संदर्भ
- वैश्विक हीरा उद्योग लंबे समय से संपन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक रहा है, किंतु इसका एक पक्ष हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता से भी जुड़ा हुआ है। 1990 के दशक में कई देशों में सशस्त्र गुटों ने कच्चे हीरों की अवैध बिक्री के माध्यम से गृह संघर्षों को वित्तीय समर्थन प्रदान किया। ऐसे हीरों को सामान्यतः संघर्ष हीरे कहा गया।
- इस चुनौती से निपटने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने किम्बर्ली प्रक्रिया की शुरुआत की, जो कच्चे हीरों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करने वाला एक बहुपक्षीय तंत्र है।
वर्ष 2026 में भारत द्वारा इसकी अध्यक्षता संभालना एक निर्णायक अवसर प्रस्तुत करता है। अंतर्राष्ट्रीय हीरा मूल्य श्रृंखला में अपनी केंद्रीय स्थिति के कारण भारत नैतिक व्यापार, पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी नवाचार से जुड़े सुधारों का नेतृत्व कर सकता है तथा वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बना सकता है।
किम्बर्ली प्रक्रिया की उत्पत्ति और विकास
पहल की शुरुआत
- इस प्रक्रिया की नींव वर्ष 2000 में दक्षिणी अफ्रीकी देशों के बीच हुई चर्चाओं के दौरान रखी गई थी, जिनका उद्देश्य हीरों के माध्यम से युद्धों के वित्तपोषण को रोकना था। इन वार्ताओं के परिणामस्वरूप 2003 में किम्बर्ली प्रक्रिया प्रमाणन योजना अस्तित्व में आई।
- वर्तमान में इस ढांचे में 60 प्रतिभागी शामिल हैं, जो 86 देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और यह विश्व के लगभग 99.8% कच्चे हीरा उत्पादन को कवर करता है।
- यह व्यवस्था एक विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय नियामक मॉडल के रूप में कार्य करती है, जो एक उच्च मूल्य वाली वस्तु के वैश्विक व्यापार को नियंत्रित करती है।
प्रमाणन प्रणाली
- प्रमाणन योजना के अंतर्गत कच्चे हीरों की प्रत्येक खेप के साथ उनकी वैध उत्पत्ति को प्रमाणित करने वाला अधिकृत प्रमाण पत्र होना आवश्यक है।
- व्यापार केवल उन देशों के बीच किया जा सकता है जो इस प्रणाली का अनुपालन करते हों, और प्रतिभागी देशों को उत्पादन तथा निर्यात से संबंधित सांख्यिकीय जानकारी साझा करनी होती है।
- इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता सुनिश्चित करना और अवैध हीरा व्यापार को रोकना है।
वैश्विक हीरा मूल्य श्रृंखला में भारत की भूमिका
- हालाँकि भारत प्रमुख हीरा उत्पादक देशों में शामिल नहीं है, फिर भी वह विश्व का सबसे बड़ा हीरा प्रसंस्करण केंद्र है। भारत वैश्विक कच्चे हीरों का लगभग 40% आयात करता है और मुख्यतः सूरत और मुंबई में उनकी कटाई व पॉलिशिंग करता है। इसके बाद इन हीरों का निर्यात अमेरिका, चीन, संयुक्त अरब अमीरात, इज़राइल और हांगकांग जैसे बाज़ारों में किया जाता है। अंगोला, बोत्सवाना, रूस, कनाडा, कांगो और नामीबिया जैसे देश खनन के क्षेत्र में अग्रणी हैं, जबकि मूल्य संवर्धन की प्रक्रिया पर भारत का प्रभुत्व है।
- यह स्थिति भारत को आपूर्ति श्रृंखला के भीतर महत्वपूर्ण प्रभाव प्रदान करती है और उसे कूटनीतिक व व्यापारिक माध्यमों से वैश्विक मानकों को प्रभावित करने की क्षमता देती है।
किम्बर्ली प्रक्रिया के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
संघर्ष में हीरा की सीमित परिभाषा
वर्तमान परिभाषा केवल उन हीरों तक सीमित है जो सरकारों के विरुद्ध विद्रोही समूहों को वित्तपोषित करते हैं। इसमें राज्य प्रायोजित हिंसा, जबरन श्रम, मानव तस्करी, पर्यावरणीय क्षति तथा पारंपरिक खनन में शोषण जैसे गंभीर मुद्दों को शामिल नहीं किया गया है। इस कारण मानवाधिकार उल्लंघनों से जुड़े हीरे भी वैध अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच बना लेते हैं।
निर्णय प्रक्रिया की जटिलताएँ
- किम्बर्ली प्रक्रिया सर्वसम्मति आधारित निर्णय प्रणाली पर निर्भर करती है, जिससे किसी एक प्रतिभागी को भी किसी प्रस्ताव को रोकने का अधिकार मिल जाता है। इस व्यवस्था के चलते प्रवर्तन तंत्र कमजोर पड़ता है और समस्याग्रस्त स्रोतों के विरुद्ध समय पर कार्रवाई करना कठिन हो जाता है।
प्रतिबंधों की सीमित प्रभावशीलता
- 2013 में मध्य अफ्रीकी गणराज्य पर लगाए गए प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट किया कि केवल प्रतिबंध लगाने से तस्करी और अस्थिरता बढ़ सकती है।
- आर्थिक सहायता के अभाव में खनन पर निर्भर समुदायों की आजीविका प्रभावित होती है, जिससे ऐसे दंडात्मक उपाय अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते।
भारत की अध्यक्षता में सुधार की संभावनाएँ
संस्थागत सुदृढ़ीकरण
- एक समर्पित तकनीकी कार्य समूह विद्रोही संघर्षों से आगे बढ़कर व्यापक हिंसा और जोखिमों का अध्ययन कर सकता है तथा संघर्ष हीरों की परिभाषा को धीरे-धीरे विस्तारित करने पर सहमति बना सकता है।
- संस्थागत सुधारों के तहत स्वतंत्र ऑडिट, विस्तृत आंकड़ों का सार्वजनिक प्रकटीकरण और नागरिक समाज के साथ अधिक मजबूत सहभागिता को बढ़ावा दिया जा सकता है।
तकनीकी आधुनिकीकरण
- डिजिटल तकनीकें किम्बर्ली प्रक्रिया को नई दिशा दे सकती हैं। ब्लॉकचेन आधारित समाधान छेड़छाड़-रोधी और समय-मुद्रित शिपमेंट रिकॉर्ड उपलब्ध करा सकते हैं।
- उन्नत डिजिटल प्रमाणन से धोखाधड़ी की संभावना घटेगी, ट्रेसबिलिटी बढ़ेगी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला अधिक आधुनिक बनेगी।
उत्पादक देशों में क्षमता निर्माण
- हीरा उत्पादक क्षेत्रों को सशक्त बनाना अत्यंत आवश्यक है। मध्य और पूर्वी अफ्रीका में क्षेत्रीय क्षमता निर्माण केंद्र स्थापित कर प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और फोरेंसिक समर्थन प्रदान किया जा सकता है। ऐसे सहयोगात्मक प्रयास दंड की बजाय अनुपालन को प्रोत्साहित करेंगे।
विकासोन्मुख दृष्टिकोण, अफ्रीकी आयाम और भारत की वैश्विक भूमिका
विकास और अफ्रीका केंद्रित दृष्टि
- अफ्रीका के अनेक क्षेत्रों में हीरा खनन आजीविका का प्रमुख साधन है। यदि किम्बर्ली प्रक्रिया की पहलों को गरीबी उन्मूलन, सम्मानजनक रोजगार और सतत विकास लक्ष्यों के साथ जोड़ा जाए, तो यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि हीरा उद्योग से प्राप्त राजस्व स्थानीय स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में निवेश हो।
- इससे प्रतिबंध आधारित दृष्टिकोण के स्थान पर विकास, स्थिरता और समावेशी आर्थिक प्रगति पर आधारित मॉडल को बढ़ावा मिलेगा।
भारत का वैश्विक नेतृत्व
- वैश्विक दक्षिण की एक प्रभावशाली आवाज के रूप में भारत उत्पादक, प्रसंस्करणकर्ता और उपभोक्ता देशों के हितों के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।
- जवाबदेही को सुदृढ़ करने और बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देकर भारत किम्बर्ली प्रक्रिया को एक अधिक विश्वसनीय और प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय संस्था में परिवर्तित कर सकता है, जिससे उसकी एक जिम्मेदार वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में छवि भी सुदृढ़ होगी।
निष्कर्ष
- किम्बर्ली प्रक्रिया ने संघर्षग्रस्त हीरों के प्रवाह को सीमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, किंतु इसकी प्रभावशीलता अभी भी संकीर्ण परिभाषाओं, राजनीतिक बाधाओं और अपर्याप्त विकासात्मक दृष्टिकोण से सीमित है।
- वर्ष 2026 में भारत की अध्यक्षता संस्थागत सुधार, तकनीकी नवाचार और अफ्रीकी उत्पादक देशों के साथ सहकारी साझेदारी को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है। पारदर्शिता, सामुदायिक हित और नैतिक व्यापार को केंद्र में रखने वाला एक सुदृढ़ ढांचा न केवल हीरा उद्योग को अधिक जिम्मेदार बनाएगा, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को भी मजबूती प्रदान करेगा।