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भारत में ग्रीन यूरिया उत्पादन

संदर्भ 

  • भारत सरकार ने सतत कृषि, कार्बन तटस्थता (Carbon Neutrality) और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाते हुए एक ऐतिहासिक पहल की है। हाल ही में  उर्वरक विभाग द्वारा भारत में ग्रीन यूरिया प्लांट लगाने के लिए रुचि की अभिव्यक्ति (Expression of Interest - EOI) का निमंत्रण जारी किया गया। वस्तुतः यह पहल इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अपने फर्टिलाइज़र सेक्टर को पूरी तरह से हरित (Green) बनाने के लिए तैयार है। 

नीति और परिचालन से संबंधित मुख्य बिंदु 

भारत में ग्रीन यूरिया उत्पादन को हकीकत में बदलने के लिए सरकार ने एक बहु-आयामी और व्यावहारिक नीति तैयार की है, जिसके तीन मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:

1. मंत्रालयों के बीच समन्वित सरकारी सहयोग

ग्रीन प्रोडक्शन (हरित उत्पादन) को आर्थिक रूप से व्यावहारिक और सुलभ बनाने के लिए कई मंत्रालयों ने आपस में तालमेल बिठाया है:

  • नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) : देश के स्वच्छ ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र और बुनियादी ढांचे को तेज़ी से बढ़ाने के लिए 19,744 करोड़ का वित्तीय आवंटन सुनिश्चित किया गया है।
  • उर्वरक विभाग : इस विभाग को ग्रीन अमोनिया को राष्ट्रीय उर्वरक निर्माण शृंखला में बिना किसी बाधा के शामिल करने के लिए एक सुदृढ़ संस्थागत और बाज़ार-समानता ढांचा तैयार करने का काम सौंपा गया है।

2. खरीददार-पक्ष की अलग-अलग कीमत व्यवस्था (Differential Pricing Mechanism)

पारंपरिक ग्रे अमोनिया (जीवाश्म ईंधन आधारित) की तुलना में ग्रीन अमोनिया के उत्पादन में वर्तमान लागत काफी अधिक आती है। इस चुनौती से निपटने और घरेलू कंपनियों को सुरक्षा देने के लिए एक विशेष व्यवस्था बनाई गई है:

  • ग्रीन अमोनिया की खरीद : भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) उत्पादकों से ग्रीन अमोनिया खरीदने के लिए निविदाएं जारी कर चुका है। इस अमोनिया को घरेलू उर्वरक कंपनियों को स्टैंडर्ड मार्केट-लिंक्ड ग्रे अमोनिया की कीमतों पर सप्लाई किया जाएगा।
  • मूल्य निर्धारण का आधार : यह कीमत Platts और Argus इंडेक्स के दो हफ़्ते के औसत, सीमा शुल्क और स्थानीय परिवहन लागत को जोड़कर तय की जाएगी। भविष्य में ग्रीन यूरिया के लिए भी इसी तर्ज पर मूल्य निर्धारण व्यवस्था लागू की जा सकती है।

3. उत्पादक-पक्ष के लिए दीर्घकालिक प्रोत्साहन 

निजी क्षेत्र के निवेशकों का भरोसा जीतने और जोखिम को कम करने के लिए नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM - ग्रीन अमोनिया मोड 2A) के तहत सीधे वित्तीय प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं:

  • प्रतिस्पर्धी नीलामी : भारतीय सौर ऊर्जा निगम (एसईसीआई) द्वारा प्रबंधित ई-रिवर्स नीलामी के माध्यम से कुल 7.24 लाख मीट्रिक टन (MT) प्रति वर्ष ग्रीन अमोनिया की खरीद का लक्ष्य तय किया गया है। 
  • परियोजना के चरणबद्ध लाभ : ये प्रोत्साहन विकास चरण (नई या निर्माणाधीन ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के लिए) और परिचालन चरण (वाणिज्यिक आपूर्ति शुरू होने की तिथि से नकद प्रोत्साहन) दोनों में उपलब्ध होंगे।
  • 10 वर्ष की दीर्घकालिक निश्चितता : डेवलपर्स को बाज़ार जोखिम से बचाने के लिए एक बाध्यकारी समझौते (GAPA/GASA) के ज़रिए पूरे 10 वर्षों के लिए लाभ सुरक्षित किए गए हैं। 

तकनीकी आधार: पुदिमाडाका 150 TPD पायलट प्लांट

  • तकनीकी दृष्टिकोण से, आंध्र प्रदेश के पुदिमाडाका में स्थित 150 TPD (टन प्रति दिन) ग्रीन यूरिया पायलट प्लांट को एक मानक (Benchmark) के रूप में देखा जा रहा है। 
  • एनटीपीसी (NTPC) की अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ (NETRA) द्वारा विकसित यह प्लांट उन्नत कार्बन कैप्चर और यूटिलाइज़ेशन (CCUS) सिस्टम को वॉटर इलेक्ट्रोलेसिस (जल विद्युत अपघटन) के साथ जोड़ने का एक बेजोड़ उदाहरण प्रस्तुत करता है। 
  • यह तकनीक न केवल हरित यूरिया बनाती है, बल्कि कार्बोनेटेड फ्लाई ऐश, फूड-ग्रेड सामग्री और सिंथेटिक ईंधन जैसे सह-उत्पादों के उपयोग को भी बढ़ावा देती है।

ग्रीन यूरिया उत्पादन के लिए भारत की रणनीतिक आवश्यकता 

वर्ष 2070 तक भारत के नेट ज़ीरो (Net-Zero) जलवायु लक्ष्य और नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत घरेलू यूरिया क्षेत्र का कायाकल्प करना आवश्यक हो गया है।

  • CO₂ की अनिवार्यता : ग्रीन यूरिया के उत्पादन के लिए केवल ग्रीन हाइड्रोजन ही काफी नहीं है, बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का होना भी अनिवार्य है।
  • टिकाऊ रॉ-मटीरियल : थर्मल पावर, सीमेंट और स्टील प्लांटों से निकलने वाली और कैप्चर की गई CO₂ इसके लिए एक बेहतरीन सस्टेनेबल फीडस्टॉक (कच्चा माल) साबित हो सकती है।
  • मांग और आयात पर निर्भरता : सालाना 12.7 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले एक बड़े यूरिया प्लांट को प्रत्येक वर्ष लगभग 10 लाख मीट्रिक टन CO₂ की आवश्यकता होती है। चूंकि भारत वर्तमान में हर साल लगभग 1 करोड़ मीट्रिक टन यूरिया का आयात करता है और देश के कई मौजूदा प्लांट 30 वर्ष से भी अधिक पुराने हो चुके हैं, इसलिए नई हरित क्षमताओं को विकसित करना अनिवार्य है। यदि ऐसा किया जाता है, तो भारत का उर्वरक क्षेत्र औद्योगिक रूप से कैप्चर की गई CO₂ का देश का सबसे बड़ा और सबसे भरोसेमंद उपभोक्ता बन जाएगा। 

निष्कर्ष 

  • नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर और ग्रीन अमोनिया को मिलाकर बनाई जाने वाली ये एकीकृत परियोजनाएं न केवल भारत की उर्वरक एवं ऊर्जा सुरक्षा को अभेद्य बनाएंगी, बल्कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में भी मील का पत्थर साबित होंगी।
  • एनटीपीसी (NTPC) जैसे अनुभवी संगठन, जिनके पास बिजली उत्पादन से लेकर नवीकरणीय ऊर्जा और एचयूआरएल (HURL) के माध्यम से उर्वरक क्षेत्र का व्यापक अनुभव है, इस हरित क्रांति का नेतृत्व करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में हैं। यह सही समय है जब वैश्विक और घरेलू निवेशकों को नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और विकसित हो रहे कार्बन कैप्चर फ्रेमवर्क का लाभ उठाकर भारत के इस हरित और आत्मनिर्भर भविष्य का हिस्सा बनना चाहिए।
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