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डाईबैक रोग

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: मुख्य फसलें और संबंधित विषय व बाधाएँ; संरक्षण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ

तेलंगाना के मुलुगु स्थित वन महाविद्यालय एवं अनुसंधान संस्थान (FCRI) को हाल ही में नीम के हजारों वृक्षों के मुरझाने की घटना के बाद विनाशकारी ‘डाईबैक रोग’ की व्यापक वैज्ञानिक जांच शुरू करने के लिए कदम उठाना पड़ा है। वस्तुतः इस रोग का कोई ज्ञात उपचार नहीं है जिससे यह भारत के पारिस्थितिकी तंत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न करता है। 

डाईबैक रोग की प्रकृति 

  • क्या है : यह एक गंभीर फफूंद रोग है जो कई प्रकार के पौधों को प्रभावित कर सकता है।
  • लक्षण : यह बीमारी पौधों की शाखा के सिरे से पत्तियों के मुरझाने एवं भूरे पड़ने, तने के रोग और फलों के सड़ने के लिए जिम्मेदार है।
  • रोगज़नक़ (Pathogen) : डाईबैक कवक (फंगस) फाइटोफ्थोरा (Phytophthora) वंश (जीनस) से संबंधित है।
  • इतिहास : भारत में इस बीमारी की पहली रिपोर्ट 1990 के दशक में उत्तराखंड के देहरादून के पास सामने आई थी। 

रोग का प्रसार और जीवन चक्र

यह रोग गर्म व आर्द्र परिस्थितियों में पनपता है और तेज़ी से फैलता है जिससे इसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है:

  1. प्रसार का माध्यम: यह कवक विशेषकर वाहनों व जूतों द्वारा मुख्यत: मिट्टी एवं कीचड़ के संचलन के माध्यम से फैलता है। यह मुक्त जल में और पौधों के बीच जड़ों के सीधे संपर्क के माध्यम से भी फैलता है।
  2. अनुकूल परिस्थितियाँ: कवक संवेदनशील पौधों के ऊतकों एवं मिट्टी में जीवित रहता है तथा गर्म व आर्द्र परिस्थितियों में सर्वाधिक प्रसारित होता है और प्रजनन करता है।
  3. रोग की क्रियाविधि: जब जड़ें संक्रमित हो जाती हैं तो वे जीवन के लिए आवश्यक पानी और पोषक तत्व प्रदान नहीं कर पाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप पौधा निर्जलीकरण से मर जाता है। 

रोग की गंभीरता

  • पौधों में इस रोग के लक्षणों का दिखना प्राय: बरसात के मौसम की शुरुआत के साथ प्रारंभ होता है और बरसात के मौसम के उत्तरार्ध तथा शीतकाल के शुरुआती दिनों में ये लक्षण उत्तरोत्तर गंभीर होते जाते हैं।  
  • डाईबैक रोग का प्रभाव केवल वृक्षों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक पारिस्थितिक परिणाम हो सकते हैं।

पारिस्थितिक एवं आर्थिक खतरा

  • उत्पादन हानि: गंभीर रूप से संक्रमित वृक्षों में फलों के उत्पादन में लगभग 100% की हानि हो सकती है जिससे नीम पर निर्भर ग्रामीण आजीविका प्रभावित होती है।
  • पारिस्थितिक विनाश: जिस क्षेत्र में यह बीमारी फैलती है, उस क्षेत्र विशेष की स्थानीय वनस्पति पूरी तरह से नष्ट हो सकती है जिससे पारिस्थितिक तंत्र की संरचना गंभीर रूप से प्रभावित होती है। यद्यपि कुछ प्रजातियां उस क्षेत्र से विलुप्त होने के कगार पर पहुँच सकती हैं।
  • पहचान में कठिनाई: इस बीमारी का पता लगाना मुश्किल है क्योंकि संक्रमित पौधे प्राय: सूखने के कारण मरते हुए प्रतीत होते हैं, जिससे रोकथाम के शुरुआती प्रयास बाधित होते हैं। 
  • उपचार की समस्या: सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस बीमारी का कोई ज्ञात उपचार अभी तक उपलब्ध नहीं है जिसके कारण रोकथाम एवं प्रसार नियंत्रण ही एकमात्र प्रभावी रणनीति रह जाती है। वस्तुतः FCRI की जांच का उद्देश्य इस विनाशकारी रोगज़नक़ को समझने और इसके प्रबंधन के लिए प्रभावी रणनीतियों का विकास करना है।
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