भारत में प्रपत्र 7 विवाद

संदर्भ 

मतदाता सूचियों के जारी विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान प्रपत्र 7 के संभावित दुरुपयोग को लेकर गंभीर आशंकाएँ सामने आई हैं। इन चिंताओं के बीच कई राज्यों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं। 

भारतीय लोकतंत्र में मतदाता सूचियों की भूमिका 

  • मतदाता सूची भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला मानी जाती है क्योंकि यह सुनिश्चित करती है कि हर योग्य नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त हो।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों के तहत तैयार की गई इन सूचियों को समय-समय पर अद्यतन किया जाता है ताकि नए मतदाताओं को जोड़ा जा सके और अयोग्य प्रविष्टियों को हटाया जा सके।
  • चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता काफी हद तक मतदाता सूची के निर्माण व संशोधन की सटीकता, निष्पक्षता एवं पारदर्शिता पर निर्भर करती है।
  • यदि इस प्रक्रिया में व्यापक स्तर पर गलतियाँ या हेरफेर होते हैं तो उसका सीधा प्रभाव राजनीतिक प्रतिनिधित्व और चुनावी प्रणाली पर जनता के भरोसे पर पड़ता है। 

प्रपत्र 7 और उसका कानूनी आधार 

  • प्रपत्र 7 एक वैधानिक प्रावधान है, जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति के नाम के मतदाता सूची में शामिल होने पर आपत्ति दर्ज की जा सकती है।
  • मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के अनुसार, मृत्यु, दोहरी प्रविष्टि, निवास परिवर्तन, आयु संबंधी अपात्रता या नागरिकता की कमी जैसे आधारों पर आपत्तियाँ स्वीकार्य हैं। पूर्व में, केवल संबंधित मतदान केंद्र के मतदाता ही ऐसी आपत्ति दर्ज कर सकते थे। लेकिन वर्ष 2022 में किए गए संशोधन के बाद, किसी भी निर्वाचन क्षेत्र का कोई भी मतदाता आपत्ति प्रस्तुत कर सकता है।
  • हालाँकि, इस बदलाव का उद्देश्य मतदाता सूचियों की शुद्धता बढ़ाना था किंतु इससे दुरुपयोग की संभावनाएँ भी बढ़ गई हैं। नियमों के अनुसार, विशेष रूप से तब जब कोई व्यक्ति पाँच से अधिक आपत्तियाँ दर्ज करता है तो चुनावी पंजीकरण अधिकारी (ERO) द्वारा सत्यापन अनिवार्य है। 

विशेष गहन संशोधन (SIR) की प्रक्रिया 

  • विशेष गहन संशोधन भारत निर्वाचन आयोग द्वारा कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों को अद्यतन करने के लिए किया जाने वाला एक व्यापक अभ्यास है।
  • वर्तमान एस.आई.आर. के दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल सहित कई क्षेत्रों के लगभग 51 करोड़ मतदाता शामिल किए गए हैं।
  • यह पूरी प्रक्रिया सीमित समयावधि में संपन्न की गई, जिसमें गणना प्रपत्रों का संकलन, आपत्तियों की जाँच, बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा सत्यापन तथा अंतिम सूची के प्रकाशन से पहले सुनवाई शामिल है। 

फॉर्म 7 विवाद की पृष्ठभूमि 

  • विवाद का केंद्र यह आरोप है कि बड़ी संख्या में प्रपत्र 7 आवेदन संबंधित मतदाताओं की जानकारी या सहमति के बिना दाखिल किए गए।
  • विपक्षी दलों का आरोप है कि संगठित समूहों ने इस प्रावधान का दुरुपयोग करते हुए योग्य मतदाताओं के नाम योजनाबद्ध ढंग से हटवाए, जिससे चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हुई।
  • राजस्थान एवं गुजरात जैसे राज्यों से ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ लोगों ने दावा किया कि उनके नाम पर बिना अनुमति के फॉर्म 7 दाखिल किया गया। इन घटनाओं ने प्रतिरूपण, प्रशासनिक चूक और निगरानी की कमी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मतदाता नाम हटाए जाने का स्तर 

  • एसआईआर के दौरान प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची के अनुसार, नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 6.5 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए।
    इसके परिणामस्वरूप, इन क्षेत्रों में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 51 करोड़ से घटकर 44.4 करोड़ रह गई। हटाए गए मतदाताओं को एएसडी (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट) श्रेणी में रखा गया है।
  • उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक नाम हटाए गए, इसके बाद तमिलनाडु और गुजरात का स्थान रहा। आलोचकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में विलोपन और कड़ी समयसीमा ने सत्यापन तथा शिकायत निवारण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। 

सत्यापन व्यवस्था और सुरक्षा प्रावधान 

  • प्रपत्र 7 प्राप्त होने के बाद बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा भौतिक सत्यापन किया जाना अनिवार्य है। मृत्यु के मामलों में पड़ोसियों से पुष्टि और मृत्यु प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है।
  • यदि किसी मतदाता के अनुपस्थित होने की सूचना मिलती है, तो स्थानांतरण की पुष्टि के लिए बी.एल.ओ. को कई बार दौरा करना होता है। किसी भी नाम को अंतिम रूप से हटाने से पहले संबंधित मतदाता को सूचना देने और सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।
  • ईआरओ के निर्णय के विरुद्ध, मतदाता रोल के प्रकाशन के 15 दिनों के भीतर जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष अपील दायर की जा सकती है। हालाँकि ये प्रावधान मौजूद हैं, फिर भी सीमित समय के कारण इनके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर शंकाएँ बनी हुई हैं। 

प्रमुख चिंताएँ और आगे की दिशा 

  • इस पूरे विवाद का मूल मुद्दा मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने की आशंका है, विशेषकर सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच। प्रपत्र 7 के तहत झूठी जानकारी देना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के अंतर्गत दंडनीय अपराध है।
  • विशेषज्ञों का सुझाव है कि चुनावी पुनरीक्षण प्रक्रिया में भरोसा कायम रखने के लिए सामूहिक आवेदनों की कठोर जाँच, बेहतर डिजिटल निगरानी, सत्यापन के लिए पर्याप्त समय और अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के बीच संतुलन साधना अत्यंत आवश्यक है। 
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