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रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) : वीबी–जी राम जी (विकसित भारत-जी राम जी) विधेयक, 2025

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, भारतीय राज्यतंत्र और शासन- संविधान, पंचायती राज, लोकनीति, आर्थिक एवं सामाजिक विकास- सतत् विकास, गरीबी, समावेशन, जनसांख्यिकी, सामाजिक क्षेत्र में की गई पहल आदि)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2 व 3: सरकारी नीतियों तथा विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन व कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय, भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय, समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय)

संदर्भ 

  • केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री 16 दिसंबर, 2025 लोक सभा में विकसित भारत – जी राम जी (Viksit Bharat– Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) :VB – G RAM G) विधेयक, 2025 प्रस्तुत किया था।    
  • राष्ट्रपति ने 21 दिसंबर, 2025 विकसित भारत-रोज़गार एवं आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण) : वीबी–जी राम जी (विकसित भारत-जी राम जी) विधेयक, 2025 को स्वीकृति प्रदान कर दी है जो ग्रामीण रोज़गार नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। 

नए वैधानिक ढांचे का औचित्‍य

  • मनरेगा को वर्ष 2005 में कार्यान्वित किया गया था किंतु ग्रामीण भारत अब रूपांतरित हो रहा है। वर्ष 2011-12 में निर्धनता का स्‍तर 27.1% से घटकर 2022-23 में 5.3% हो गया है जिसे बढ़ते उपभोग, बेहतर वित्‍तीय सुविधा एवं बढ़े हुए कल्‍याणकारी कवरेज से सहायता मिली।

  • ग्रामीण आजीविका के अधिक विविधीकृत होने और डिजिटली तरीके से समेकित होने के साथ मनरेगा की व्‍यापक तथा माँग आधारित संरचना अब आज के गांव की वास्‍तविकता से पूरी तरह मेल नहीं खाती है।
  • विकसित भारत- जी राम जी कानून, 2025 इस संदर्भ का प्रत्‍युत्‍तर ग्रामीण रोजगार गारंटी को आधुनिक बनाने, जवाबदेही को सुदृढ़ करने व रोजगार सृजन को दीर्घावधि अवसंरचना एवं जलवायु अनुकूलता लक्ष्यों के साथ जोड़कर देता है।

                                                      प्रमुख बिंदु 

  • विकसित भारत- जी राम जी विधेयक, 2025 विकसित भारत 2047 के साथ संयोजित एक नई सांविधिक संरचना के साथ मनरेगा का स्थान लेता है।
  • रोजगार गारंटी को प्रति ग्रामीण परिवार बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है जिससे आय सुरक्षा सुदृढ़ होगी।
  • चार प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में टिकाऊ ग्रामीण अवसंरचना के साथ मजदूरी रोजगार को जोडता है।
  • विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैंक के माध्यम से राष्ट्रीय रूप से एकीकृत और विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के माध्यम से विकेंद्रित योजना विनिर्माण को सुदृढ़ करता है।
  • मानंदड संबंधी वित्त पोषण और केंद्रीय रूप से प्रायोजित संरचना की ओर बदलाव पूर्वानुमान, जवाबदेही एवं केंद्र-राज्य साझेदारी में सुधार लाता है। 

प्रमुख उद्देश्य 

  • यह अधिनियम ग्रामीण परिवारों के लिए प्रति वित्तीय वर्ष मज़दूरी रोज़गार की वैधानिक गारंटी को 125 दिनों तक बढ़ाता है और सशक्तिकरण, समावेशी विकास, योजनाओं के अभिसरण (कन्वर्जेस) तथा परिपूर्ण (सेचुरेशन) तरीके से सेवा–प्रदाय को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है जिससे समृद्ध, सक्षम एवं आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की नींव मजबूत होती है।

  • इससे पूर्व संसद ने विकसित भारत-रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 पारित किया था, जिसने भारत के ग्रामीण रोज़गार और विकास ढांचे में एक निर्णायक सुधार का मार्ग प्रशस्त किया है। 
  • यह अधिनियम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 (महात्मा गांधी नरेगा) को प्रतिस्थापित करते हुए आजीविका सुरक्षा को सुदृढ़ करने वाला एक आधुनिक वैधानिक ढांचा प्रदान करता है।  
  • यह अधिनियम सशक्तिकरण, विकास, कन्वर्जेंस और परिपूर्णता (सेचूरेशन) के सिद्धांतों पर आधारित ग्रामीण रोज़गार को केवल एक कल्याणकारी योजना से आगे बढ़ाकर विकास का एक एकीकृत माध्यम बनाता है।
  • यह ग्रामीण परिवारों की आय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है, शासन और जवाबदेही को आधुनिक बनाता है तथा मज़दूरी रोज़गार को टिकाऊ व उत्पादक ग्रामीण परिसंपत्तियों के सृजन से जोड़ता है जिससे समृद्ध एवं सक्षम ग्रामीण भारत की नींव अधिक मजबूत होती है। 

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

रोज़गार की वैधानिक गारंटी में वृद्धि

  • यह अधिनियम प्रत्येक वित्तीय वर्ष में प्रत्येक ग्रामीण परिवार को कम-से-कम 125 दिनों के मज़दूरी रोज़गार की वैधानिक गारंटी प्रदान करता है, यद्यपि परिवार के वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक कार्य करने के इच्छुक हों। (धारा 5(1))
  • पूर्व में उपलब्ध 100 दिनों के रोजगार के अधिकार की तुलना में यह वृद्धि ग्रामीण परिवारों की आजीविका को सुरक्षा प्रदान करती है, काम को पहले से अनुमानित करती है और उनकी आय को अधिक स्थिर बनाती है। 

कृषि एवं ग्रामीण श्रम के बीच संतुलित प्रावधान

  • यह अधिनियम बुवाई और कटाई के सीजन के दौरान कृषि से संबंधित गतिविधियों के लिए कृषि श्रम की उपलब्धता आसान करने के लिए राज्यों को एक वित्तीय वर्ष में कुल 60 दिनों की समेकित विराम अवधि अधिसूचित करने का अधिकार प्रदान करता है। (धारा 6)
  • श्रमिकों को मिलने वाले कुल 125 दिनों के रोज़गार के अधिकार यथावत बने रहेंगे जिसे शेष अवधि में प्रदान किया जाएगा, जिससे कृषि उत्पादकता और श्रमिकों के हितों की सुरक्षा के मध्य संतुलित समायोजन सुनिश्चित होता है।

समय पर मज़दूरी भुगतान

  • यह अधिनियम मज़दूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर अथवा किसी भी स्थिति में कार्य की समाप्ति के पंद्रह दिनों के भीतर किए जाने को अनिवार्य करता है (धारा 5(3))। 
  • यद्यपि निर्धारित अवधि से अधिक विलंब होने की स्थिति में अनुसूची–II में उल्लिखित प्रावधानों के अनुसार विलंब के लिए मुआवज़ा देय होगा, जिससे मज़दूरी सुरक्षा को सुदृढ़ किया जाता है और श्रमिकों को विलंब से संरक्षण प्रदान किया जाता है।

टिकाऊ एवं उपयोगी ग्रामीण अवसंरचना से जुड़ा रोजगार

  • इस अधिनियम के अंतर्गत मज़दूरी रोज़गार को चार प्राथमिक विषयगत क्षेत्रों में टिकाऊ सार्वजनिक परिसंपत्तियों के सृजन के साथ स्पष्ट रूप से जोड़ा गया है (धारा 4(2))
  • जल सुरक्षा एवं जल से संबंधित कार्य
  • मुख्य ग्रामीण अवसंरचना से जुड़े कार्य 
  • आजीविका से संबंधित अवसंरचना से संबंधित कार्य
  • प्रतिकूल मौसमीय घटनाओं के प्रभाव को कम करने वाले कार्य 
  • सभी कार्य बॉटम-अप एप्रोच यानि गाँव स्तर से प्रस्तावित किए जाते हैं तथा सभी सृजित परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक में समेकित किया जाता है। ताकि सार्वजनिक संसाधनों का कंवर्जेंस, विखंडन से बचाव और स्थानीय ज़रूरत के अनुसार आवश्यक ग्रामीण अवसंरचना के निर्माण सेचूरेशन लक्ष्य के आधार पर परिणाम-आधारित योजना सुनिश्चित हो सके।    

राष्ट्रीय स्तर पर अभिसरण के साथ विकेंद्रीकृत योजना निर्माण

  • सभी कार्य ‘विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं’ से प्रारंभ होते हैं जिन्हें ग्राम पंचायत स्तर पर सहभागितापूर्ण प्रकियाओं के माध्यम से तैयार किया जाता है तथा ग्राम सभा द्वारा अनुमोदित किया जाता है। (धाराएँ 4(1) से 4(3))
  • इन योजनाओं को पीएम गति शक्ति सहित राष्ट्रीय प्लेटफार्म्स के साथ डिजिटल एवं स्थानिक रूप (Spatially Integrated) से एकीकृत किया जाता है जिससे संपूर्ण योजना से संबंधित गतिविधियाँ सरकार की निगरानी के अंतर्गत कन्वर्जेंस संभव हो सके, जबकि स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकृत निर्णय निर्माण को यथावत बनाए रखा जाता है। 
  • यह एकीकृत योजना निर्माण का फ्रेमवर्क, मंत्रालयों व विभागों को कार्यों की अधिक प्रभावी योजना बनाने और क्रियान्वयन करने में सक्षम बनाने के साथ-साथ दोहराव से बचाव और सार्वजनिक संसाधनों की अपव्यय रोकने में सहायक होगा। 

वित्तीय संरचना

  • यह अधिनियम एक केन्द्रीय प्रायोजित योजना के रूप में लागू किया जाएगा, जिसे राज्यों द्वारा अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार अधिसूचित और क्रियान्वित किया जाएगा।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत व्यय-साझेदारी का पैटर्न 
  • केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 
  • पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 तथा
  • विधानसभारहित केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100% केंद्रीय वित्तपोषण का है। 

  • निधि राज्यवार मानकीकृत आवंटनों के माध्यम से प्रदान की जाएगी जो नियमों में निर्दिष्ट वस्तुनिष्ठ मानकों पर आधारित होगी (धाराएँ 4(5) एवं 22(4)) जिससे पूर्वानुमेयता (Predictability), वित्तीय अनुशासन व सुदृढ़ योजना निर्माण सुनिश्चित होगा। 

प्रशासनिक क्षमता की सुदृढ़ता 

  • इस अधिनियम के अंतर्गत प्रशासनिक व्यय की अधिकतम सीमा को 6% से बढ़ाकर 9% कर दिया गया है। 
  • इससे बेहतर मानव संसाधन उपलब्धता, प्रशिक्षण, तकनीकी क्षमता तथा मैदानी स्तर पर सहायता सुदृढ़ होती है और संस्थानों की परिणामों को प्रभावी रूप से प्रदान करने की क्षमता मज़बूत होती है।
  • विकसित भारत- रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 भारत की ग्रामीण रोज़गार व्यवस्था को नया व मज़बूत रूप प्रदान करने की दिशा में एक निर्णायक कदम का प्रतिनिधित्व करता है।
  • यह पारदर्शी, नियम-आधारित वित्तपोषण, जवाबदेही तंत्र, प्रौद्योगिकी (टेक्नालजी)-सक्षम समावेशन तथा कंवर्जेंस आधारित विकास को एकीकृत करता है ताकि ग्रामीण रोज़गार न केवल आय सुरक्षा प्रदान करे, बल्कि टिकाऊ आजीविकाओं, सुदृढ़ परिसंपत्तियों एवं दीर्घकालिक ग्रामीण समृद्धि में भी योगदान दे।

रोज़गार की गारंटी और रोज़गार की मांग का अधिकार

  • यह अधिनियम रोज़गार की मांग के अधिकार को कमज़ोर नहीं करता है। इसके विपरीत धारा 5(1) सरकार पर पात्र ग्रामीण परिवारों को कम-से-कम 125 दिनों के गारंटीकृत मज़दूरी रोज़गार प्रदान करने का स्पष्ट वैधानिक दायित्व निर्धारित करती है। 
  • गारंटीकृत दिनों में की गई यह वृद्धि, सुदृढ़ की गई जवाबदेही और शिकायत निवारण तंत्र के साथ मिलकर, इस अधिकार की प्रवर्तनीयता को अधिक मज़बूत करती है। 

मानक आधारित वित्तपोषण और रोज़गार प्रावधान

  • मानक आधारित (नॉर्मेटिव) आवंटनों की ओर किया गया परिवर्तन बजट निर्धारण तथा निधि प्रवाह की व्यवस्थाओं से संबंधित है और इससे रोज़गार के कानूनी अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। 
  • धाराएँ 4(5) एवं 22(4) नियम-आधारित व पूर्वानुमेय आवंटन (Predictable Allocation) सुनिश्चित करती हैं जबकि रोज़गार अथवा बेरोज़गारी भत्ता प्रदान करने का वैधानिक दायित्व यथावत बना रहता है। 

विकेंद्रीकरण एवं पंचायतों की भूमिका

  • यह अधिनियम योजना निर्माण या क्रियान्वयन का केंद्रीकरण नहीं करता है। 16 से 19 तक की धाराएँ पंचायतों, कार्यक्रम अधिकारियों और जिला प्राधिकारियों में, उपयुक्त स्तरों पर योजना, क्रियान्वयन एवं निगरानी की शक्तियाँ निहित करती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर केवल दृश्यता, कन्वर्जेंस एवं समन्वय किया जाएगा, न कि निर्णय लेने के स्थानीय अधिकार लिए जाएंगे। 

रोज़गार और परिसंपत्ति सृजन

  • यह अधिनियम 125 दिनों की बढ़ी हुई आजीविका की वैधानिक गारंटी को स्थापित तो करता ही है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करता है कि रोज़गार उत्पादक, टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल परिसंपत्तियों के निर्माण में योगदान दे। 
  • रोज़गार सृजन और परिसंपत्ति निर्माण को परस्पर पूरक उद्देश्यों के रूप में परिकल्पित किया गया है जो दीर्घकालिक ग्रामीण विकास और अनुकूलन को समर्थन प्रदान करते हैं (धारा 4(2) एवं अनुसूची–I)।

प्रौद्योगिकी एवं समावेशन

  • इस अधिनियम के अंतर्गत प्रौद्योगिकी को एक बाधा नहीं, बल्कि एक सक्षम माध्यम के रूप में परिकल्पित किया गया है। 
  • अधिनियम की धारा 23 एवं 24, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जियो-टैगिंग और रियल-टाइम डैशबोर्ड के माध्यम से प्रौद्योगिकी (टेक्नॉलजी)-सक्षम पारदर्शिता का प्रावधान करती हैं जबकि धारा 20 ग्राम सभाओं द्वारा सोशल ऑडिट को सुदृढ़ करती है, जिससे सामुदायिक निगरानी, पारदर्शिता व समावेशन सुनिश्चित होता है। 

बेरोज़गारी भत्ता

यह अधिनियम बेरोजगारी भत्ते के संबंध में पहले के अयोग्य ठहराए (निरर्हता) जाने वाले प्रावधानों को हटाता है और इसे एक अर्थपूर्ण वैधानिक सुरक्षा उपाय के रूप में पुनर्स्थापित करता है। जहाँ निर्धारित अवधि के भीतर रोज़गार उपलब्ध नहीं कराया जाता है, वहाँ पंद्रह दिनों के पश्चात बेरोज़गारी भत्ता देय हो जाता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर VB–G RAM G के संभावित प्रभाव

  • सरकार के अनुसार यह नया कानून ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने, आय को स्थिर करने और आधारभूत संरचना को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
  • जल संरक्षण परियोजनाओं, ग्रामीण सड़कों, स्थानीय बाजारों और जलवायु-अनुकूल परिसंपत्तियों को प्राथमिकता देकर इस योजना का लक्ष्य कृषि उत्पादकता में वृद्धि करना तथा मजबूरी में होने वाले पलायन को कम करना है।
  • इसके अलावा इस योजना की डिजिटल योजना-निर्माण, भुगतान व निगरानी प्रणाली से कार्यान्वयन में अधिक दक्षता, पारदर्शिता एवं समयबद्धता आने की उम्मीद है।

किसानों के लिए इसका महत्व

  • राज्यों को सार्वजनिक कार्यों को अधिकतम 60 दिनों तक रोकने की अनुमति मिलने से बुवाई एवं कटाई के व्यस्त मौसम में कृषि श्रम की उपलब्धता बेहतर होगी।
  • कृषि के महत्वपूर्ण चरणों में मजदूरी दरों पर दबाव कम होने की उम्मीद है।
  • जल प्रबंधन और सिंचाई सुविधाओं में सुधार से खेती की जलवायु सहनशीलता बढ़ेगी।
  • बेहतर ग्रामीण संपर्क, भंडारण एवं परिवहन सुविधाओं के कारण कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी आएगी। 

ग्रामीण श्रमिकों के लिए अपेक्षित लाभ

  • रोजगार गारंटी के दिनों में 25% की बढ़ोतरी, अर्थात अब 100 के बजाय 125 दिन का कार्य अवसर।
  • डिजिटल वेतन भुगतान तथा आधार-आधारित सत्यापन से भुगतान में देरी और मजदूरी में कटौती जैसी समस्याओं पर रोक लगेगी।
  • यदि निर्धारित अवधि में काम उपलब्ध नहीं कराया जाता है तो श्रमिकों को अनिवार्य बेरोजगारी भत्ता मिलेगा।
  • सड़कों, जल संरचनाओं और अन्य टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण होगा।
  • पंचायत-नेतृत्व वाली योजना प्रणाली से रोजगार की उपलब्धता का पहले से आकलन संभव होगा।

जवाबदेही एवं निगरानी को सशक्त बनाना

पूर्व की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से इस विधेयक में कड़े निगरानी एवं जवाबदेही प्रावधान शामिल किए गए हैं:

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित धोखाधड़ी पहचान प्रणाली
  • कार्यों की जी.पी.एस. और मोबाइल तकनीक से निगरानी
  • योजना से जुड़े आँकड़ों का साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकाशन
  • ग्राम पंचायत स्तर पर वर्ष में दो बार सामाजिक लेखापरीक्षा
  • केंद्र एवं राज्य स्तर पर समर्पित निगरानी समितियों की स्थापना 

निष्कर्ष 

  • विकसित भारत- रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 का पारित होना भारत की ग्रामीण रोज़गार गारंटी व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। 
  • वैधानिक रोज़गार को 125 दिनों तक विस्तारित कर, विकेंद्रीकृत एवं सहभागितापूर्ण योजना को अंतर्निहित कर, जवाबदेही को सुदृढ़ कर तथा कन्वर्जेंस एवं परिपूर्णता (सेचूरेशन) आधारित विकास को संस्थागत रूप देकर यह अधिनियम ग्रामीण रोज़गार को सशक्तिकरण, समावेशी विकास और समृद्ध एवं सक्षम ग्रामीण भारत के निर्माण के लिए एक रणनीतिक साधन के रूप में पुनः स्थापित करता है। 
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