चर्चा में क्यों?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने के. पी. किरण कुमार मामले में बाल तस्करी को रोकने के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए और कहा कि बाल तस्करी बच्चों के संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।

प्रमुख बिन्दु:
- भारत में साल 2018 और 2022 के बीच मानव तस्करी के 10,659 मामले दर्ज किये गये थे, लेकिन उसी अवधि में इस अपराध के लिए गिरफ्तार व्यक्तियों की दोषसिद्धि दर महज 4.8 फीसदी थी।
- अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच 53,000 से अधिक बच्चों को बाल श्रम, तस्करी और अपहरण से बचाया गया।
बाल तस्करी क्या है?
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, पलार्मो प्रोटोकॉल (Palermo Protocol – 2000) के अनुसार बाल तस्करी का अर्थ है: "शोषण के उद्देश्य से किसी बच्चे की भर्ती, परिवहन, स्थानांतरण, आश्रय प्रदान करना या प्राप्त करना।"
- भारत में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 143 के अनुसार, बाल तस्करी का अपराध तब होता है जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को शोषण के उद्देश्य से भर्ती, परिवहन, आश्रय, स्थानांतरण या प्राप्त करता है।
- इसमें धमकी, बल, अपहरण, धोखा, शक्ति का दुरुपयोग या किसी प्रकार का प्रलोभन शामिल हो सकता है।
बच्चों के अधिकार
भारतीय संविधान बच्चों को एक सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वस्थ जीवन प्रदान करने के लिए विशेष सुरक्षा देता है। संविधान यह मानता है कि बच्चे देश का भविष्य हैं, इसलिए उनका शोषण किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 23 और 24
ये अनुच्छेद बच्चों को मानव तस्करी, भिक्षावृत्ति, जबरन श्रम तथा खतरनाक उद्योगों में काम करने से सुरक्षा प्रदान करते हैं। कोई भी बच्चे को मजबूरी में काम कराने या उसके श्रम का शोषण नहीं कर सकता।
- अनुच्छेद 39(e) और 39(f)
- राज्य को यह सुनिश्चित करने का दायित्व देते हैं कि बच्चों का शारीरिक, मानसिक और नैतिक शोषण न हो।
- साथ ही बच्चों को ऐसे अवसर और सुविधाएँ दी जाएँ, जिससे वे गरिमा और स्वतंत्रता के साथ स्वस्थ वातावरण में विकसित हो सकें।
बाल तस्करी और शोषण से जुड़े प्रमुख कानून
बाल तस्करी और बच्चों के शोषण को रोकने के लिए भारत में कई विशेष कानून बनाए गए हैं:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 – धारा 98 और 99
इन धाराओं के तहत नाबालिगों की खरीद-फरोख्त और बिक्री को गंभीर अपराध माना गया है।
- अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956
यह कानून यौन शोषण के उद्देश्य से की जाने वाली तस्करी को रोकने के लिए बनाया गया है।
- किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015
यह अधिनियम तस्करी या शोषण के शिकार बच्चों की देखभाल, सुरक्षा और पुनर्वास की व्यवस्था करता है।
- आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013
इस कानून ने तस्करी की परिभाषा को और व्यापक बनाया, जिसमें यौन शोषण, दासता, जबरन श्रम और अंगों का जबरन हरण शामिल है। इसमें पीड़ित की सहमति को भी अमान्य माना गया है।
- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012
- बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न, यौन शोषण और बाल अश्लील सामग्री को गंभीर अपराध मानता है।
- दोषियों के लिए कठोर दंड का प्रावधान करता है, जिसमें आजीवन कारावास और कुछ मामलों में मृत्युदंड भी शामिल है।
- यह एक लिंग-तटस्थ कानून है, यानी लड़के और लड़कियाँ दोनों समान रूप से संरक्षित हैं।
न्यायिक दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर बाल तस्करी और बाल यौन शोषण को एक गंभीर सामाजिक समस्या मानते हुए महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। न्यायालय का दृष्टिकोण केवल दंडात्मक नहीं रहा है, बल्कि निवारक, संवेदनशील और मानवतावादी भी रहा है।
1. विशाल जीत बनाम भारत संघ (1990)
- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाल तस्करी और बाल वेश्यावृत्ति गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ हैं।
- कोर्ट ने यह माना कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन अपराधों को रोकने के लिए एक निवारक और मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। साथ ही, सरकार को पीड़ित बच्चों के पुनर्वास पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया गया।
2. एम. सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य (1996)
- इस ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम पर रोक लगाने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए। कोर्ट ने बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास को प्राथमिकता देते हुए राज्य की जिम्मेदारी को स्पष्ट किया।
3. बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2011)
- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के व्यापक शोषण और तस्करी पर गंभीर चिंता जताई। न्यायालय ने बच्चों की पहचान, बचाव, संरक्षण और पुनर्वास से जुड़े तंत्र को मजबूत करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
4. के. पी. किरण कुमार मामला (2025)
- इस हालिया निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि बाल तस्करी बच्चों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर जीवन और गरिमा के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट ने तस्करी रोकने के लिए कड़े कानूनी प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन और समाजिक निगरानी को आवश्यक बताया।
सामाजिक और प्रशासनिक प्रयास
बाल तस्करी रोकने के लिए भारत में कई सामाजिक और प्रशासनिक पहलें की जा रही हैं। ये पहल न केवल बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं, बल्कि उनके अधिकारों और जागरूकता को भी मजबूत बनाती हैं।
- बचपन बचाओ आंदोलन और अन्य एनजीओ एवं सरकारी पहलें
ये संगठन बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए सक्रिय हैं। वे बच्चों को तस्करी, बाल श्रम और यौन शोषण के खतरों से अवगत कराते हैं। साथ ही प्रभावित बच्चों और परिवारों को कानूनी और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराते हैं।
- बाल संरक्षण इकाइयाँ
ये केंद्र पीड़ित बच्चों के लिए सुरक्षा, आश्रय, भोजन और स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान करते हैं। इन इकाइयों का उद्देश्य बच्चों को तत्काल राहत देना और उन्हें सुरक्षित वातावरण में पुनर्वास करना है।
- फास्ट ट्रैक अदालतें
बच्चों के खिलाफ अपराधों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित की गई हैं। ये अदालतें बाल अपराध मामलों का शीघ्र निपटारा करती हैं, ताकि दोषियों को जल्द दंड मिल सके और बच्चों के पुनर्वास में देरी न हो।
सुरक्षा और निगरानी तंत्र
बाल तस्करी रोकने में सुरक्षा और निगरानी तंत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
- राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य बाल सुरक्षा समितियाँ
ये संस्थाएँ बच्चों के अधिकारों की रक्षा करती हैं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की निगरानी, रिपोर्टिंग और समीक्षा करती हैं।
- ऑनलाइन और सोशल मीडिया निगरानी
डिजिटल प्लेटफॉर्म अब बच्चों के लिए जोखिम बन गए हैं। राज्य और केंद्र की एजेंसियाँ सोशल मीडिया, जॉब पोर्टल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की सक्रिय निगरानी कर बच्चों की भर्ती या तस्करी की संभावनाओं को रोकती हैं।
- हॉटलाइन और हेल्पलाइन सेवाएँ
जैसे 1098 – चाइल्डलाइन, जो बच्चों और उनके अभिभावकों को तुरंत सहायता, मार्गदर्शन और सुरक्षा प्रदान करती हैं। यह सेवा 24×7 उपलब्ध है और आपात स्थितियों में तत्काल हस्तक्षेप करती है।
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ
- भारत ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिबद्धताओं के तहत संयुक्त राष्ट्र का ट्रांसनेशनल ऑर्गनाइज्ड क्राइम कन्वेंशन (UNCTOC) और इसके ट्रैफिकिंग प्रोटोकॉल को अनुमोदित किया है।
- भारत ने महिलाओं और बच्चों की वेश्यावृत्ति के लिए तस्करी को रोकने और इसके खिलाफ मुकाबला करने हेतु SAARC कन्वेंशन को भी अनुमोदित किया है।
आगे की राह
बाल तस्करी जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक स्तर पर समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। इस संदर्भ में निम्नलिखित कदम महत्त्वपूर्ण हैं:
- पीड़ितों की सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों को समझना
- बाल तस्करी के शिकार अधिकांश बच्चे गरीबी, बेरोज़गारी, पलायन और पारिवारिक विघटन जैसी परिस्थितियों से आते हैं।
- विशेष रूप से अल्पसंख्यक और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के बच्चों के लिए लक्षित नीतियाँ और सहायता तंत्र विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
- कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से दोषसिद्धि दर बढ़ाना
- कम दोषसिद्धि दर अपराधियों का मनोबल बढ़ाती है। इसलिए जाँच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाकर दोषसिद्धि दर में वृद्धि करना आवश्यक है, ताकि अपराधियों के लिए एक स्पष्ट निवारक संदेश जाए।
- बच्चों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा
- बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा से जुड़े अधिकारों तक वास्तविक पहुँच सुनिश्चित करनी होगी। इससे उनका समग्र विकास और गरिमापूर्ण जीवन संभव हो सकेगा और वे तस्करी के प्रति कम संवेदनशील होंगे।
- संघीय स्तर पर समन्वित प्रयास
- चूँकि कानून और व्यवस्था राज्य सूची का विषय है, इसलिए बाल तस्करी की रोकथाम के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय, सूचना साझा करने और संयुक्त कार्रवाई की आवश्यकता है।
- डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया पर प्रभावी निगरानी
- वर्तमान समय में सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बच्चों की भर्ती का नया माध्यम बनते जा रहे हैं, जहाँ उन्हें नौकरी, मॉडलिंग या बेहतर अवसरों का झांसा दिया जाता है।
- इसलिए डिजिटल निगरानी, साइबर पुलिसिंग और जन-जागरूकता को मजबूत करना आवश्यक है।