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भारत - ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए)

संदर्भ 

  • 1 जून 2026 से लागू हुआ भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (Comprehensive Economic Partnership Agreement - CEPA) भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। 18 दिसंबर 2025 को मस्कट में हस्ताक्षरित यह समझौता केवल एक मुक्त व्यापार समझौता नहीं, बल्कि भारत और ओमान के बीच आर्थिक, रणनीतिक और भू-राजनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने वाला दस्तावेज है। 
  • ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं पुनर्गठित हो रही हैं और क्षेत्रीय आर्थिक गठबंधनों का महत्व बढ़ रहा है, यह समझौता भारत को खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) और पूर्वी अफ्रीका के बाजारों में अधिक प्रभावशाली उपस्थिति स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है।   

भारत-ओमान संबंधों का रणनीतिक महत्व 

  • ओमान खाड़ी क्षेत्र में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। उसकी भौगोलिक स्थिति, उन्नत बंदरगाह अवसंरचना और स्थिर राजनीतिक वातावरण उसे भारतीय निर्यातकों के लिए एक आदर्श प्रवेश द्वार बनाते हैं।  
  • वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 11.18 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष के 10.61 अरब डॉलर की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाता है। 
  • सोहार, दुक्म और सलालाह जैसे ओमानी बंदरगाह न केवल खाड़ी सहयोग परिषद के (GCC) देशों बल्कि पूर्वी अफ्रीका के बाजारों तक भी पहुँच प्रदान करते हैं। इस दृष्टि से सीईपीए भारत की एक्ट वेस्ट नीति और विकसित भारत 2047 की आर्थिक दृष्टि को सुदृढ़ करने वाला कदम है। 

भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता से संबंधित प्रमुख बिंदु

शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच: भारतीय निर्यातकों के लिए ऐतिहासिक अवसर

  • इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि ओमान ने भारत के 99.38 प्रतिशत निर्यात को शुल्क-मुक्त बाजार पहुँच प्रदान की है। पहले जहाँ केवल 15.33 प्रतिशत भारतीय निर्यात ही शुल्क-मुक्त प्रवेश प्राप्त कर पाते थे, वहीं अब लगभग संपूर्ण भारतीय निर्यात ओमान में बिना शुल्क के प्रवेश करेगा। 
  • यह परिवर्तन भारतीय उत्पादों को मूल्य प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण बढ़त देगा। विशेष रूप से रत्न एवं आभूषण, वस्त्र, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, इंजीनियरिंग वस्तुएं, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और फार्मास्युटिकल क्षेत्र के निर्यातकों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। 
  • इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत के निर्यातक अब उन देशों के आपूर्तिकर्ताओं के समकक्ष या उनसे बेहतर स्थिति में होंगे, जिन्हें पहले से ओमान में तरजीही व्यापारिक पहुँच प्राप्त थी। 

कृषि क्षेत्र: किसानों के लिए नए अवसर 

  • कृषि क्षेत्र सीईपीए के सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक बन सकता है। भारत पहले से ही ओमान का दूसरा सबसे बड़ा कृषि आपूर्तिकर्ता है और भारत- ओमान के कृषि आयात में लगभग 17.8 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। 
  • शहद, मसाले, काजू, बासमती चावल, आम, मक्खन और मीठे बिस्कुट जैसे उत्पादों पर शुल्क समाप्त होने से भारतीय कृषि उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के किसानों को निर्यात बाजारों में अधिक अवसर प्राप्त होंगे। 
  • हालांकि, भारत ने अपनी ओर से संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की रक्षा हेतु डेयरी, अनाज, तिलहन, फल-सब्जियों और अन्य प्रमुख कृषि उत्पादों को संरक्षण सूची में रखा है। इससे खाद्य सुरक्षा और किसान हितों का संतुलन बनाए रखने का प्रयास दिखाई देता है। 

समुद्री उत्पाद: तटीय अर्थव्यवस्था को बल

  • झींगा, मछली और कटलफिश सहित सभी समुद्री उत्पादों को तत्काल शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलना भारतीय मत्स्य उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 
  • वर्तमान में ओमान का समुद्री खाद्य आयात 35.3 मिलियन डॉलर है जबकि भारत की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। सीईपीए के बाद आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु और गुजरात जैसे तटीय राज्यों के समुद्री निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना है। यह न केवल निर्यात बढ़ाएगा बल्कि मत्स्य पालन, प्रसंस्करण और कोल्ड-चेन उद्योगों में रोजगार सृजन को भी प्रोत्साहित करेगा। 

रत्न एवं आभूषण उद्योग: वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बढ़त  

  • भारत विश्व के प्रमुख रत्न एवं आभूषण निर्यातकों में शामिल है। ओमान द्वारा इस क्षेत्र में 5 प्रतिशत तक के शुल्क को समाप्त करना भारतीय उद्योग के लिए रणनीतिक लाभ है।
  • विशेष रूप से सूरत, जयपुर, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई के आभूषण क्लस्टर इससे लाभान्वित होंगे। अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में इस क्षेत्र का निर्यात छह गुना बढ़कर 150 मिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। 
  • यह समझौता भारतीय उद्योग को चीन, इटली, तुर्की और थाईलैंड जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर मूल्यगत बढ़त प्रदान करता है।   

फार्मास्युटिकल क्षेत्र: नियामकीय सहयोग का मॉडल  

  • भारत-ओमान सीईपीए का एक अभिनव पक्ष फार्मास्युटिकल क्षेत्र में नियामकीय सहयोग है।
  • दवाओं, टीकों और औषधीय सामग्री को शुल्क-मुक्त पहुँच देने के साथ-साथ यूएसएफडीए, ईएमए और अन्य प्रमुख नियामक संस्थाओं द्वारा अनुमोदित उत्पादों के लिए बाजार अनुमोदन प्रक्रिया को सरल बनाया गया है।
  • इससे भारतीय दवा कंपनियों के लिए बाजार में प्रवेश की लागत और समय दोनों में कमी आएगी। ओमान का दवा बाजार 2031 तक लगभग 474 मिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा होंगे।  

इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स: मेक इन इंडिया को बढ़ावा 

  • इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों को पूर्ण शुल्क-मुक्त पहुँच मिलना भारत की विनिर्माण रणनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 
  • मशीनरी, ऑटोमोबाइल, विद्युत उपकरण, इस्पात और औद्योगिक मशीनरी जैसे क्षेत्रों को इससे प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। विशेष रूप से उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत कार्यरत कंपनियां ओमान और व्यापक खाड़ी बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकती हैं। 
  • अनुमान है कि 2030 तक भारत का इंजीनियरिंग निर्यात 1.3 से 1.6 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।  

सेवा क्षेत्र: समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि 

  • यदि वस्तुओं के व्यापार में शुल्क-मुक्त पहुँच इस समझौते का आर्थिक आधार है, तो सेवा क्षेत्र में प्राप्त रियायतें इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धि हैं। 
  • ओमान ने 127 सेवा उप-क्षेत्रों में व्यापक बाजार पहुँच प्रदान की है। सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, वित्तीय सेवाएं और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों को विशेष लाभ मिलेगा। 
  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार किसी द्विपक्षीय समझौते में लेखाकारों, इंजीनियरों, चिकित्सकों, शिक्षकों और आईटी पेशेवरों जैसी श्रेणियों के लिए स्पष्ट और बाध्यकारी गतिशीलता प्रावधान शामिल किए गए हैं।  इससे भारतीय कुशल कार्यबल के लिए खाड़ी क्षेत्र में अवसरों का विस्तार होगा।

निवेश और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण 

  • सीईपीए केवल व्यापारिक समझौता नहीं है; यह निवेश, रसद और उत्पादन नेटवर्क को भी सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।
  • वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहाँ कंपनियां चीन-केन्द्रित आपूर्ति श्रृंखलाओं के विकल्प खोज रही हैं, भारत और ओमान के बीच यह साझेदारी क्षेत्रीय उत्पादन और वितरण नेटवर्क के निर्माण में सहायक हो सकती है। 
  • स्टार्टअप, एमएसएमई, महिला उद्यमी और सेवा क्षेत्र के पेशेवर वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक गहराई से एकीकृत हो सकेंगे।  

चुनौतियां और सावधानियां 

  • हालांकि सीईपीए अवसरों से भरपूर है, लेकिन इसकी सफलता केवल शुल्क कटौती पर निर्भर नहीं करेगी। भारतीय उद्योगों को गुणवत्ता मानकों, आपूर्ति क्षमता, लॉजिस्टिक्स दक्षता और निर्यात प्रतिस्पर्धा में निरंतर सुधार करना होगा। 
  • इसके अतिरिक्त, व्यापार लाभों का वास्तविक वितरण सुनिश्चित करने के लिए एमएसएमई, किसानों और छोटे निर्यातकों को जागरूकता एवं संस्थागत सहायता प्रदान करना भी आवश्यक होगा।  

निष्कर्ष 

  • भारत-ओमान सीईपीए भारत की आर्थिक कूटनीति का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह समझौता व्यापार उदारीकरण, निवेश सुविधा, सेवा क्षेत्र के विस्तार और रणनीतिक साझेदारी को एकीकृत रूप से आगे बढ़ाता है।
  • खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती आर्थिक उपस्थिति, वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में गहन एकीकरण और निर्यात-आधारित विकास के लक्ष्य की दिशा में यह समझौता भारत को महत्वपूर्ण बढ़त प्रदान कर सकता है। यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाता है, तो भारत-ओमान सीईपीए न केवल द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा बल्कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।  
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