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उच्च न्यायपालिका में लैंगिक अंतराल

(मुख्य परीक्षा : सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध)

संदर्भ

भारत में पिछले 100 वर्षों में कानून के क्षेत्र में हुई प्रगति के बावजूद उच्च न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है जो कि न्यायिक प्रणाली में व्याप्त लैंगिक अन्तराल को दर्शाता है। 

उच्च न्यायपालिका में लैंगिक अंतराल के वर्तमान स्थिति 

  • वर्तमान में उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों की हिस्सेदारी केवल 14.27% (764 में से 109) है। आठ उच्च न्यायालयों में, महिला न्यायाधीशों की संख्या सिर्फ एक तक सीमित है।
    • उत्तराखंड, मेघालय और त्रिपुरा के उच्च न्यायालयों में कोई महिला न्यायाधीश नहीं है। 
    • इलाहाबाद उच्च न्यायालय, में केवल तीन महिला न्यायाधीश (2%) हैं, जबकि वर्तमान में 79 न्यायाधीशों के साथ यह देश का सबसे बड़ा उच्च न्यायालय है। 
    • उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों की संख्या असमान रूप से कम होने के साथ ही उन्हें पुरुषों की तुलना में बाद में नियुक्ति मिलती है। 
  • वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में केवल दो महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी कार्यरत हैं। 
    • सर्वोच्च न्यायालय में अंतिम बार महिला न्यायाधीश की नियुक्त वर्ष 2021 में की गई थी। तब से, सर्वोच्च न्यायालय में 28 न्यायाधीश नियुक्त किए गए हैं, हालाँकि उनमें से एक भी महिला नहीं है। 
    • पिछले 75 वर्षों में, सर्वोच्च न्यायालय ने बार एसोसिएशन से सीधे नौ पुरुषों को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किया है, लेकिन इसमें केवल 1 ही महिला शामिल है।

लैंगिक अंतराल के कारण 

कॉलेजियम प्रणाली में स्पष्ट मानदंडों का अभाव 

  •  भारत में उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम प्रणाली का अनुसरण किया जाता है, जिसमें पात्रता एवं योग्यता के लिए कोई स्पष्ट मानदंड नहीं हैं। 
  •  इस प्रक्रिया में कोई पारदर्शिता नहीं है जो नियुक्ति में महिलाओं की तुलना में पुरुषों को वरीयता देती है।

न्यायिक अनुसंशाओं में विभेद 

  • कई बार ऐसा भी होता है जब कॉलेजियम द्वारा महिलाओं के नामों की सिफारिश की जाती है, तब भी सरकार द्वारा महिलाओं की पुष्टि नहीं की जाती है।
    • उदाहरण के लिए वर्ष 2020 से अब तक उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए कॉलेजियम द्वारा नौ महिलाओं के नामों की सिफारिश की गई थी, लेकिन उनकी पुष्टि नहीं की गई।

अंतर्निहित पूर्वाग्रह

महिला न्यायाधीशों के पास आवश्यक योग्यता होने के बावजूद, अंतर्निहित पूर्वाग्रहों और संस्थागत समर्थन की कमी के कारण उन पर विचार नहीं किया जाता। 

प्रणालीगत असमानता

  • यद्यपि कई महिलाएँ कानूनी पेशे में प्रवेश करती हैं लेकिन कार्यस्थल पर भेदभाव, मार्गदर्शन की कमी और कैरियर की प्रगति में पूर्वाग्रहों के कारण अधिकार के पदों पर कम ही पहुँच पाती हैं।  
  • इसके अलावा कानूनी पेशे में महिलाओं को कम योग्य समझा जाता है।

नियुक्ति की औसत आयु में अंतर 

  •  नियुक्तियों के संदर्भ में पुरुषों की औसत आयु 51.8 वर्ष है, जब कि महिलाओं के लिए यह 53 वर्ष है। 
  • इस प्रकार, महिला न्यायाधीश वरिष्ठता के पदों तक नहीं  पहुँच पाती हैं।

बुनियादी सुविधाओं का अभाव 

  • न्यायालयों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण न्यायपालिका में काम करने वाली महिला वकीलों, न्यायाधीशों और कर्मचारियों के लिए अनेक समस्याएँ होती हैं। 
    • विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 100 जिला न्यायालयों में महिलाओं के लिए समर्पित शौचालय नहीं हैं। 
    • इसके अलावा प्रमुख उच्च न्यायालयों सहित कई अन्य न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों के लिए भी पर्याप्त शौचालय नहीं हैं। 

आगे की राह 

न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने से न्यायालयों की वैधता बढ़ेगी तथा न्यायपालिका समावेशी होगी इस संदर्भ में निम्नलिखित सुधार किए जाने की आवश्यकता है -

  • कॉलेजियम की एक पारदर्शी प्रक्रिया : कॉलेजियम को एक पारदर्शी प्रक्रिया का अनुसरण करना चाहिए जिसमें उत्कृष्टता और ईमानदारी के उच्चतम मानकों के आधार पर स्पष्ट मानदंड एवं एक निर्दिष्ट समय सीमा होनी चाहिए।
  • लैंगिक प्रतिनिधित्व की अनिवार्यता : न्यायिक नियुक्तियों में लैंगिक संतुलन न्यायपालिका का घोषित उद्देश्य होना चाहिए। इसके लिए न्यायपालिका को एक ऐसी नीति बनानी चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि उच्च न्यायपालिका में कम से कम एक तिहाई न्यायाधीश महिलाएँ हों।
  • विविधता के साथ योग्यता : नियुक्तियों के संदर्भ में विविधता और योग्यता को एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए।  इसके लिए एक ऐसी प्रक्रिया की आवश्यकता है जो केवल योग्यता के आधार पर चयन सुनिश्चित करने के साथ ही नियुक्त व्यक्तियों की श्रेणी में विविधता को प्रोत्साहित करती हो। 
  • अनुशंसाओं की समीक्षा: सरकार को एक ऐसी नीति अपनानी चाहिए, जिसमें कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित उम्मीदवारों, विशेष रूप से महिलाओं को अस्वीकार करते समय स्पष्ट स्पष्टीकरण की आवश्यकता हो।
  • मार्गदर्शन और नेतृत्व समर्थन : नेतृत्व की भूमिकाओं के लिए महिला वकीलों को सलाह देने और प्रशिक्षित करने के लिए समर्पित कार्यक्रम की आवश्यकता है जो प्रणालीगत बाधाओं को समाप्त करने में सहायक हो। 
  • संवैधानिक अदालतों को सही मायने में लैंगिक रूप से समावेशी होनी चाहिए जहाँ महिलाएँ अपनी न्यायिक भूमिकाओं का बेहतर तरीके से निर्वहन कर सकें। 

क्या आप जानते हैं?

पहली महिला वकील कॉर्नेलिया सोराबजी को वर्ष 1924 में वकालत करने का अधिकार मिला था। 

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