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बायो-बिटुमेन प्रौद्योगिकी

संदर्भ

हाल ही में, भारत ने सतत एवं आत्मनिर्भर अवसंरचना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सी.एस.आई.आर.-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI) और देहरादून स्थित सी.एस.आई.आर.-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (CSIR-IIP) द्वारा विकसित स्वदेशी बायो-बिटुमेन प्रौद्योगिकी के सफल हस्तांतरण किया है।

बायो-बिटुमेन प्रौद्योगिकी के बारे में 

  • बायो-बिटुमेन तकनीक में फसल कटाई के बाद बचे हुए धान के भूसे को इकट्ठा करना, उसे पैलेट पर रखना और फिर पायरोलिसिस द्वारा बायो-ऑयल में परिवर्तित करना शामिल है जिसे बाद में पारंपरिक बिटुमेन के साथ मिलाया जाता है। 
  • व्यापक प्रयोगशाला परीक्षणों से पता चला है कि पारंपरिक बिटुमेन के 20-30% हिस्से को प्रदर्शन में कोई कमी किए बिना सुरक्षित रूप से बदला जा सकता है। 
  • इस तकनीक का कठोर भौतिक, रियोलॉजिकल, रासायनिक व यांत्रिक मूल्यांकन किया गया है, जिसमें रटिंग, क्रैकिंग, नमी से होने वाली क्षति और रेजिलिएंट मॉड्यूलस के परीक्षण शामिल हैं।
  • वस्तुतः जैव भार के अपघटन से कई मूल्य स्रोत उत्पन्न होते हैं, जिनमें सड़कों के लिए जैव-बाइंडर, गैसीय ईंधन, जैव-कीटनाशक अंश और उन्नत अनुप्रयोगों के लिए उच्च श्रेणी का कार्बन शामिल हैं जिससे यह प्रक्रिया लागत प्रभावी और भविष्य के लिए तैयार है। 

आयात एवं मुद्रा व्यय में कमी 

  • भारत वर्तमान में अपनी बिटुमेन आवश्यकताओं का लगभग आधा हिस्सा आयात करता है। 
  • स्वदेशी बायो-बिटुमेन को अपनाने से संभावित रूप से प्रति वर्ष 25,000-30,000 करोड़ के आयात की भरपाई हो सकती है जिससे घरेलू क्षमताएँ मजबूत होंगी और विदेशी मुद्रा व्यय में कमी आएगी। 
  • इस तकनीक से निर्मित सड़कों में कम बजट लगेगा। इनका जीवनकाल अधिक टिकाऊ होगा और ये पर्यावरण प्रदूषण के खतरे से भी मुक्त होंगी। 

उपलब्धि 

  • भारत एक ही वर्ष में जैव-बिटुमेन प्रौद्योगिकी को औद्योगिक और वाणिज्यिक स्तर पर ले जाने वाला पहला देश है। 
  • मेघालय में जोरबाट-शिलांग एक्सप्रेसवे (NH-40) पर बायो-बिटुमेन का उपयोग करके 100 मीटर का एक परीक्षण खंड सफलतापूर्वक बिछाया जा चुका है जिससे जमीनी स्तर पर इसकी व्यवहार्यता की पुष्टि होती है।

केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान के बारे में  

सी.एस.आई.आर.-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान 1952 में स्थापित एक प्रमुख राष्ट्रीय प्रयोगशाला है, जो वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की एक घटक प्रयोगशाला है।

संस्थान के कार्य 

  • सड़कों और रनवे के डिजाइन, निर्माण एवं अनुरक्षण 
  • बड़े व मध्यम शहरों की यातायात एवं परिवहन योजना
  • विभिन्न इलाकों में सड़कों का प्रबंधन
  • सीमांत सामग्रियों का सुधार, सड़क निर्माण में औद्योगिक अपशिष्ट का उपयोग
  • भूस्खलन नियंत्रण, भूमि सुधार एवं पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण
  • सड़क यातायात सुरक्षा और विश्लेषण व डिजाइन
  • हवा, श्रांति एवं संक्षारण अध्ययन तथा प्रदर्शन मॉनीटरन/मूल्यांकन
  • सेवा जीवन आकलन और राजमार्ग व रेलवे सेतुओं के पुनर्निर्माण पर अनुसंधान एवं विकास करना इत्यादि
  • भारत और विदेशों में विभिन्न उपयोगकर्ता संगठनों को तकनीकी एवं परामर्श सेवाएँ प्रदान करना
  • राजमार्ग अभियांत्रिकी के क्षेत्र में सड़कों और रनवे परियोजनाओं को शुरू करने और निष्पादित करने के लिए मानव संसाधनों की क्षमता निर्माण के लिए संस्थान के पास 1962 से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम और सतत शैक्षिक पाठ्यक्रम आयोजित करने की क्षमता है ताकि अनुसंधान एवं विकास के निष्कर्षों को आम जनता तक पहुंचाया जा सके।  
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