पश्चिम एशिया/खाड़ी क्षेत्र इस समय गंभीर भू-राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा है।
गाजा युद्ध, यमन संघर्ष, ईरान में आंतरिक अशांति और अमेरिका-इज़रायल-ईरान तनाव ने क्षेत्र को संवेदनशील बना दिया है।
इसी पृष्ठभूमि में भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को और गहराई देते हुए रणनीतिक रक्षा साझेदारी की दिशा में कदम बढ़ाया है।
यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (MBZ) की नई दिल्ली यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय रणनीतिक रक्षा साझेदारी हेतु आशय पत्र (LoI) पर हस्ताक्षर किए।
प्रमुख परिणाम और समझौते
रणनीतिक रक्षा साझेदारी
नियमित द्विपक्षीय सैन्य अभ्यासों को संस्थागत रूप देने पर सहमति।
सेना प्रमुखों और रक्षा अधिकारियों के नियमित आदान-प्रदान पर बल।
रक्षा-औद्योगिक सहयोग के लिए एक ढाँचागत व्यवस्था विकसित करने की योजना।
भारत ने स्पष्ट किया कि यह साझेदारी:
किसी एक क्षेत्रीय संघर्ष की प्रतिक्रिया नहीं है।
खाड़ी युद्धों में भारतीय सैन्य भागीदारी का संकेत नहीं देती।
बल्कि द्विपक्षीय विश्वास का स्वाभाविक विस्तार है।
व्यापार और आर्थिक सहयोग
भारत-यूएई CEPA (2022) से व्यापार को मजबूत आधार मिला।
द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य:
2032 तक 200 अरब डॉलर (वर्तमान: लगभग 100 अरब डॉलर, FY 2024-25)
ऊर्जा सहयोग
HPCL और ADNOC Gas के बीच 10-वर्षीय LNG आपूर्ति समझौता।
2028 से भारत को 0.5 मिलियन MTPA LNG की आपूर्ति।
इस समझौते के बाद यूएई भारत का दूसरा सबसे बड़ा LNG आपूर्तिकर्ता बन गया।
इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति विविधीकरण मजबूत हुआ।
नागरिक परमाणु सहयोग
बड़े परमाणु रिएक्टरों में सहयोग की संभावना।
Small Modular Reactors (SMRs) पर संयुक्त अनुसंधान।
परमाणु सुरक्षा, संचालन और रखरखाव में साझेदारी।
अंतरिक्ष सहयोग
IN-SPACe (भारत) और UAE Space Agency के बीच LoI।
संयुक्त अंतरिक्ष मिशन और वाणिज्यिक अंतरिक्ष सेवाओं को बढ़ावा।
स्टार्ट-अप्स और उच्च-कुशल रोजगार के अवसर।
डिजिटल और वित्तीय सहयोग
डिजिटल/डेटा दूतावास का प्रस्ताव – संप्रभु डेटा सुरक्षा हेतु।
सीमा-पार भुगतान को तेज करने के लिए राष्ट्रीय भुगतान प्लेटफार्मों को जोड़ने की योजना।
भारत मार्ट, वर्चुअल ट्रेड कॉरिडोर और भारत-अफ्रीका सेतु को समर्थन।
आतंकवाद विरोधी और वित्तीय सुरक्षा
सीमा-पार आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की पुनः पुष्टि।
FATF के तहत आतंक वित्तपोषण और मनी-लॉन्ड्रिंग विरोधी सहयोग।
निवेश और संस्थागत सहयोग
अबू धाबी में House of India की स्थापना।
FAB और DP World के कार्यालय GIFT City में।
धोलेरा SIR के लिए गुजरात-यूएई LoI।
भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि और यूएई राष्ट्रपति की यात्रा का महत्व
पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता
अमेरिका-इज़रायल-ईरान के बीच बढ़ता टकराव।
यमन मुद्दे पर सऊदी अरब और यूएई के बीच मतभेद।
सऊदी-पाकिस्तान रक्षा सहयोग में वृद्धि (2025)।
गाजा संघर्ष और अमेरिका के नेतृत्व वाली शांति पहल।
यात्रा का रणनीतिक महत्व
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का स्पष्ट प्रदर्शन।
खाड़ी देशों के बीच प्रतिस्पर्धा में भारत का संतुलित बहु-संरेखण दृष्टिकोण।
यूएई की भूमिका:
प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता
बड़ा निवेश भागीदार
विशाल भारतीय प्रवासी समुदाय का मेजबान
भारत-यूएई संबंध: समग्र दृष्टि
भारत और यूएई के बीच राजनयिक संबंध 1970 के दशक में स्थापित हुए।
दोनों देशों ने समय के साथ व्यापार, निवेश और ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया।
2015 के बाद यह संबंध व्यापक रणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित हुआ।
साझेदारी अब सामरिक, आर्थिक, ऊर्जा और सांस्कृतिक क्षेत्रों में गहरी और बहुआयामी हो गई है।
सहयोग के प्रमुख स्तंभ
आर्थिक
यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
CEPA के तहत गैर-तेल व्यापार को 100 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य।
दोनों देशों के बीच निवेश और व्यापारिक सहयोग निरंतर बढ़ रहा है।
सामरिक और रक्षा
भारत और यूएई I2U2 समूह के सदस्य।
नियमित सैन्य अभ्यास - Desert Eagle, Gulf Star-1।
रक्षा सहयोग का उद्देश्य संस्थागत और टिकाऊ साझेदारी बनाना है।
जन-सांस्कृतिक
यूएई में 3.5-4.3 मिलियन भारतीय प्रवासी हैं।
सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थाएँ: BAPS मंदिर, भारतीय स्कूल और कॉलेज।
भारतीय समुदाय की उपस्थिति दोनों देशों के बीच सामाजिक-सांस्कृतिक पुल का काम करती है।
ऊर्जा सुरक्षा
रणनीतिक तेल भंडारण और दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति विविधीकरण में सहयोग महत्वपूर्ण।
भारत के सामने चुनौतियाँ और आगे की राह
चुनौतियाँ
किसी एक गुट के साथ अत्यधिक निकटता की धारणा पैदा होने का जोखिम।
यूएई, सऊदी अरब, ईरान, इज़रायल और अमेरिका के साथ संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण।
रक्षा सहयोग से भारत की गैर-संलग्नता नीति पर संभावित प्रभाव।
क्षेत्रीय अस्थिरता और समुद्री सुरक्षा संबंधी खतरे।
आगे की राह
मुद्दा-आधारित साझेदारी को प्राथमिकता देना।
CEPA और खाड़ी पूंजी का सक्रिय उपयोग – Make in India और Atmanirbhar Bharat को बढ़ावा।
रक्षा सहयोग को संस्थागत और टिकाऊ बनाना, लेकिन इसे गैर-सैन्यीकृत रखना।
पश्चिम एशिया में सक्रिय कूटनीति और तनाव-नियंत्रण प्रयास जारी रखना।
निष्कर्ष:
भारत-यूएई रणनीतिक रक्षा साझेदारी यह दर्शाती है कि द्विपक्षीय संबंध अब लेन-देन आधारित नहीं रहे, बल्कि बहुआयामी और दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग में विकसित हो चुके हैं।
पश्चिम एशिया की अस्थिर परिस्थितियों में भारत ने यूएई के साथ सहयोग बढ़ाकर शांति, स्थिरता और रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत किया है।
यह साझेदारी खाड़ी क्षेत्र में भारत को एक विश्वसनीय, गुटनिरपेक्ष और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित करती है, जो उसकी ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी हितों और भू-राजनीतिक प्रासंगिकता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।