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लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार की जनसंख्या पर IIMAD–PFI रिपोर्ट

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम; महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट)

चर्चा में क्यों 

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन एवं विकास संस्थान (IIMAD) और पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (PFI) की नई राष्ट्रीय-स्तरीय रिपोर्ट में भारत के द्वीप समूह लक्षद्वीप तथा अंडमान और निकोबार की जनसंख्या वृद्धि का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। 

IIMAD–PFI रिपोर्ट के बारे में 

  • शीर्षक: ‘Unravelling India’s Demographic Future: Population Projections for States and Union Territories 2021-2051’
  • इसमें भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की भावी जनसंख्या का अनुमान प्रस्तुत किया गया है।
  • विशेष रूप से छोटे राज्यों और द्वीपीय केंद्र शासित प्रदेशों के लिए रिपोर्ट ने अलग गणितीय दृष्टिकोण अपनाया है, क्योंकि इन क्षेत्रों के दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर अत्यधिक अस्थिर रहे हैं और स्पष्ट प्रवृत्ति नहीं दिखाते।

मुख्य निष्कर्ष

  • रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2051 तक लक्षद्वीप की जनसंख्या में 9.68% और अंडमान एवं निकोबार की जनसंख्या में 5.73% की वृद्धि होने की संभावना है। 
  • लक्षद्वीप की जनसंख्या वर्ष 2016 में 67,642 थी, जो वर्ष 2051 तक बढ़कर 74,194 होने का अनुमान है। 
    • पुरुष जनसंख्या 34,716 से बढ़कर 37,785 और महिला जनसंख्या 32,926 से बढ़कर 36,319 होने की संभावना है।
  • अंडमान और निकोबार की जनसंख्या वर्ष 2016 में 3,98,310 थी, जो वर्ष 2051 में 4,21,135 होने का अनुमान है।
    • पुरुष जनसंख्या 2,13,467 से बढ़कर 2,26,139 और महिला जनसंख्या 1,84,843 से बढ़कर 1,94,996 होने की संभावना है।
  • छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पारंपरिक SRS डेटा पर्याप्त नहीं होता, इसलिए गणितीय पद्धति विशेष रूप से लॉजिस्टिक कर्व फिटिंग का उपयोग किया गया।

महत्व

  • यह रिपोर्ट नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि द्वीपों की सीमित भौगोलिक क्षमता, संसाधन प्रबंधन, स्वास्थ्य ढाँचे, जल संरक्षण और आवास जैसे मुद्दों की योजना जनसंख्या अनुमान पर निर्भर करती है।
  • छोटे द्वीप समूहों में जनसंख्या वृद्धि का सीधा प्रभाव पर्यावरणीय स्थिरता, पर्यटन, रोजगार और जीवन स्तर पर पड़ता है।
  • रिपोर्ट भारत के समग्र जनसांख्यिकीय भविष्य को समझने में मदद करती है और उन क्षेत्रों में विशेष रणनीतियों की आवश्यकता को रेखांकित करती है जहाँ डाटा की कमी और वृद्धि दर में अनियमितता नीति निर्माण को चुनौतीपूर्ण बनाती है।
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