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भारत की बिजली वितरण कंपनियाँ: सुधार एवं स्थिरता संबंधी प्रश्न

संदर्भ 

भारत की विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMs) ने हाल के वर्षों में वित्तीय एवं परिचालन दोनों मोर्चों पर उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। इसके बावजूद उनकी दीर्घकालिक वित्तीय मजबूती और संस्थागत स्थिरता को लेकर चिंताएँ अभी भी बनी हुई हैं।

भारत में DISCOMs की भूमिका

  • विद्युत वितरण कंपनियाँ (डिस्कॉम) देश की विद्युत आपूर्ति श्रृंखला का अंतिम एवं सबसे महत्वपूर्ण चरण हैं जिनका दायित्व घरों, उद्योगों व कृषि उपभोक्ताओं तक बिजली पहुँचाना है।
  • वर्तमान में भारत में कुल 72 डिस्कॉम कार्यरत हैं जिनमें राज्य-स्वामित्व वाली उपयोगिताएँ, निजी कंपनियाँ और कुछ राज्यों के बिजली विभाग शामिल हैं।
  • ऐतिहासिक रूप से विद्युत क्षेत्र में डिस्कॉम सबसे कमजोर कड़ी रही हैं। तकनीकी अक्षमताओं, राजस्व हानि और बढ़ते कर्ज ने लंबे समय तक इनके वित्तीय स्वास्थ्य को प्रभावित किया है। उनकी स्थिति का आकलन मुख्यतः दो संकेतकों के आधार पर किया जाता है—
    • कुल तकनीकी एवं वाणिज्यिक (AT&C) हानियाँ, जिनमें बिजली चोरी, तकनीकी नुकसान और बिलिंग-वसूली अंतर शामिल हैं; तथा
    • ACS–ARR अंतर, जो बिजली आपूर्ति की औसत लागत और प्राप्त औसत राजस्व के बीच अंतर को दर्शाता है।
  • दशकों तक उच्च AT&C हानियाँ और लागत से कम निर्धारित टैरिफ के कारण डिस्कॉम लगातार घाटे में रहीं, जिससे राज्य सरकारों को बार-बार वित्तीय सहायता प्रदान करनी पड़ी।

वित्तीय दबाव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • डिस्कॉम की वित्तीय समस्याओं की जड़ें विद्युत (आपूर्ति) अधिनियम, 1948 के अंतर्गत कार्यरत राज्य विद्युत बोर्डों की कार्यप्रणाली में निहित हैं। यद्यपि कानून में बिजली कंपनियों के लिए सीमित लाभ अर्जित करना अनिवार्य था, परंतु राजनीतिक हस्तक्षेप, रियायती टैरिफ और सब्सिडी भुगतान में देरी ने वित्तीय अनुशासन को कमजोर कर दिया।
  • वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच संचित घाटा 5.5 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 6.47 लाख करोड़ रुपए हो गया, जबकि बकाया ऋण 7.26 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गया। उपभोक्ताओं द्वारा समय पर भुगतान न करना, राज्य सब्सिडी में विलंब और बिजली खरीद लागत में वृद्धि ने स्थिति को अधिक गंभीर बना दिया।

सुधार के उभरते संकेत 

  • हाल के वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में सभी डिस्कॉम ने संयुक्त रूप से कर पश्चात 2,701 करोड़ रुपए का लाभ दर्ज किया। यह 2013-14 में दर्ज 67,000 करोड़ रुपए से अधिक के घाटे की तुलना में एक बड़ा परिवर्तन है।
  • इसी अवधि में AT&C हानियाँ 22.62% से घटकर 15.04% रह गईं, जबकि ACS–ARR अंतराल घटकर मात्र 0.06 पैसे प्रति यूनिट हो गया। यह लगभग लागत वसूली की स्थिति को दर्शाता है और बेहतर बिलिंग, वसूली दक्षता तथा कड़े वित्तीय अनुशासन का संकेत देता है।

नीति सुधारों का योगदान

  • पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) ने वित्तीय सहायता को फीडर मीटरिंग, हानि में कमी और प्रणाली आधुनिकीकरण जैसे मापनीय परिणामों से जोड़ा है।
  • विद्युत नियम एवं विलंबित भुगतान अधिभार नियमों के माध्यम से डिस्कॉम को बकाया भुगतान को किस्तों में चुकाने की सुविधा मिली, जिससे बढ़ते बकाये पर अंकुश लगा।
  • इसके अतिरिक्त, ऋण अनुशासन उपायों के तहत वर्ष 2022 से संरचित पुनर्भुगतान के जरिए लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपए के पुराने बकाये को काफी हद तक कम किया गया है।
  • इन सुधारों से बिजली उत्पादकों एवं ईंधन आपूर्तिकर्ताओं का विश्वास बहाल हुआ है और समग्र विद्युत आपूर्ति श्रृंखला अधिक स्थिर हुई है।

राज्य सहायता पर निर्भरता की चुनौती

  • हालाँकि सुधार उल्लेखनीय हैं, परंतु वित्तीय स्थिरता अभी भी काफी हद तक राज्य सरकारों के समर्थन पर निर्भर है। कई डिस्कॉम ने टैरिफ सब्सिडी और घाटे की भरपाई मिलने के बाद ही लाभ दर्ज किया है। तमिलनाडु एवं राजस्थान जैसे राज्यों में दर्ज लाभ मुख्यतः प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता का परिणाम रहे हैं, न कि परिचालन अधिशेष का।
  • यह स्थिति भविष्य में कर्मचारियों के वेतन संशोधन जैसी देनदारियों के उभरने पर सुधारों की स्थायित्व क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

संरचनात्मक बाधाएँ 

  • अब भी कई गहन संरचनात्मक समस्याएँ बनी हुई हैं। कृषि आपूर्ति में मीटरिंग का अभाव बिजली खपत के सटीक आकलन को बाधित करता है।
  • सार्वभौमिक मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी वाली बिजली योजनाएँ अपेक्षाकृत संपन्न उपभोक्ताओं को अधिक लाभ पहुँचाती हैं और डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति को कमजोर करती हैं। साथ ही, सभी राज्यों में फीडर पृथक्करण और स्मार्ट मीटरिंग को व्यापक रूप से लागू नहीं किया जा सका है।

आगे की दिशा

डिस्कॉम की स्थायी वित्तीय सेहत सुनिश्चित करने के लिए गहन एवं संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। फीडर पृथक्करण का विस्तार, कृषि क्षेत्र में सौर पंपों को बढ़ावा, व्यापक मीटरिंग तथा लागत-अनुरूप टैरिफ निर्धारण इस दिशा में आवश्यक कदम हैं। इसके साथ ही, राजनीतिक इच्छाशक्ति और पेशेवर प्रबंधन का समन्वय ही बिजली वितरण कंपनियों को उपभोक्ता-अनुकूल व आर्थिक रूप से व्यवहार्य संस्थाओं में परिवर्तित कर सकता है।

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