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दिल्ली घोषणापत्र 2026: भारत की मध्य पूर्व रणनीति का विश्लेषण

चर्चा में क्यों ?

भारत ने नई दिल्ली में दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी की। यह बैठक बहरीन (2016) में हुई पहली बैठक के लगभग एक दशक बाद आयोजित हुई, जिसमें अरब लीग के सभी 22 सदस्य देशों ने भाग लिया।

प्रमुख बिन्दु:

  • यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब मध्य पूर्व गंभीर भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रहा है-
    • अमेरिका-ईरान संबंधों में बढ़ता तनाव
    • सऊदी अरब और यूएई के बीच रणनीतिक मतभेद
    • इज़रायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर अमेरिका के नेतृत्व में नई पहल
  • इसी पृष्ठभूमि में “दिल्ली घोषणापत्र 2026” जारी किया गया, जिसने भारत और अरब लीग के साझा रुख, प्राथमिकताओं और कूटनीतिक संतुलन को स्पष्ट किया।

क्षेत्रीय संघर्ष और दिल्ली घोषणापत्र: क्या संकेत मिलते हैं ?

  • संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर जोर दिल्ली घोषणापत्र में सूडान, लीबिया और सोमालिया की संप्रभुता, एकता क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर स्पष्ट बल दिया गया है। साथ ही किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को अस्वीकार किया गया है।
  • यह दर्शाता है कि भारत और अरब लीग अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकारों के पक्ष में खड़े हैं, न कि विद्रोही या समानांतर सत्ताओं के।

पृष्ठभूमि: मध्य पूर्व की सत्ता प्रतिद्वंद्विता

  • मध्य पूर्व में संघर्ष केवल आंतरिक नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी क्षेत्रीय गुटों से भी जुड़े हैं:
    • एक पक्ष: सऊदी अरब समर्थित देश
    • दूसरा पक्ष: यूएई और इज़रायल समर्थित धड़ा, जिसे अमेरिका का समर्थन प्राप्त है
  • हालाँकि ये गुट औपचारिक नहीं हैं, लेकिन संघर्ष क्षेत्रों में इनके मतभेद स्पष्ट दिखाई देते हैं।

प्रमुख संघर्षों पर भारत का स्पष्ट रुख

सूडान:

  • यूएई पर रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) को समर्थन देने के आरोप
  • RSF द्वारा समानांतर सत्ता और नागरिकों पर हिंसा
  • भारत ने मान्यता प्राप्त सूडानी सरकार और नागरिक सुरक्षा के पक्ष में रुख अपनाया

लीबिया:

  • यूएई समर्थित खलीफा हफ़्तार बनाम त्रिपोली स्थित UN-मान्यता प्राप्त सरकार
  • भारत और अरब लीग ने सुलह और वैध सरकार के समर्थन पर जोर दिया

सोमालिया:

  • इज़रायल द्वारा सोमालीलैंड को मान्यता
  • 2025 में यूएई द्वारा सोमालीलैंड पासपोर्ट स्वीकार करना
  • भारत ने सोमालीलैंड को मान्यता देने से स्पष्ट इनकार किया
  • अरब लीग के सामूहिक रुख के साथ खड़ा रहा

यमन पर भाषा में महत्वपूर्ण बदलाव

  • लाल सागर में हौथी हमलों की स्पष्ट निंदा
  • भारत द्वारा पहली बार हूथियों का प्रत्यक्ष उल्लेख
  • यमन की एकता पर बल, जो यूएई समर्थित दक्षिणी अलगाववाद के विरुद्ध सऊदी रुख के अनुरूप है
  • यह भारत की सुरक्षा-आधारित समुद्री चिंता और खाड़ी स्थिरता प्राथमिकता को दर्शाता है।

सीरिया पर सतर्क और सीमित रुख

  • घोषणापत्र में सीरिया पर बहुत सीमित टिप्पणी
  • केवल ISIS के खिलाफ आतंकवाद-रोधी प्रयासों की सराहना
  • असद-पश्चात सीरिया पर भारत की सावधानीपूर्ण कूटनीति का संकेत

घोषणापत्र क्या कहता है और किन बातों से बचता है ?

अमेरिका-नेतृत्व वाले शांति बोर्ड (BOP) पर चुप्पी

  • ट्रम्प के नेतृत्व वाले Board of Peace (BOP) का कोई उल्लेख नहीं
  • कई खाड़ी देशों के शामिल होने के बावजूद भारत की दूरी
  • भारत की रणनीतिक सतर्कता को दर्शाता है

इज़रायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर स्पष्ट प्राथमिकता

  • अरब शांति पहल (2002) का समर्थन
  • 1967 पूर्व सीमाओं पर आधारित स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य
  • भूमि-के-बदले-शांति सिद्धांत
  • भारत और अरब लीग की मूल सहमति स्पष्ट

ईरान मुद्दे पर जानबूझकर मौन

  • ईरान के आसपास अमेरिकी सैन्य जमावड़े का कोई उल्लेख नहीं
  • टकराव से बचने की रणनीति
  • भारत का ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने का प्रयास

उल्लेखनीय तथ्य:

  • 2024 में 10 वर्षीय समझौते के बावजूद
  • बजट 2026-27 में चाबहार बंदरगाह के लिए कोई आवंटन नहीं
  • अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रति भारत की संवेदनशीलता को दर्शाता है। 

भारत की मध्य पूर्व कूटनीति: क्या स्पष्ट होता है ?

सहयोग के पाँच स्तंभ

दिल्ली घोषणापत्र भारत-अरब सहयोग को पाँच प्रमुख क्षेत्रों में मजबूत करता है:

  1. अर्थव्यवस्था
  2. ऊर्जा
  3. शिक्षा
  4. मीडिया
  5. संस्कृति

आर्थिक आधार:

  • भारत-अरब व्यापार: 240 अरब डॉलर से अधिक
  • ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की भूमिका महत्वपूर्ण

समग्र विश्लेषण:

  • भारत किसी एक गुट में शामिल हुए बिना सभी पक्षों से संबंध बनाए रख रहा है
  • नीति मानदंड-आधारित, स्थिरता-केंद्रित और दीर्घकालिक
  • संघर्ष बढ़ाने वाले कदमों से दूरी
  • सऊदी अरब के अनुरूप लेकिन स्वतंत्र कूटनीतिक पहचान

निष्कर्ष:

  • दिल्ली घोषणापत्र 2026 भारत की उस रणनीति को दर्शाता है जिसमें वह
  • मध्य पूर्व में संतुलनकारी शक्ति बना रहना चाहता है
  • क्षेत्रीय स्थिरता, वैध सरकारों और संप्रभुता को प्राथमिकता देता है
  • वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच स्वायत्त और विवेकपूर्ण कूटनीति अपनाता है
  • यह भारत को न केवल विश्वसनीय साझेदार, बल्कि जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
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