(प्रारंभिक परीक्षा: पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन, आपदा एवं आपदा प्रबंधन) |
संदर्भ
- प्रसिद्ध पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल का 83 वर्ष की उम्र में पुणे में निधन हो गया। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत व्यापक और दीर्घकालिक प्रभाव वाला रहा है। उनकी उपलब्धियों में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) के अध्यक्ष के रूप में निभाई गई भूमिका को सबसे अहम मानी जाती है।
- यद्यपि तत्कालीन सरकार ने इस पैनल की रिपोर्ट को मंजूरी नहीं दी, फिर भी गाडगिल जीवनभर पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र को अनियंत्रित विकास से बचाने की पैरवी करते रहे।
- वस्तुतः समय बीतने के बावजूद भूस्खलन एवं अन्य पर्यावरणीय आपदाओं के बाद इस रिपोर्ट में दी गई चेतावनियाँ व सुझाव बार-बार सार्वजनिक चर्चा में सामने आते रहे हैं जो इसकी वर्तमान प्रासंगिकता को रेखांकित करते हैं।
पश्चिमी घाट के संरक्षण की रूपरेखा
- पश्चिमी घाट गुजरात से लेकर केरल एवं तमिलनाडु तक विस्तृत हैं और इन्हें प्रायद्वीपीय भारत का ‘जल स्रोत क्षेत्र’ माना जाता है।
- कावेरी, गोदावरी, कृष्णा, पेरियार एवं नेत्रावती जैसी कई प्रमुख नदियों का उद्गम यहीं से होता है।
- यह क्षेत्र विश्व स्तर पर जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण केंद्र है जहाँ अनेक ऐसी स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो अन्यत्र नहीं मिलतीं हैं।
पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल की स्थापना का उद्देश्य
- मार्च 2010 में पश्चिमी घाट की पारिस्थितिक सवेदनशीलता, जटिल भू-आकृतिक संरचना तथा जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित विकास से उत्पन्न खतरों को ध्यान में रखते हुए पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) का गठन किया गया।
- इस पैनल के गठन की पृष्ठभूमि 2010 में नीलगिरि में आयोजित ‘सेव वेस्टर्न घाट्स’ आंदोलन की बैठक रही।
पैनल को सौंपे गए दायित्व
- पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी का अध्ययन करना और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करना
- पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESZ) की अनुशंसा करना
- सतत विकास को सुनिश्चित करने के लिए संरक्षण, पुनरुद्धार एवं शासन से जुड़े उपाय सुझाना
गाडगिल पैनल की मुख्य सिफारिशें
- संपूर्ण पश्चिमी घाट संवेदनशील क्षेत्र : गाडगिल के नेतृत्व वाले पैनल ने पश्चिमी घाट के पूरे 1,29,037 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश की, जिससे क्षेत्र की समग्र पारिस्थितिक संवेदनशीलता को मान्यता दी गई।
- त्रि-स्तरीय संवेदनशीलता विभाजन : पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक संवेदनशीलता के आधार पर ESZ-1, ESZ-2 एवं ESZ-3 में वर्गीकृत किया गया, जहाँ अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में कठोर नियंत्रण प्रस्तावित थे।
- विकास गतिविधियों पर रोक : पैनल ने ESZ क्षेत्रों में आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों, नए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) और नए हिल स्टेशनों की स्थापना पर प्रतिबंध की सिफारिश की। साथ ही, ESZ-1 एवं ESZ-2 में नए खनन लाइसेंस न देने, मौजूदा खदानों को पाँच वर्षों में चरणबद्ध तरीके से बंद करने और ESZ-1 में नए उत्खनन पर पूर्ण रोक लगाने का सुझाव दिया गया।
- आधारभूत संरचना विस्तार पर नियंत्रण : पर्यावरणीय क्षति को सीमित करने के उद्देश्य से ESZ-1 एवं ESZ-2 में नई रेलवे लाइनों और प्रमुख सड़क परियोजनाओं को केवल अत्यावश्यक स्थिति में ही स्वीकृत करने की बात कही गई।
- कानूनी प्राधिकरण की स्थापना : रिपोर्ट में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत 24 सदस्यीय पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण (WGEA) के गठन का प्रस्ताव रखा गया, जो छह पश्चिमी घाट राज्यों में संवेदनशील क्षेत्रों की योजना, प्रबंधन एवं नियमन करे।
- प्राधिकरण की संरचना : प्रस्तावित निकाय में विषय विशेषज्ञों और संसाधन विशेषज्ञों के साथ-साथ प्रमुख नोडल मंत्रालयों के प्रतिनिधियों को शामिल करने की सिफारिश की गई, ताकि बहु-राज्य स्तर पर समन्वित पर्यावरणीय प्रशासन सुनिश्चित हो सके।
गाडगिल पैनल रिपोर्ट पर राजनीतिक विरोध
- गाडगिल पैनल ने मार्च 2011 में मसौदा रिपोर्ट और अगस्त 2011 में अंतिम रिपोर्ट सौंपी। हालाँकि, इस रिपोर्ट को सार्वजनिक न कर राज्यों की राय के लिए भेज दिया गया।
- पर्यावरण संगठनों ने सूचना का अधिकार (RTI) के माध्यम से इस गोपनीयता को चुनौती दी।
- मुख्य सूचना आयुक्त के हस्तक्षेप और बाद की न्यायिक प्रक्रिया के बाद मई 2012 में रिपोर्ट सार्वजनिक की गई।
- गाडगिल का मानना था कि यह रिपोर्ट समावेशी विकास को बढ़ावा देती है और इसके सुझावों को ग्राम सभाओं के समक्ष रखे जाने की सिफारिश करती है जिससे संरक्षण एवं विकास के एकांगी दृष्टिकोण से आगे बढ़ा जा सके।
राज्यों की आपत्तियाँ
- इस रिपोर्ट का केरल और महाराष्ट्र में तीव्र विरोध देखने को मिला।
- महाराष्ट्र ने प्रस्तावित पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण को मौजूदा संस्थाओं के समानांतर व्यवस्था बताते हुए आपत्ति जताई।
- केरल सरकार का तर्क था कि बड़े क्षेत्रों को संवेदनशील घोषित करने से इडुक्की व वायनाड जैसे जिलों में कृषि एवं आजीविका प्रभावित होगी।
- इसके अलावा, राजनीतिक नेतृत्व और कैथोलिक चर्च ने आर्थिक नुकसान व स्थानीय आबादी के विस्थापन की आशंका व्यक्त की।
कस्तूरीरंगन पैनल और संशोधित पश्चिमी घाट योजना
गाडगिल रिपोर्ट के व्यापक विरोध के बाद पर्यावरण मंत्रालय ने 2012 में अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कार्य समूह का गठन किया, ताकि सिफारिशों की पुनः समीक्षा की जा सके।
2013 की रिपोर्ट की प्रमुख बातें
- कस्तूरीरंगन पैनल ने लगभग 56,825 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील घोषित करने का प्रस्ताव रखा।
- इस रिपोर्ट में खनन, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों, ताप विद्युत संयंत्रों और बड़े टाउनशिप पर नियंत्रण का समर्थन किया गया, हालांकि इसका दृष्टिकोण गाडगिल पैनल की तुलना में अधिक सीमित था।
- इस पैनल ने पहले की रिपोर्ट से अलग विशिष्ट गाँवों को संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया और राज्यवार सूचियाँ जारी कीं, जिससे प्रस्ताव अधिक लक्षित और प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक बन सका।
आज तक नीतिगत गतिरोध जारी
इस रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार अब तक छह मसौदा ESA अधिसूचनाएँ जारी कर चुकी है जिनमें सबसे हालिया अगस्त 2024 की है। फिर भी राज्यों के साथ मतभेद बने हुए हैं और पश्चिमी घाट की अंतिम सीमाएँ तय करने के लिए पूर्व वन महानिदेशक संजय कुमार की अध्यक्षता में गठित समिति अभी भी अपना कार्य कर रही है।
माधव गाडगिल (1942–2026) के बारे में
जन्म
माधव गाडगिल का जन्म 1942 में पुणे में हुआ था। वे पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी संरक्षण के क्षेत्र में भारत की सबसे प्रभावशाली और सशक्त आवाज़ों में से एक माने जाते थे।
प्रमुख योगदान
- 1982 में उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु में सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेस (CES) की स्थापना की।
- उनके प्रयासों से 1986 में नीलगिरि बायोस्फियर रिज़र्व की स्थापना हुई।
- 2010 में वे पश्चिमी घाट विशेषज्ञ पारिस्थितिकी कार्यदल (WGEEP) के अध्यक्ष थे। इस कार्यदल ने पूरे पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Zone) के रूप में अधिसूचित करने की सिफारिश की।
- वे प्रधानमंत्री की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सलाहकार परिषद के सदस्य भी रहे।
- वे भारत के जैव विविधता अधिनियम के मुख्य निर्माताओं में शामिल थे और वन अधिकार अधिनियम (FRA) के कार्यान्वयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान
- पद्म श्री
- पद्म भूषण
- टाइलर पुरस्कार (पर्यावरणीय उपलब्धि के लिए)
- वोल्वो पर्यावरण पुरस्कार
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरस्कार
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