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जलवायु क्लब

(प्रारंभिक परीक्षा- पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3 : संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ 

जुलाई माह में संपन्न 48वें G-7 शिखर सम्मेलन के दौरान सात सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं ने एक अंतर्राष्ट्रीय ‘जलवायु क्लब’ स्थापित करने पर सहमति जताई है। वर्तमान वैश्विक जलवायु महत्वाकांक्षा और कार्यान्वयन पेरिस समझौतों के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये अपर्याप्त है। अतः G-7 के नेताओं ने अधिक निर्णायक जलवायु कार्रवाई करने एवं वैश्विक तापन का सामना करने में सक्षम जलवायु क्लब स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की है। साथ ही, स्वच्छ ऊर्जा और वर्ष 2035 तक कोयले पर आधारित सेक्टर को डीकार्बोनाइजेशन करने का भी लक्ष्य रखा है।

महत्वपूर्ण बिंदु 

  • जलवायु क्लब की स्थापना इस वर्ष के अंत तक संभव है। वर्ष 2015 के पेरिस जलवायु समझौते का पालन के लिये प्रतिबद्ध देशों के लिये यह क्लब ‘मुक्त एवं समावेशी प्रकृति’ का होगा।
  • इस क्लब का उद्देश्य उद्योग क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने के साथ जलवायु कार्रवाई को तेज करके पेरिस समझौते के प्रभावी कार्यान्वयन का समर्थन करना है।  
  • इससे अंतर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करते हुये उत्सर्जन-गहन वस्तुओं (Emission-intensive Goods) के लिये कार्बन रिसाव (Carbon Leakage) के जोखियों को भी संबोधित किया जा सकेगा। 
  • यह क्लब सहयोग को बढ़ावा देने, प्रतिस्पर्धा को बनाए रखने में मदद करने और जलवायु संरक्षण को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ बनाने में सहायक होगा।

जलवायु क्लब की आवधारणा

  • जलवायु क्लब की आवधारणा येल अर्थशास्त्री विलियम नॉर्डहॉस द्वारा वर्ष 2015 में विकसित की गई थी। उल्लेखनीय है कि विलियम नॉर्डहॉस को जलवायु परिवर्तन पर उनके कार्यों के लिये वर्ष 2018 में अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • नॉर्डहॉस के अनुसार, वर्ष 1997 का क्योटो  प्रोटोकॉल और वर्ष 2015 का पेरिस सम्मेलन अपने स्वैच्छिक प्रकृति के कारण त्रुटिपूर्ण है क्योंकि जिम्मेदार राष्ट्र स्वच्छ प्रौद्योगिकियों पर स्विच करने की अधिक लागत वहन करते हैं।

आवश्यकता 

  • उपरोक्त मुद्‌दे को हल करने और जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा देने के लिये नॉर्डहॉस ने वर्ष 2015 में इस क्लब का प्रस्ताव रखा था।
  • यह क्लब इस समूह के सदस्यों को जलवायु-संबंधी व्यापार शुल्क से छूट प्रदान करेगा, जिसके गैर-सदस्यों को इसके अधीन रखा जाएगा।
  • अलग-अलग देशों या यूरोपीय संघ के स्तर पर जलवायु परिवर्तन से सफलतापूर्वक निपटना संभव नहीं है। 
  • यह क्लब संयुक्त न्यूनतम मानकों को स्थापित करेगा, जलवायु कार्रवाई को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि जलवायु कार्रवाई वाले देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके।
  • जी-7 देश वार्षिक स्तर पर लगभग 1 बिलियन टन तापीय कोयले का उपभोग करते हैं। ये वैश्विक तापीय कोयले के उपभोग का लगभग 16% है और भारत, इंडोनेशिया तथा दक्षिण अफ्रीका संयुक्त रूप से कोयले का इतना ही उपभोग करते हैं।

कार्य 

  • यह क्लब वर्ष 2015 के पेरिस जलवायु समझौते को लागू करने के लिये प्रतिबद्ध देशों के लिये खुला रहेगा, जिसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में वैश्विक तापन को 2 0C से नीचे विशेषकर 1.5 0C तक सीमित करना है।
  • क्लाइमेट क्लब एक उच्च महत्वाकांक्षी अंतर-सरकारी मंच है जो पेरिस समझौते और  विशेष रूप से ग्लासगो जलवायु संधि के निर्णयों के पूर्ण कार्यान्वयन के लिये प्रतिबद्ध है।
  • जलवायु कार्रवाई में तेजी लेन के लिये G-20 सहित अन्य विकासशील देशों और उभरती अर्थव्यस्थाओ का आह्वान किया जाएगा।  
  • जी-7 देशों ने भारत, इंडोनेशिया, सेनेगल और वियतनाम जैसे विकासशील देशों के साथ जस्ट एनर्जी ट्रांजीशन पार्टनरशिप (JETP) को लेकर प्रतिबद्धता भी जताई है।

क्लाइमेट क्लब के तीन स्तंभ

  • जलवायु तटस्थता प्राप्त करने के लिये पारदर्शी नीतियों को आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना। (संभावनानुसार सभी हरितगृह गैसों को कम करना)
  • डी-कार्बोनाइजेशन में तेजी लाने के लिये उद्योगों में परिवर्तन लाना।
  • जलवायु कार्रवाई को प्रोत्साहित करने और जलवायु सहयोग के सामाजिक-आर्थिक लाभों के लिये साझेदारी एवं सहयोग को सुविधाजनक बनाना।

क्लाइमेट क्लब और चीन

  • चीन, विश्व का सबसे बड़ा हरितगृह गैस उत्सर्जक देश है। चीन स्पष्ट रूप से जलवायु से संबंधित शुल्कों का विरोध करता रहा है।
  •  इस मुद्दे पर चीन ने अन्य विकासशील देशों का समर्थन हासिल करने की भी कोशिश की है।
  • चीन ने यूरोपिय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र के खिलाफ द. अफ्रीका और इंडोनेशिया को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की है।
  • इसी कारण G-7 की बैठक में इन दोनों देशों को भी आमंत्रित किया गया था।
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