New
GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM Spring Sale UPTO 75% + 10% Off, Valid Till : 6th Feb., 2026 GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM Spring Sale UPTO 75% + 10% Off, Valid Till : 6th Feb., 2026 GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM

घासभूमियों के संरक्षण की वैश्विक एवं राष्ट्रीय आवश्यकता

संदर्भ

संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2026 को ‘अंतरराष्ट्रीय चरागाह एवं चरवाहा समुदाय वर्ष’ घोषित किया जाना इस तथ्य की स्वीकारोक्ति है कि अब तक वैश्विक पर्यावरण विमर्श में घासभूमियों और उन पर निर्भर समुदायों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला है। जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता ह्रास और भूमि क्षरण की त्रिस्तरीय चुनौती के बीच यह घोषणा एक अवसर भी है और एक चेतावनी भी। 

जंगल-केंद्रित जलवायु नीति की सीमा 

  • वर्ष 2022 में तंजानिया, जाम्बिया, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी एवं कनाडा के वैज्ञानिकों के एक समूह ने ‘साइंस’ पत्रिका में एक खुला पत्र लिखकर संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) से अपनी नीतियों में घास के मैदानों और सवाना जैसे सभी बायोम (Biomes) को शामिल करने का आग्रह किया था।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार, सवाना और घासभूमियाँ न केवल विशाल कार्बन भंडार हैं बल्कि जल चक्र, मृदा संरक्षण एवं आजीविका सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाती हैं। इसके बावजूद COP 30 जैसे हालिया सम्मेलनों में भी प्राथमिकता उष्णकटिबंधीय वनों तक ही सीमित रही है जिसका उदाहरण ट्रॉपिकल फ़ॉरेस्ट फ़ॉरएवर फ़ैसिलिटी (TFFF) है। 
  • यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि वैश्विक जलवायु शासन अब भी ‘दृश्य एवं सघन’ पारिस्थितिक तंत्रों को अधिक महत्व देता है जबकि खुले पारिस्थितिक तंत्रों को प्राय: बंजर या खाली भूमि मान लिया जाता है।

घासभूमियाँ : एक संकटग्रस्त बायोम 

  • घासभूमियाँ आज विश्व के सर्वाधिक संकटग्रस्त पारिस्थितिक तंत्रों में शामिल हैं। वस्तुतः कृषि विस्तार, खनन, आक्रामक प्रजातियाँ, जीवाश्म ईंधन दोहन एवं पारंपरिक भूमि-प्रबंधन प्रणालियों का दमन—इन सभी ने मिलकर इस बायोम को कमजोर किया है।

  • ऑस्ट्रेलिया की रेगिस्तानी घासभूमियाँ इसका स्पष्ट उदाहरण हैं जहाँ जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न सूखे और अचानक बाढ़, बफेल घास जैसी आक्रामक प्रजातियों के साथ मिलकर संकट को अधिक गंभीर कर रहे हैं।
  • यह स्थिति यह भी उजागर करती है कि आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ—जैसे नियंत्रित आग व सतत चराई—के पतन से पारिस्थितिक असंतुलन बढ़ा है। 

सेराडो और अमेज़न: पारिस्थितिक अंतर्संबंध 

  • ब्राज़ील का सेराडो सवाना इस वैश्विक समस्या का एक अन्य महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह क्षेत्र अमेज़न जितना ही पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की प्रमुख जल प्रणालियों का उद्गम यहीं से होता है। 
  • इसके बावजूद सेराडो को अमेज़न की तुलना में दोगुना क्षेत्रीय नुकसान झेलना पड़ रहा है। यह तथ्य इस कथन को पुष्ट करता है कि ‘सेराडो के बिना अमेज़न नहीं है’—अर्थात पारिस्थितिक तंत्र अलग-थलग नहीं, बल्कि आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। 

सामाजिक न्याय का आयाम 

  • घासभूमियों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है बल्कि एक सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है। सेराडो और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही उदाहरण दिखाते हैं कि आदिवासी, चरवाहा एवं पारंपरिक समुदाय सबसे पहले तथा सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। 
  • वस्तुतः भूमि अधिकारों का हनन, विषैले अपशिष्टों का जमाव और कृषि-व्यवसाय समर्थक नीतियाँ इन समुदायों की आजीविका व संस्कृति दोनों को खतरे में डालती हैं।
  • इस संदर्भ में UNCCD COP 16 द्वारा चरागाहों को ‘जटिल सामाजिक-पारिस्थितिक प्रणालियाँ’ मान्यता देना एक सकारात्मक कदम है, परंतु यह प्रयास अभी सीमित दायरे में है।  

संस्थागत खाँचों की समस्या

  • वैश्विक स्तर पर UNFCCC, CBD एवं UNCCD के बीच कार्य विभाजन ने नीतिगत खाँचों (Silos) को जन्म दिया है। जलवायु वार्ताएँ कार्बन तक सीमित हैं, जबकि जैव-विविधता और भूमि क्षरण अन्य मंचों पर बिखरे हुए हैं। हालाँकि 1992 के रियो सम्मेलनों ने समन्वय की नींव रखी थी, परंतु व्यवहार में यह समन्वय अब भी कमजोर है।
  • WWF और IUCN की रिपोर्ट द्वारा घासभूमियों को तीनों रियो सम्मेलनों में एकीकृत रूप से देखने की सिफारिश इस दिशा में एक व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करती है। 

भारत के लिए निहितार्थ 

  • भारत में घासभूमियों की स्थिति इस वैश्विक समस्या का सूक्ष्म रूप है। 18 मंत्रालयों में विभाजित जिम्मेदारियाँ, ‘बंजर भूमि’ की संकल्पना और वन-केंद्रित कार्बन नीति—ये सभी घासभूमियों के संरक्षण में बाधक हैं।
  • एक ओर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय घासभूमियों को वनरोपण के संभावित क्षेत्रों के रूप में देखता है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा प्रकाशित ‘भारत का बंजर भूमि एटलस’ में इन्हीं घासभूमियों को प्राय: ऐसी भूमि के रूप में चिह्नित किया जाता है जिसे अन्य उपयोगों के लिए परिवर्तित किया जा सकता है। यह नीति-विरोधाभास दर्शाता है कि घासभूमियों को एक स्वतंत्र एवं मूल्यवान पारिस्थितिक तंत्र के रूप में मान्यता अब भी नहीं मिली है।
  • यदि शासन व्यवस्था में राष्ट्रीय से लेकर बहुपक्षीय स्तर तक नीतिगत एकरूपता स्थापित की जाए, तो इसके सकारात्मक प्रभाव देश-विशिष्ट राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान (NDCs) जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से सामने आ सकते हैं। 
  • भारत के आठ NDCs में से एक लक्ष्य 2030 तक अतिरिक्त वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 2.5 से 3 अरब टन CO₂ समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक सृजित करना है। 
  • यद्यपि यदि घासभूमियों को भी एक प्रभावी कार्बन सिंक के रूप में औपचारिक मान्यता दी जाए, तो यह लक्ष्य अधिक वैज्ञानिक, समावेशी एवं व्यावहारिक बन सकता है।

आगे की राह 

  • घासभूमियों को केवल खाली या कम-उपयोगी भूमि मानने की मानसिकता से बाहर निकलना आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता संरक्षण एवं सामाजिक न्याय—तीनों लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए घासभूमियों को नीति के केंद्र में लाना अनिवार्य है। इसके लिए आवश्यक है कि-
    • घासभूमियों को विशिष्ट व मूल्यवान पारिस्थितिक तंत्र के रूप में मान्यता मिले।
    • उन्हें राष्ट्रीय व वैश्विक जलवायु योजनाओं (NDCs) में शामिल किया जाए।
    • स्थानीय समुदायों को भूमि व प्रबंधन अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ। 

निष्कर्ष 

COP 30 जैसे सम्मेलनों को अब ‘कार्बन प्रबंधन’ के संकीर्ण दायरे से निकलकर समग्र ‘बायोम-आधारित’ दृष्टिकोण अपनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2026 को ‘अंतरराष्ट्रीय चरागाह एवं चरवाहा समुदाय वर्ष’ घोषित किया जाना भारत के लिए एक अवसर है कि वह अपनी राष्ट्रीय नीतियों में सुधार करे और विज्ञान-आधारित तथा समुदाय-नेतृत्व वाले संरक्षण मॉडल को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करे। 

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR
X