रभाव दोनों को नुकसान पहुँचा सकता है।
भारत के जलवायु एवं ऊर्जा संक्रमण पर प्रभाव
वैश्विक जलवायु निकायों से अमेरिका के बाहर निकलने से भारत पर अल्पकाल में तेज़ी से डी-कार्बनाइज़ करने का दबाव कुछ कम हो सकता है किंतु इससे स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में निवेश आकर्षित करने की भारत की योजनाओं को लेकर अनिश्चितता भी बढ़ जाती है।
भारत–अमेरिका जलवायु सहयोग को झटका
- डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल से पहले भारत एवं अमेरिका के बीच जलवायु व स्वच्छ ऊर्जा पर एक मज़बूत रणनीतिक साझेदारी थी, जिसमें अमेरिका का कई ऊर्जा क्षेत्रों में समर्थन शामिल था।
- अब इस सहयोग के ठप पड़ने की आशंका है जिससे भारत को अपने ऊर्जा संक्रमण के मार्गों पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन और फंडिंग की चुनौती
- अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) से भी बाहर निकलने का फैसला किया है जिसकी स्थापना भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर COP 21 (पेरिस) के दौरान की थी। हालाँकि, अमेरिका वर्ष 2021 में ISA का 101वाँ सदस्य बना था किंतु उसने कोई वित्तीय योगदान नहीं दिया।
- वर्ष 2025 में वार्षिक सदस्यता शुल्क लगाने का निर्णय अभी तक लागू नहीं हो सका है जिससे गठबंधन की भविष्य की फंडिंग एवं गति को लेकर सवाल बने हुए हैं।
निष्कर्ष
- अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से ‘एग्ज़िट पॉलिसी’ केवल एक देश की विदेश नीति में बदलाव नहीं है बल्कि यह वैश्विक बहुपक्षीय व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्या से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास अनिवार्य हैं और ऐसे समय में अमेरिका का अलग-थलग पड़ना नेतृत्व शून्यता पैदा करता है।
- भारत सहित अन्य विकासशील देशों के लिए यह स्थिति अवसर एवं जोखिम दोनों लेकर आती है। एक ओर उन्हें अधिक रणनीतिक स्वायत्तता मिल सकती है तो दूसरी ओर वित्त, तकनीक एवं सहयोग की कमी ऊर्जा संक्रमण को जटिल बना सकती है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि अमेरिका की यह नीति अस्थायी राजनीतिक रुख है या वैश्विक शासन में एक स्थायी दरार का संकेत।