संदर्भ
भारत की स्वास्थ्य नीति में एक युगांतरकारी बदलाव देखा जा रहा है। केंद्रीय बजट 2026-27 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियाँ—आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध एवं होम्योपैथी (AYUSH) अब केवल विकल्प नहीं है, बल्कि मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवा का आधार स्तंभ बन रही हैं। ₹4,408 करोड़ के भारी-भरकम बजट आवंटन के साथ सरकार ने आयुष को घरेलू स्तर पर सशक्त बनाने और वैश्विक पटल पर ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में स्थापित करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
संस्थागत मजबूती और बुनियादी ढांचे का विस्तार
- आयुष मंत्रालय के तहत संचालित यह क्षेत्र एक विशाल नेटवर्क में तब्दील हो चुका है। राष्ट्रीय आयुष मिशन (NAM) के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुँचाया जा रहा है।
- इस बजट की सबसे बड़ी उपलब्धि तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों (AIIA) की घोषणा है। AIIMS की तर्ज पर बनने वाले ये संस्थान न केवल मरीजों का उपचार करेंगे, बल्कि उच्च स्तरीय शोध और शिक्षा के माध्यम से आयुर्वेद का मानकीकरण भी करेंगे।
- इसके अतिरिक्त जामनगर स्थित ‘WHO ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर’ का उन्नयन भारत को पारंपरिक चिकित्सा के वैश्विक नियमों का निर्माता (Rule-maker) बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
तकनीक और किसानों का समन्वय: 'भारत-विस्तार'
- आयुष क्षेत्र की रीढ़ इसकी ‘आपूर्ति शृंखला’ और औषधीय पौधे हैं। इस दिशा में सरकार ने ‘भारत-विस्तार’ (Bharat-VISTAAR) नामक एक क्रांतिकारी AI-आधारित डिजिटल सहायक लॉन्च किया है।
- उद्देश्य: औषधीय पौधों की खेती करने वाले किसानों को रीयल-टाइम डेटा प्रदान करना
- लाभ: फसल की गुणवत्ता में सुधार, बाजार की कीमतों की जानकारी और निर्यात प्रमाणन में सुगमता
वैश्विक बाजार और भारत-यूरोपीय संघ समझौता
- भारत एवं यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) आयुष के लिए मील का पत्थर साबित हो रहा है। इस समझौते के बाद-
- भारतीय चिकित्सक अपनी डिग्री के आधार पर यूरोपीय देशों में सेवाएँ दे सकेंगे।
- आयुर्वेदिक उत्पादों के निर्यात के लिए सुरक्षा प्रमाणपत्रों की ‘पारस्परिक मान्यता’ से व्यापार बाधाएँ कम होंगी।
- पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) को वैश्विक मान्यता मिलने से भारतीय औषधीय सूत्रों की बायोपायरेसी (चोरी) पर लगाम लगेगी।
चुनौतियाँ: प्रमाणिकता और 'मिक्सोपैथी' का विवाद
- तेजी से बढ़ते इस क्षेत्र के सामने कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी हैं। ‘भारतीय चिकित्सा संघ’ (IMA) जैसे संगठन प्राय: नैदानिक प्रमाणों (Clinical Evidence) की कमी पर सवाल उठाते हैं।
- सुरक्षा: दवाओं में भारी धातुओं (जैसे- सीसा व पारा) की उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बनी हुई है।
- नियामक स्पष्टता: आयुष चिकित्सकों को कुछ सर्जरी और एलोपैथिक दवाएँ लिखने की अनुमति देने के फैसले ने ‘मिक्सोपैथी’ के विवाद को जन्म दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आयुष की साख बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक कठोरता और सख्त नियामक निगरानी अनिवार्य है।
निष्कर्ष
बजट 2026-27 ने आयुष क्षेत्र को एक नई दिशा और पर्याप्त ऊर्जा प्रदान की है। यदि भारत अपनी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों को आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़ने में सफल रहता है तो ‘आयुष’ न केवल स्वास्थ्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता लाएगा, बल्कि वैश्विक वेलनेस इकोनॉमी का नेतृत्व भी करेगा।