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जैव-सामग्री

संदर्भ 

  • वर्तमान समय में जैसे-जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्थाएँ प्लास्टिक और वस्त्र जैसे उपभोक्ता उत्पादों के लिए टिकाऊ व स्वच्छ प्रक्रियाओं की ओर बढ़ रही हैं, जैव-सामग्री (Biomaterials) मटेरियल इंजीनियरिंग (Materials Engineering) के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत कर रही हैं। 
  • मटेरियल इंजीनियरिंग (Materials Engineering) वह क्षेत्र है जो उत्पादों को मजबूत, हल्का, सुरक्षित और बेहतर बनाने के लिए धातुओं, सिरेमिक, पॉलिमर एवं नैनोमटेरियल्स की संरचना, गुणों व प्रसंस्करण का अध्ययन तथा विकास करता है। यह इंजीनियरिंग, विज्ञान एवं तकनीक को जोड़कर नई सामग्री की खोज करता है और मौजूदा में सुधार करता है।

क्या है जैव-सामग्री 

  • जैव-सामग्री वे पदार्थ हैं जो पूरी तरह या आंशिक रूप से जैविक स्रोतों से प्राप्त किए जाते हैं या जिनका निर्माण जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाता है। इन्हें पारंपरिक सामग्रियों के विकल्प के रूप में या उनके साथ मिलकर उपयोग करने के उद्देश्य से विकसित किया जाता है।
  • पैकेजिंग, वस्त्र, निर्माण एवं स्वास्थ्य सेवाओं जैसे क्षेत्रों में इनका उपयोग लगातार बढ़ रहा है। इनमें सामान्य उदाहरण हैं—पौधों की शर्करा या स्टार्च से बने बायोप्लास्टिक, वस्त्र उद्योग में प्रयुक्त जैव-आधारित रेशे तथा चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग होने वाली जैव-अपघटनीय सर्जिकल टांके व ऊतक संरचनाएँ।

जैव-सामग्री की श्रेणियाँ 

जैव-सामग्रियों को मुख्यतः तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-

  • ड्रॉप-इन बायोमटेरियल्स : यह रासायनिक रूप से पेट्रोलियम-आधारित सामग्रियों के समान होती हैं और मौजूदा उत्पादन प्रणालियों में सीधे इस्तेमाल की जा सकती हैं, जैसे- बायो-पीईटी। 
  • ड्रॉप-आउट बायोमटेरियल्स : इनकी रासायनिक संरचना अलग होती है और जिनके लिए नई प्रसंस्करण तकनीकों या उपयोगोपरांत प्रणालियों की आवश्यकता होती है, जैसे- पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए)। 
  • नवीन जैव-सामग्री : यह पारंपरिक सामग्रियों से अलग और उन्नत गुण प्रदान करती हैं, जैसे- स्व-उपचार करने वाली सामग्री, जैव-सक्रिय प्रत्यारोपण और उन्नत कंपोजिट।

भारत को जैव-सामग्रियों की आवश्यकता 

भारत के संदर्भ में जैव-सामग्री कई राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को एक साथ संबोधित करती हैं। 

  • ये पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के साथ-साथ औद्योगिक विकास, राजस्व सृजन और किसानों की आय में वृद्धि का माध्यम बन सकती हैं। 
  • देश में जैव-सामग्रियों का घरेलू उत्पादन प्लास्टिक और रसायनों के लिए जीवाश्म ईंधन आधारित आयात पर निर्भरता को कम कर सकता है।
  • इसके अतिरिक्त कृषि उपज और फसल अवशेषों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं जिससे किसानों को खाद्य आपूर्ति श्रृंखला से परे आय के वैकल्पिक स्रोत मिलेंगे। 
  • जैसे-जैसे वैश्विक बाजार निम्न कार्बन उत्सर्जन और चक्रीय अर्थव्यवस्था आधारित उत्पादों की ओर बढ़ रहा है, जैव-सामग्री भारतीय उद्योग को निर्यात के मोर्चे पर प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में सहायक होंगी। 
  • यह क्षेत्र एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी घरेलू नीतिगत प्रतिबद्धताओं को भी मजबूती देता है। 

वर्तमान में भारत 

  • भारत में जैव-सामग्री उद्योग तेजी से एक रणनीतिक एवं सतत औद्योगिक अवसर के रूप में उभर रहा है जिसमें जैवप्लास्टिक, जैव-पॉलिमर और अन्य जैव-व्युत्पन्न सामग्री शामिल हैं। 
  • वर्ष 2024 में अकेले जैवप्लास्टिक बाजार का आकार लगभग 500 मिलियन डॉलर आँका गया था और आने वाले वर्षों में इसके मजबूत वृद्धि पथ पर रहने की संभावना है।
  • उत्तर प्रदेश में बलरामपुर चीनी मिल्स द्वारा प्रस्तावित पी.एल.ए. संयंत्र इस क्षेत्र में किए जा रहे सबसे बड़े निवेशों में से एक है। 
  • इसके साथ ही, Phool.co जैसे स्टार्टअप मंदिरों से निकलने वाले फूलों के कचरे को उपयोगी जैव-सामग्री में बदल रहे हैं जबकि प्राज इंडस्ट्रीज एक प्रदर्शन स्तर के जैवप्लास्टिक संयंत्र का निर्माण कर रही है। 
  • हालांकि, कृषि संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद भारत को कुछ उन्नत प्रौद्योगिकियों के लिए अभी भी विदेशी स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है, खासकर कच्चे माल को उच्च-मूल्य वाले अंतिम उत्पादों में परिवर्तित करने के मामलों में। 

वैश्विक परिदृश्य 

  • यूरोपीय संघ ने पैकेजिंग एवं पैकेजिंग अपशिष्ट विनियमन (ईयू) 2025/40 को लागू किया है, जिसके तहत यह स्वीकार किया गया है कि कुछ अनुप्रयोगों में कम्पोस्टेबल पैकेजिंग के पर्यावरणीय लाभ स्पष्ट रूप से सिद्ध होते हैं।
  • संयुक्त अरब अमीरात बड़े पैमाने पर पी.एल.ए. परियोजनाओं में निवेश कर स्वयं को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है। एमिरेट्स बायोटेक ने 80,000 टन प्रतिवर्ष क्षमता वाले दो-चरणीय पी.एल.ए. संयंत्र के लिए सुल्जर तकनीक का चयन किया है जिसके 2028 में परिचालन शुरू होने की उम्मीद है। पूर्ण रूप से चालू होने पर यह दुनिया की सबसे बड़ी पी.एल.ए. सुविधा होगी।
  • अमेरिका जैव-सामग्री से जुड़ी कई परिवर्तनकारी तकनीकों में अग्रणी बना हुआ है। यू.एस.डी.ए. के बायोप्रेफर्ड कार्यक्रम के माध्यम से संघीय खरीद नीति भी इस क्षेत्र को प्रोत्साहन दे रही है। 

चुनौतियाँ

भारत के पास जैव-सामग्री उद्योग में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने का अवसर है किंतु इसके समक्ष चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। 

  • यदि कच्चे माल की आपूर्ति बढ़ती मांग के अनुरूप नहीं बढ़ी, तो खाद्य फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। 
  • इसी तरह, अत्यधिक कृषि दोहन से जल संसाधनों पर दबाव और मृदा क्षरण की आशंका भी है।
  • इसके अलावा, यदि अपशिष्ट प्रबंधन और खाद निर्माण की अवसंरचना कमजोर रही, तो जैव-सामग्रियों से मिलने वाले पर्यावरणीय लाभ सीमित हो सकते हैं। 
  • कृषि, पर्यावरण एवं उद्योग से जुड़ी नीतियों के बीच समन्वय की कमी अपनाने की गति को धीमा कर सकती है और समय रहते कदम न उठाने पर भारत को आयात पर निर्भर रहना पड़ सकता है जबकि अन्य देश तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

आगे की राह 

  • इस अवसर का पूरा लाभ उठाने के लिए आवश्यक है कि जैव-विनिर्माण अवसंरचना, विशेष रूप से किण्वन और बहुलकीकरण क्षमताओं का विस्तार किया जाए। 
  • साथ ही, उन्नत प्रौद्योगिकियों के माध्यम से गन्ना, मक्का एवं कृषि अवशेषों जैसी फसलों से प्राप्त फीडस्टॉक की उत्पादकता बढ़ाई जाए। 
  • ड्रॉप-इन और नवीन दोनों प्रकार की जैव-सामग्रियों के विकास के लिए अनुसंधान एवं विकास, मानकीकरण व नवाचार में निवेश अहम होगा।
  • उपभोक्ताओं और उद्योग का भरोसा मजबूत करने के लिए स्पष्ट नियामक परिभाषाएँ, उपयुक्त लेबलिंग नियम और उपयोगोपरांत समाधान, जैसे- पुनर्चक्रण या औद्योगिक खाद निर्माण भी अनिवार्य होंगे।
  • सरकारी खरीद नीतियाँ, समयबद्ध प्रोत्साहन योजनाएँ और पायलट परियोजनाओं व साझा सुविधाओं के लिए समर्थन प्रारंभिक निवेश के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 
  • यदि भारत समय रहते नीतिगत समन्वय एवं तकनीकी निवेश को सुदृढ़ करता है तो वह न केवल अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करेगा बल्कि जैव-सामग्रियों के वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में भी उभरेगा।
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