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असम-मेघालय सीमा विवाद समाधान

(प्रारंभिक परीक्षा- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2: संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान)

संदर्भ 

  • हाल ही में, असम और मेघालय ने अपने 50 वर्ष पुराने अंतर्राज्यीय सीमा विवाद के कुल 12 में से 6 क्षेत्रों के विवाद समाधान हेतु एक समझौते पर हस्ताक्षर किया। 
  • इससे असम-मेघालय सीमा के शेष क्षेत्रों और असम तथा तीन अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के बीच अंतर के समान क्षेत्रों में विवादों को हल करने का मार्ग प्रशस्त होने की उम्मीद है।

विवाद

  • मेघालय वर्ष 1970 में एक स्वायत्त राज्य के रूप में असम से अलग हुआ और वर्ष 1972 में इसे एक पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ।
  • नए राज्य का निर्माण वर्ष 1969 के असम पुनर्गठन (मेघालय) अधिनियम पर आधारित था, जिसे मेघालय सरकार ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
  • वर्ष 1951 की समिति की सिफारिशों के आधार पर, मेघालय के वर्तमान पूर्वी जयंतिया हिल्स, री-भोई और पश्चिमी खासी हिल्स जिलों के क्षेत्रों को असम के कार्बी आंगलोंग, कामरूप (मेट्रो) और कामरूप ज़िलों में स्थानांतरित कर दिया गया था। 
  • मेघालय ने पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त करने के बाद इन तबादलों का विरोध किया और दावा किया कि ये क्षेत्र मेघालय के अंतर्गत आते हैं। लेकिन असम का तर्क है कि मेघालय सरकार के पास इन क्षेत्रों पर अपना दावा साबित करने के लिये किसी प्रकार के दस्तावेज़ व अभिलेखीय सामग्री उपलब्ध नहीं है।

विवाद समाधान के प्रयास

  • दोनों राज्यों ने शुरू में बातचीत के माध्यम से सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिश की थी, किंतु पहला गंभीर प्रयास वर्ष 1983 में हुआ था जब इस मुद्दे को हल करने के लिये एक संयुक्त आधिकारिक समिति का गठन किया गया, हालाँकि कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
  • जैसे-जैसे अधिक क्षेत्रों पर विवाद होने लगा, दोनों राज्य वर्ष 1985 में न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र पैनल के गठन पर सहमत हुए। समिति ने वर्ष 1987 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। मेघालय ने रिपोर्ट को खारिज कर दिया, क्योंकि यह कथित रूप से असम समर्थक थी।
  • वर्ष 2011 में मेघालय विधानसभा ने केंद्रीय हस्तक्षेप और एक सीमा आयोग के गठन की मांग की। असम विधानसभा ने इस कदम का विरोध किया। किंतु केंद्र ने दोनों सरकारों को अंतर के बिंदुओं को कम करने के लिये सीमा विवाद पर चर्चा के लिये एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया।
  • जून 2021 में दोनों राज्यों ने मुख्यमंत्री स्तर पर बातचीत फिर से शुरू करने और विवादों को हमेशा के लिये निपटाने के लिये ‘आदान-प्रदान की नीति’  (Give and Take Policy) अपनाने का फैसला किया।

नीति

  • नीति के अनुसार सर्वप्रथम 12 विवादित क्षेत्रों में से छह ‘कम जटिल’ क्षेत्रों - ताराबारी, गिज़ांग, हाहिम, बोकलापारा, खानापारा-पिलिंगकाटा और रातचेरा को पहले चरण में हल करने के लिये चुना गया था। 
  • दोनों राज्यों ने विवादित क्षेत्रों से प्रभावित ज़िलों के लिये तीन क्षेत्रीय समितियों का गठन किया। इन समितियों, जिनमें से प्रत्येक की अध्यक्षता एक कैबिनेट मंत्री करते हैं, को इस मुद्दे पर विचार करने के लिये ‘पाँच सिद्धांत’ दिये गए थे। ये सिद्धांत हैं- विवादित क्षेत्र के ऐतिहासिक तथ्य, नृजातीयता, प्रशासनिक सुविधा, लोगों की इच्छा और प्राकृतिक सीमाओं, जैसे- नदियों, नदी धाराओं और चट्टानों के साथ भूमि की निकटता। 
  • समिति के सदस्यों ने विवादित क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया और स्थानीय हितधारकों के साथ कई बैठकें कीं। जनवरी 2022 में दोनों सरकारों ने इन क्षेत्रीय समितियों की सिफारिशों के आधार पर तैयार एक मसौदा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये।
  • आंशिक सीमा समझौते के तहत असम को 36.79 वर्ग किमी. के विवादित क्षेत्र में 18.51 वर्ग किमी. जबकि मेघालय को शेष 18.28 वर्ग किमी. क्षेत्र दिया जाएगा।
  • वर्तमान समझौते पर हस्ताक्षर के साथ ही अंतर्राज्यीय सीमा के 70% विवाद का समाधान हो गया है।

असम का अन्य राज्यों के साथ विवाद

असम का तर्क है कि छह पड़ोसी राज्यों ने उसकी 77,531.71 हेक्टेयर भूमि पर नियंत्रण कर रखा है। असम का मेघालय के अलावा अन्य राज्यों- अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, नगालैंड, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के साथ सीमा विवाद जारी है।

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