- भारत में बाल तस्करी एक गंभीर और लगातार बनी हुई समस्या है, जो लाखों बच्चों के जीवन को प्रभावित करती है।
- अप्रैल 2024 से मार्च 2025 तक, देशभर में 53,000 से अधिक बच्चों को तस्करी, बाल श्रम और अपहरण से बचाया गया।
- यह अपराध बच्चों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, जिसमें जीवन का अधिकार, गरिमा और शोषण से मुक्ति शामिल है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में के.पी. किरण कुमार बनाम राज्य मामले में इस समस्या को "गहरा परेशान करने वाला वास्तविकता" बताया है, और सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं।

भारत को बाल तस्करी से कैसे निपटना चाहिए?
बाल तस्करी से निपटने के लिए एक बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें रोकथाम, बचाव, पुनर्वास और कानूनी कार्रवाई शामिल हो। मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं:
- मजबूत कानूनी ढांचा और प्रवर्तन:
- मौजूदा कानूनों जैसे इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956 (ITPA),
- जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2015,
- प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज (POCSO) एक्ट,2012 और
- ट्रैफिकिंग ऑफ पर्सन्स (प्रिवेंशन, केयर एंड रिहैबिलिटेशन) एक्ट, 2021 का सख्त प्रवर्तन।
दोषसिद्धि दर को बढ़ाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट और विशेष अभियोजकों की स्थापना।
- रोकथाम के उपाय:
- सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा को दूर करने के लिए शिक्षा, गरीबी उन्मूलन और जागरूकता अभियान।
- समुदाय-आधारित निगरानी, जैसे बाल रक्षा भारत जैसी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रम, जहां स्थानीय स्तर पर सतर्कता समितियां गठित की जाती हैं।
- सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाना और रेलवे जैसे ट्रांजिट पॉइंट्स पर स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू करना।
- बचाव और पुनर्वास:
- एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स (AHTUs) को मजबूत करना, पीड़ितों की पहचान के लिए SOP लागू करना और उन्हें पुनर्वास योजनाओं से जोड़ना।
- वित्तीय सशक्तिकरण और कौशल विकास कार्यक्रम।
- समन्वय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:
- राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाना, क्योंकि तस्करी सीमाओं को पार करती है।
- UNICEF और अन्य संगठनों के साथ साझेदारी से बच्चों की सुरक्षा प्रणाली मजबूत करना।
- समुदाय और सरकार की भूमिका:
- जागरूकता अभियान, जैसे रेडियो, स्कूल प्ले और स्थानीय मेलों के माध्यम से, और पुलिस तथा न्यायिक अधिकारियों का प्रशिक्षण।
- एक समग्र दृष्टिकोण से, जिसमें रोकथाम प्राथमिक हो, भारत इस समस्या पर काबू पा सकता है।
पलेर्मो प्रोटोकॉल क्या है?
- पलेर्मो प्रोटोकॉल, आधिकारिक रूप से "प्रोटोकॉल टू प्रिवेंट, सप्रेस एंड पनिश ट्रैफिकिंग इन पर्सन्स, एस्पेशियली वुमेन एंड चिल्ड्रेन", संयुक्त राष्ट्र की ट्रांसनेशनल ऑर्गनाइज्ड क्राइम के खिलाफ कन्वेंशन का एक पूरक है।
- इसे नवंबर 2000 में अपनाया गया और 25 दिसंबर 2003 से लागू हुआ।
- उद्देश्य: मानव तस्करी को रोकना, दबाना और दंडित करना, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों पर ध्यान।
- यह पहला वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त परिभाषा प्रदान करता है, जिसमें तीन तत्व शामिल हैं: कार्रवाई (भर्ती, परिवहन, आदि), साधन (धमकी, बल, धोखा) और उद्देश्य (शोषण)।
- प्रावधान: सदस्य देशों को तस्करी को अपराध बनाना, पीड़ितों की सुरक्षा और सहायता करना, और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना अनिवार्य है। यह तीन "पी" फ्रेमवर्क पर आधारित है: रोकथाम, सुरक्षा और अभियोजन।
- भारत ने इसे 2011 में रैटिफाई किया, जो देश के एंटी-ट्रैफिकिंग कानूनों को मजबूत करने में मदद करता है।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 में मानव तस्करी की परिभाषा
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 ने इंडियन पीनल कोड (IPC) की जगह ली है। धारा 143 मानव तस्करी को परिभाषित करती है:
- परिभाषा: शोषण के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को भर्ती करना, परिवहन करना, आश्रय देना, स्थानांतरित करना या प्राप्त करना। शोषण में शारीरिक या यौन शोषण, दासता, बंधुआ मजदूरी, भीख मांगना या अंग निकालना शामिल है।
- साधनों में धमकी, बल, अपहरण, धोखा या शक्ति का दुरुपयोग शामिल। पीड़ित की सहमति अप्रासंगिक है।
- दंड: वयस्क के लिए 7-10 वर्ष की कैद और जुर्माना; बच्चे के लिए 10 वर्ष से आजीवन कारावास।
- कई व्यक्तियों या बच्चों की तस्करी पर कठोर दंड। दोहराने वाले अपराधियों या सार्वजनिक सेवकों के लिए आजीवन कारावास।
- धारा 144 तस्करित व्यक्ति के शोषण को अलग अपराध बनाती है।
- यह कानून तस्करी को संगठित अपराध के रूप में वर्गीकृत करता है।
भारत का संविधान बच्चों को शोषण से कैसे बचाता है?
भारतीय संविधान में बच्चों के शोषण से सुरक्षा के लिए कई प्रावधान हैं:
- अनुच्छेद 23: मानव तस्करी, बंधुआ मजदूरी और जबरन श्रम पर प्रतिबंध।
- अनुच्छेद 24: 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कारखानों, खदानों या खतरनाक रोजगार में काम करने से रोकता है।
- अनुच्छेद 39(e) और (f): बच्चों को शोषण से बचाना, स्वस्थ विकास सुनिश्चित करना और आर्थिक आवश्यकता से अनुपयुक्त रोजगार में प्रवेश से रोकना।
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसे न्यायालय ने शिक्षा, स्वास्थ्य और शोषण से मुक्ति के रूप में व्याख्या किया है।
- अनुच्छेद 46: कमजोर वर्गों को सामाजिक अन्याय और शोषण से बचाना।
ये प्रावधान बच्चों को गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
सर्वोच्च न्यायालय ने बाल तस्करी पर कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं:
- के.पी. किरण कुमार बनाम राज्य (2025): तस्करी को जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया। पीड़ित बच्चे को "घायल गवाह" के रूप में मानना, गवाही में छोटी असंगतियां अस्वीकार न करना।
- विशाल जीत बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1990): तस्करी और बाल वेश्यावृत्ति को सामाजिक-आर्थिक समस्या बताया, रोकथाम पर जोर।
- बच्चन बचाओ आंदोलन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2011): बच्चों के शोषण और तस्करी पर दिशानिर्देश, सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों पर विचार।
- एम.सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य: बाल श्रम पर दिशानिर्देश, जो तस्करी से जुड़े हैं।
न्यायालय ने राज्यों को डेटा संग्रह, आरोप-पत्र दाखिल करने और गवाह सुरक्षा के लिए निर्देश दिए हैं।
शोषण का मुकाबला करने के लिए केंद्र-राज्य के मजबूत संबंध क्यों महत्वपूर्ण हैं?
शोषण, विशेष रूप से बाल तस्करी, एक अंतरराज्यीय समस्या है, इसलिए केंद्र-राज्य समन्वय आवश्यक है:
- समवर्ती विषय: कानून और व्यवस्था राज्य विषय हैं, लेकिन केंद्र नीतियां बनाता है। मजबूत संबंध से AHTUs(AHTUs (Anti-Human Trafficking Units)) को संसाधन, प्रशिक्षण और समन्वय मिलता है।
- अंतरराज्यीय जांच: तस्करी नेटवर्क सीमाओं को पार करते हैं, इसलिए राज्यों के बीच सूचना साझा और संयुक्त अभियान जरूरी। केंद्र सलाह जारी करता है।
- संसाधन वितरण: केंद्र पिछड़े राज्यों को विशेष सहायता देता है, जैसे गरीबी और भेदभाव से निपटने के लिए।
- राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय: अंतर-मंत्रालयी समिति से राज्य प्रयासों को निर्देशित किया जाता है।
- मजबूत संबंध से एक समान और प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित होती है।