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आर्कटिक में बढ़ती चीन की भूमिका और वैश्विक निहितार्थ

(प्रारंभिक परीक्षा: अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार, भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों व राजनीति का प्रभाव)

संदर्भ

हाल के वर्षों में आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक भू-राजनीति का एक उभरता हुआ केंद्र बन गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ के पिघलने से जहाँ नए व्यापार मार्ग और संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं, वहीं इससे महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा भी तेज हो गई है। इसी संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का ग्रीनलैंड में हस्तक्षेप और ग्रीनलैंड पर चीन-रूस के प्रभाव का दावा आर्कटिक में चीन की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता को दर्शाता है। हालांकि विश्लेषकों का मत है कि चीन की उपस्थिति फिलहाल सीमित है किंतु उसकी दीर्घकालिक रणनीति व महत्वाकांक्षाएँ वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण निहितार्थ रखती हैं।

रूस के सहारे चीन की मौजूदगी 

  • विशेषज्ञों का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में यदि चीन का कोई प्रभाव बढ़ता भी है तो वह मुख्य रूप से रूस के सहयोग से ही संभव है। वर्ष 2022 में यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक तालमेल में वृद्धि हुई है।
  • हाल के वर्षों में चीन एवं रूस ने संयुक्त सैन्य अभ्यास तथा निगरानी अभियानों को तेज किया है। वर्ष 2024 में अलास्का के पास रूसी सहयोग से एक बमवर्षक गश्ती अभियान भी इसका उदाहरण रहा है।
  • चीन के पास कुछ आधुनिक हिमभंजक पोत हैं जिनमें गहरे समुद्र में काम करने वाली छोटी पनडुब्बियां लगी हैं। ये समुद्र तल का नक्शा तैयार कर सकती हैं जो भविष्य में सैन्य दृष्टि से उपयोगी हो सकता है। 
  • इसके अलावा आर्कटिक पर नजर रखने के लिए चीन ने उपग्रह भी तैनात किए हैं। हालाँकि, चीन का दावा है कि ये सभी गतिविधियां वैज्ञानिक शोध के उद्देश्य से हैं।

आर्कटिक में चीन की रूचि का इतिहास

  • चीन ने 1 जुलाई, 1925 को स्पिट्सबर्गन संधि पर हस्ताक्षर किए और आर्कटिक मामलों में भाग लेना शुरू कर दिया तथा अपनी गतिविधियों के दायरे का विस्तार किया।
  • वर्ष 1999 में चीन ने महासागर, जैविक प्रजातियों, वायुमंडल, भूवैज्ञानिक स्थितियों और समुद्री बर्फ सहित वैज्ञानिक क्षेत्रों में अनुसंधान करने के लिए एक अभियान भेजा। 
  • 28 जुलाई, 2004 को चीन का पहला आर्कटिक वैज्ञानिक आधार ‘येलो रिवर स्टेशन’ को नॉर्वे के स्वालबार्ड द्वीप पर स्थापित किया गया था। 
  • चीन ने आर्कटिक वृत्त में बुनियादी ढांचे, परिसंपत्तियों एवं परियोजनाओं में 90 बिलियन अमरीकी डॉलर से अधिक का निवेश किया है। ये निवेश मुख्य रूप से ऊर्जा एवं खनिज क्षेत्रों में है।
  • वर्ष 2016 में रूसी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) उत्पादक नोवाटेक ने यमल एलएनजी परियोजना के वित्तपोषण के लिए 12 बिलियन अमरीकी डॉलर के ऋण के लिए चीन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। 
  • जनवरी 2023 में चीन की संचार निर्माण कंपनी ने आर्कटिक वृत्त के पास कोमी गणराज्य में पिज़ेमस्कोय खनन परियोजना को विकसित करने में मदद करने के लिए रूसी टाइटेनियम रिसोर्सेज (रुस्टिटन) के साथ एक सौदे पर हस्ताक्षर किए। 

आर्कटिक पर चीन का श्वेत-पत्र

  • 26 जनवरी, 2018 को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के राज्य परिषद सूचना कार्यालय ने ‘चीन की आर्कटिक नीति’ शीर्षक से एक श्वेत-पत्र प्रकाशित किया। 
  • यह श्वेत-पत्र आर्कटिक की स्थिति एवं हाल के परिवर्तनों, चीन के नीतिगत लक्ष्यों व आर्कटिक पर बुनियादी सिद्धांतों को स्पष्ट करता है- 
    • आर्कटिक की खोज और समझ को गहन करना
    • आर्कटिक के पर्यावरण की रक्षा करना व जलवायु परिवर्तन को संबोधित करना
    • वैध एवं तर्कसंगत तरीके से आर्कटिक संसाधनों का उपयोग करना
    • आर्कटिक शासन एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में सक्रिय रूप से भाग लेना 
    • आर्कटिक में शांति एवं स्थिरता को बढ़ावा देना 

चीन की महत्वाकांक्षा का कारण 

  • आर्कटिक क्षेत्र में चीन की दिलचस्पी केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के मुताबिक, ग्रीनलैंड में दुनिया का आठवां सबसे बड़ा दुर्लभ पृथ्वी तत्वों का भंडार मौजूद है। वस्तुतः ये तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों, उन्नत तकनीक एवं सैन्य उपकरणों के लिए बेहद अहम हैं। 
  • 2018 में चीन ने ‘पोलर सिल्क रोड’ परियोजना की शुरुआत की, जो उसकी बेल्ट एंड रोड पहल का आर्कटिक संस्करण है। चीन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक स्वयं को एक ‘ध्रुवीय महाशक्ति’ के रूप में स्थापित करना है।
  • इस दिशा में चीन ने आइसलैंड एवं नॉर्वे में शोध केंद्र बनाए हैं और रूस में तरलीकृत प्राकृतिक गैस परियोजनाओं तथा स्वीडन की एक रेलवे लाइन जैसे बुनियादी ढांचा निवेशों में भागीदारी की है। 

चीनी विस्तार का विरोध 

  • यूरोप और उत्तरी अमेरिका में चीनी निवेश को लेकर संदेह बना हुआ है। ग्रीनलैंड में एक पुराने नौसैनिक अड्डे और फिनलैंड में एक हवाई अड्डे को खरीदने के चीनी प्रस्ताव खारिज कर दिए गए। 
  • वर्ष 2019 में ग्रीनलैंड ने अपने 5G नेटवर्क के लिए हुआवेई को चुनने से इनकार कर दिया। 
  • ग्रीनलैंड के क्वानेफजेल्ड क्षेत्र में स्थित एक विशाल दुर्लभ पृथ्वी खनिज परियोजना में चीन से जुड़ी कंपनियों पर वर्ष 2021 में पर्यावरणीय चिंताओं के चलते रोक लगा दिया गया है। वहीं वर्ष 2024 में दक्षिणी ग्रीनलैंड की एक अन्य खनन परियोजना अमेरिकी लॉबिंग के बाद न्यूयॉर्क स्थित कंपनी को सौंप दी गई। 
  • यद्यपि रूस ही ऐसा देश है जहाँ चीन को अपेक्षाकृत खुली छूट मिली है और वह वहाँ बंदरगाहों व संसाधन परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। 

नए व्यापार मार्गों के माध्यम से अवसरों की तलाश  

  • आर्कटिक में बर्फ के पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं जिनका लाभ उठाने की कोशिश चीन कर रहा है। पोलर सिल्क रोड का उद्देश्य इन्हीं मार्गों के जरिए चीन को यूरोप से जोड़ना है। 
  • अक्तूबर में चीन एवं रूस ने उत्तरी समुद्री मार्ग (NSR) को विकसित करने पर सहमति जताई। इसी मार्ग से एक चीनी जहाज ने पिछले साल केवल 20 दिनों में ब्रिटेन की यात्रा पूरी की, जो स्वेज नहर मार्ग की तुलना में लगभग आधा समय है।
  • एक वैकल्पिक मार्ग के रूप में ‘नॉर्थवेस्ट पैसेज’ कनाडाई द्वीपसमूह से होकर गुजरता है और इससे रूस-चीन प्रभुत्व वाले मार्गों पर निर्भरता कम हो सकती है।

आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती चीनी गतिविधियों के प्रभाव

आर्कटिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियाँ न केवल भू-राजनीतिक (Geopolitical) बल्कि आर्थिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से भी वैश्विक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल रही हैं। 

1. सामरिक एवं भू-राजनीतिक प्रभाव (Strategic & Geopolitical)

  • रूस के साथ बढ़ती साझेदारी: पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस आर्कटिक में विकास के लिए चीन के निवेश और तकनीक पर निर्भर हो गया है। यह ‘चीन-रूस धुरी’ इस क्षेत्र में पश्चिमी देशों (विशेषकर नाटो) के प्रभाव को चुनौती दे रही है।
  • सैन्य उपस्थिति का डर: चीन की वैज्ञानिक गतिविधियों (जैसे शोध जहाज ‘शुएलोंग’) को पश्चिमी देश ‘दोहरे उपयोग’ (Dual-use) की दृष्टि से देखते हैं। आशंका है कि वैज्ञानिक डेटा का उपयोग पनडुब्बी संचालन और सैन्य निगरानी के लिए किया जा सकता है।
  • ध्रुवीय महान शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा: चीन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक एक ‘ध्रुवीय महान शक्ति’ बनना है जो वैश्विक शासन (Global Governance) में उसकी भूमिका को बढ़ाएगा। 

2. आर्थिक प्रभाव एवं पोलर सिल्क रोड

  • नए व्यापारिक मार्ग: चीन ‘पोलर सिल्क रोड’ (Polar Silk Road) के माध्यम से उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route) को विकसित कर रहा है। यह मार्ग पारंपरिक मलक्का जलसंधि और स्वेज नहर की तुलना में एशिया एवं यूरोप के बीच की दूरी को लगभग 30-40% कम कर सकता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: आर्कटिक में दुनिया का लगभग 13% तेल और 30% प्राकृतिक गैस के भंडार होने का अनुमान है। चीन इन संसाधनों तक पहुँच बनाकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना चाहता है।
  • खनिज संपदा: चीन की नजर इस क्षेत्र में मौजूद दुर्लभ मृदा धातुओं (Rare Earth Elements), लिथियम एवं कोबाल्ट पर भी है जो भविष्य की तकनीक के लिए अनिवार्य हैं। 

3. भारत पर प्रभाव

  • मानसून पर प्रभाव : आर्कटिक की बर्फ पिघलने का सीधा संबंध भारत के मानसून चक्र से है। चीन की अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों से यदि ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है तो भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • सामरिक संतुलन: यदि चीन आर्कटिक में रूस का एकमात्र बड़ा साझेदार बन जाता है तो भारत के लिए रूस के साथ अपने पारंपरिक सामरिक संतुलन को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

4. पर्यावरणीय और शासन संबंधी चुनौतियां

  • पारिस्थितिक जोखिम: चीन की बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (जैसे- बंदरगाह व रेलवे लाइन) से आर्कटिक के संवेदनशील पर्यावरण को नुकसान पहुँचने का खतरा है।
  • क्षेत्रीय संप्रभुता: चीन का यह तर्क कि ‘आर्कटिक पूरी मानवता की विरासत है’, उन देशों (जैसे- कनाडा, नॉर्वे, अमेरिका) के लिए चिंता का विषय है जो वहाँ क्षेत्रीय संप्रभुता रखते हैं। 

निष्कर्ष

  • चीन की आर्कटिक रणनीति मुख्यतः वाणिज्यिक अवसरों, ऊर्जा सुरक्षा एवं दीर्घकालिक सामरिक क्षमता निर्माण पर केंद्रित है। फिलहाल उसकी सैन्य उपस्थिति सीमित है किंतु वैज्ञानिक, आर्थिक एवं कूटनीतिक गतिविधियों के माध्यम से वह भविष्य के लिए आधार तैयार कर रहा है।
  • स्पष्ट है कि आर्कटिक आने वाले दशकों में सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा दोनों का मंच बनेगा। चीन की भूमिका इस क्षेत्र को केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति का निर्णायक क्षेत्र बनाने की दिशा में ले जा रही है। 
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