(प्रारंभिक परीक्षा : समसामयिक घटनाक्रम) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: सरकारी नीतियों एवं विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय) |
संदर्भ
भारतीय उपभोक्ता संरक्षण कानून का मूल उद्देश्य ग्राहकों को शोषण के विरुद्ध एक सरल, सस्ता व समयबद्ध मंच प्रदान करना था किंतु वर्तमान आँकड़े एवं वास्तविकता कुछ अलग ही हैं। जिस न्याय प्रणाली को 3 से 5 महीने में विवाद सुलझाने होते थे, उसमें विलंब होता जा रहा है।
उपभोक्ता न्यायालय : परिचय
भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत त्रि-स्तरीय अर्ध-न्यायिक व्यवस्था (जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय आयोग) की स्थापना की गई है। इसके तहत कानूनी रूप से बिना किसी तकनीकी आवश्यकता के मामलों का निपटान 3 महीने एवं प्रयोगशाला परीक्षण की स्थिति में 5 महीने के भीतर अनिवार्य है। इसका उद्देश्य न्यायालयी औपचारिकताओं से बचकर उपभोक्ताओं को शीघ्र राहत प्रदान करना है।
चिंताजनक प्रवृत्ति (2024-2025)
हालिया डेटा उपभोक्ता आयोगों की दक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है:
- विशाल लंबित संख्या: जनवरी 2024 तक देश भर के उपभोक्ता आयोगों में 5.43 लाख से अधिक मामले लंबित थे।
- निपटान की गिरती दर: वर्ष 2024 एवं 2025 के शुरुआती रुझान बताते हैं कि नए दर्ज होने वाले मामलों की संख्या, निपटाए गए मामलों से अधिक है। केवल वर्ष 2024 में लंबित मामलों की सूची में 15,000 नए अन्य मामले जुड़ गए।
- रिक्त पदों का संकट: जिला एवं राज्य आयोगों में अध्यक्षों व सदस्यों के सैकड़ों पद खाली पड़े हैं। निर्णायक अधिकारियों की कमी सीधे तौर पर सुनवाई की गति को प्रभावित कर रही है।
न्याय में विलंब के प्रमुख कारण
उपभोक्ता न्याय मिलने में देरी के पीछे कई गहरे कारण हैं-
- बुनियादी ढाँचे की कमी: कई जिलों में पर्याप्त न्यायालय कक्ष, सहायक कर्मचारी एवं आधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है।
- प्रक्रियात्मक पेचीदगियाँ: हालाँकि, ये अर्ध-न्यायिक निकाय हैं, फिर भी नोटिस की सुनवाई में देरी, बार-बार स्थगन (Adjournments) और विशेषज्ञ साक्ष्यों की लंबी मांग मुकदमों के निपटान के समय को बढ़ा देती।
- अपीलों की बढ़ती संख्या: जिला आयोग के फैसलों के खिलाफ बार-बार अपील करने की प्रवृत्ति उपभोक्ता-हितैषी न्याय के मूल उद्देश्य को विफल कर रही है।
उपभोक्ताओं पर प्रभाव
- न्याय मिलने में अत्यधिक देरी के कारण उपभोक्ताओं का इस प्रणाली से भरोसा कम हो रहा है।
- छोटे दावों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई आर्थिक एवं मानसिक रूप से बोझिल हो जाता है जिससे अंततः कंपनियाँ जवाबदेही से बच निकलती हैं।
आगे की राह: आवश्यक सुधार
- रिक्तियों को तुरंत भरना: सरकार को शीघ्र ही आयोगों में खाली पदों की नियुक्ति करनी चाहिए।
- डिजिटलीकरण: ई-दाखिल (E-daakhil) और वर्चुअल सुनवाई को बढ़ावा देकर प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है।
- विषय-वस्तु विशेषज्ञता: जटिल तकनीकी मामलों के लिए विशेषज्ञों की एक स्थायी पैनल व्यवस्था होनी चाहिए।
निष्कर्ष
उपभोक्ता न्याय में देरी केवल ‘न्याय न मिलने’ के बराबर नहीं है, बल्कि यह बाजार में अनुचित व्यापार प्रथाओं को बढ़ावा देती है। आधुनिक डिजिटल युग में भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए एक सशक्त एवं त्वरित ‘उपभोक्ता न्याय तंत्र’ का होना अनिवार्य है।